असग़र गोंडवी
ग़ज़ल 38
अशआर 57
चला जाता हूँ हँसता खेलता मौज-ए-हवादिस से
अगर आसानियाँ हों ज़िंदगी दुश्वार हो जाए
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ज़ाहिद ने मिरा हासिल-ए-ईमाँ नहीं देखा
रुख़ पर तिरी ज़ुल्फ़ों को परेशाँ नहीं देखा
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पहली नज़र भी आप की उफ़ किस बला की थी
हम आज तक वो चोट हैं दिल पर लिए हुए
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यूँ मुस्कुराए जान सी कलियों में पड़ गई
यूँ लब-कुशा हुए कि गुलिस्ताँ बना दिया
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एक ऐसी भी तजल्ली आज मय-ख़ाने में है
लुत्फ़ पीने में नहीं है बल्कि खो जाने में है
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नअत 1
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ऑडियो 21
आलाम-ए-रोज़गार को आसाँ बना दिया
आशोब-ए-हुस्न की भी कोई दास्ताँ रहे
इक आलम-ए-हैरत है फ़ना है न बक़ा है
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