बर्क़ आशियान्वी के शेर
ज़ीस्त में जब नहीं आती किसी 'उनवाँ पे हँसी
आप अपने दिल-ए-नाकाम पे हंस देता हूँ
क़िस्सा-ए-दर्द को करते हुए ज़ब्त-ए-तहरीर
रोते रोते भी तिरे नाम पे हँस देता हूँ
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