मय-कदा पर ग़ज़ल

शायरों ने मय-ओ-मयकदे के मज़ामीन को बहुत तसलसुल के साथ बाँधा है। क्लासिकी शायरी का ये बहुत मर्ग़ूब मज़मून रहा है। मयकदे का ये शेरी बयान इतना दिल-चस्प और इतना रंगा-रंग है कि आप उसे पढ़ कर ही ख़ुद को मयकदे की हाव-हू में महसूस करने लगेंगे। मयकदे से जुड़े हुए और भी बहुत से पहलू हैं। ज़ाहिद, नासेह, तौबा, मस्जिद, साक़ी जैसी लफ़ज़ियात के गिर्द फैले हुए इस मौज़ू पर मुश्तमिल हमारा ये शेअरी इंतिख़ाब आपको पसंद आएगा।