हसन कमाल
ग़ज़ल 20
अशआर 7
सूरज लहूलुहान समुंदर में गिर पड़ा
दिन का ग़ुरूर टूट गया शाम हो गई
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आओ अब अपने ध्यान का सूरज उगाएँ हम
है मय-कदे में शोर बपा शाम हो गई
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मेहंदी में लाली जिस तरह कानों में बाली जिस तरह
जब यूँ मिले तो क्या चले दुनिया का हम पे दाँव रे
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जब तक मैं ज़िंदगी को न समझा था जी लिया
जब आ गई समझ में तो बे-मौत मर गया
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वहशत और सूना-पन अपनी ज़ात-ए-तन्हाई
आज मय-कदे को भी ख़ाना-ए-ख़ुदा पाया
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