बिमल कृष्ण अश्क
ग़ज़ल 42
नज़्म 11
अशआर 14
दायरा खींच के बैठा हूँ बड़ी मुद्दत से
ख़ुद से निकलूँ तो किसी और का रस्ता देखूँ
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
तुम तो कुछ ऐसे भूल गए हो जैसे कभी वाक़िफ़ ही नहीं थे
और जो यूँही करना था साहब किस लिए इतना प्यार किया था
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
अब के बसंत आई तो आँखें उजड़ गईं
सरसों के खेत में कोई पत्ता हरा न था
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
अब यही दुख है हमीं में थी कमी उस में न थी
उस को चाहा था मगर अपनी तरह चाहा न था
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
उसे छत पर खड़े देखा था मैं ने
कि जिस के घर का दरवाज़ा नहीं है
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
पुस्तकें 5
अन्य शायरों को पढ़िए
-
सिराज लखनवी
-
यगाना चंगेज़ी
-
बिस्मिल सईदी
-
जमील अज़ीमाबादी
-
जयकृष्ण चौधरी हबीब
-
सफ़ी औरंगाबादी
-
वारिस किरमानी
-
महशर बदायुनी
-
महेश चंद्र नक़्श
-
आज़ाद गुलाटी
-
साहिर सियालकोटी
-
ताबिश देहलवी
-
अख़्तर अंसारी अकबराबादी
-
लाला माधव राम जौहर
-
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
-
द्वारका दास शोला
-
शाज़ तमकनत
-
इस्माइल मेरठी
-
सय्यद मुनीर
-
हसन अब्बास रज़ा