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हैदर इलाहाबादी

2004 | इलाहाबाद, भारत

हैदर इलाहाबादी के शेर

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तिरी याद आई तो कहती हैं आँखें

अब आँखों से आँसू बहाना पड़ेगा

छत पे आई हो आज बरसों बा'द

देख कर चाँद डर जाए कहीं

कोई भी रू-ब-रू नहीं रहा अब

मेरा मतलब है तू नहीं रहा अब

अपने बिस्तर पे दम तोड़ दें हम

तेरी बातों को याद कर कर के

तेरे जाने के बाद देख ज़रा

कितना बर्बाद हो गया हूँ मैं

अपनी इस पाक निगाहों से हमें देखो तो

हम कहीं और नहीं दिल में तिरे रहते हैं

रोज़ तकते हैं एक दूजे को

हाँ मगर बात हम नहीं करते

इतनी जल्दी नहीं बिछड़ना था

जितनी जल्दी बिछड़ गई हो तुम

हार जाता हूँ उन की बातों से

जिन की बातों से जीत जाता था

ये ज़माना है जान लो साहिब

हर क़दम पर तुम्हें दग़ा देगा

घर से मैं निकला वुज़ू कर के इबादत के लिए

उस की खिड़की खुल गई और फिर इशारा हो गया

ज़माना जितना बहकाए तुम्हारे साथ रहना है

तुम्हें अब कुछ भी हो जाए तुम्हारे साथ रहना है

जब से तुम्हारे दीद की चाहत निकल गई

दिल है कहीं दिमाग़ कहीं और नज़र कहीं

क्यों मिरा इंतिज़ार करते हो

किस लिए मुझ से प्यार करते हो

तेरा चेहरा तो देख रक्खा है

हद है तेरी जबीं नहीं देखी

है मोहब्बत इसी लिए तो अभी

तुझ से ढारस लगाए बैठे हैं

उस ने कैसा ये काम कर डाला

मेरा जीना हराम कर डाला

कब कहाँ कौन पलट जाए तुम्हें क्या है ख़बर

इस से बेहतर है कि तुम अपना ही रस्ता देखो

जब तिरा ज़िक्र होने लगता है

दिल मिरा दिल में रोने लगता है

ताज़ियाना है मेरा शाना है

ज़ख़्म खाना है मुस्कुराना है

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