हमीद अलमास के शेर
शजर-ए-तर न यहाँ बर्ग-ए-शनासा कोई
इस क़रीने से सजाया है ये मंज़र किस ने
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टैग : बर्ग
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गुज़र-बसर तो बहर-हाल हो ही जाएगी
ज़वाल-ए-‘उम्र है हैरानी-ए-म'आश में हूँ
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