अशहद करीम उल्फ़त के शेर
ज़िंदगी से बहुत देर तक
ज़िंदगी पर ही चिक़ चिक़ हुई
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बादल के एक टुकड़े में क्यों दब गई तपिश
सूरज हज़ार दर्जा जलाली बना रहा
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मेरी फ़िक्र नहीं है तुझ को अपनी फ़िक्र तो करनी होगी
तेरा नाम भी मैला होगा मेरी भी रुस्वाई में
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दु’आ-ए-दस्त-ए-फ़ज़ीलत से सर की रौनक़ है
हमारे घर के बुज़ुर्गों से घर की रौनक़ है
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