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उर्दू शायरी पर स्कॉलर

रात, तन्हाई और चाँदनी: फ़ैज़ की शायरी का बुनियादी जमालियाती (सौंदर्यवादी) मूड

यह लेख फ़ैज़ की शायरी में रात, चाँदनी और तन्हाई के चित्रण का विश्लेषण करता है, जो उनके कलाम में एक ख़ास और गहरा सौंदर्यवादी माहौल पैदा करता है।

ग़ज़ल: ज़ात और कायनात का ख़ूबसूरत संगम

ग़ज़ल सिर्फ़ शायरी की एक विधा नहीं है, बल्कि ज़ात (स्वयं) के ज़रिए पूरी कायनात को समेटने वाली इशारों की एक ऐसी कला है, जो बड़ी-बड़ी दास्तानों को दो मिसरों (पंक्तियों) में बयान कर देती है।

मीर तक़ी मीर और रोज़मर्रा की ज़बान का रचनात्मक कमाल

मीर तक़ी मीर का सबसे बड़ा कारनामा यह है कि उन्होंने आम बोल-चाल और रोज़मर्रा की ज़बान को इस्तिआरे (रूपक) और रिआयत (शब्दों के तालमेल) के ज़रिए महान शायरी की ज़बान में बदल दिया।

'ख़ुदा-ए-सुख़न' का अस्ल मतलब: मीर तक़ी मीर ही शायरी के ख़ुदा क्यों हैं?

मीर तक़ी मीर को 'ख़ुदा-ए-सुख़न' क्यों कहा जाता है? यह ख़िताब महज़ एक तारीफ़ नहीं है, बल्कि शायरी की तमाम अस्नाफ़ (विधाओं ) पर मीर की मुकम्मल महारत का सुबूत है।

अश्लीलता और बराज़ियात: चिरकीन की शायरी को समझने का नया नज़रिया

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने चिरकीन की शायरी पर लगे 'अश्लीलता' के इल्ज़ाम का आलोचनात्मक जायज़ा लेते हुए 'अश्लीलता' (Pornography) और 'बराज़ियात' (Scatology) के बीच साफ़ फ़र्क़ क़ायम किया है।

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