मजबूरी पर दोहे

मजबूरी ज़िंदगी में तसलसुल

के साथ पेश आने वाली एक सूरत-ए-हाल है जिस में इंसान की जो थोड़ी बहोत ख़ुद-मुख़्तारियत है वो भी ख़त्म हो जाती और इंसान पूरी तरह से मजबूर हो जाता है और यहीं से वो शायरी पैदा होती है जिस में बाज़ मर्तबा एहतिजाज भी होता है और बाज़ मर्तबा हालात के मुक़ाबले में सिपर अंदाज़ होने की कैफ़ियत भी। हम इस तरह के शेरों का एक छोटा सा इंतिख़ाब पेश कर रहे हैं।

दरिया दरिया घूमे माँझी पेट की आग बुझाने

पेट की आग में जलने वाला किस किस को पहचाने

जमीलुद्दीन आली
बोलिए