शर्म शायरी

शर्माना माशूक़ की एक सिफ़त और एक अदा है। क्लासिकी शायरी का माशूक़ इंतिहाई दर्जे का शर्मीला वाक़े हुआ है इसी लिए आशिक़ उस से बराबर उस के शर्माने की शिकायत करता रहता है। महबूब शर्म के मारे आशिक़ पर मुलतिफ़त भी नहीं होता शर्माने की मुख़्तलिफ़ अदाओं और शिकायतों की दिल-चस्प शक्लों का ये पुर-लुत्फ़ बयान हमारे इस इन्तिख़ाब में पढ़िए।