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हातिम अली मेहर

1815 - 1879

मिर्ज़ा ग़ालिब के समकालीन और मित्र, हाई कोर्ट के वकील और मानद मजिस्ट्रेट रहे

मिर्ज़ा ग़ालिब के समकालीन और मित्र, हाई कोर्ट के वकील और मानद मजिस्ट्रेट रहे

हातिम अली मेहर का परिचय

उपनाम : 'मेहर'

मूल नाम : मिर्ज़ा हातिम अ’ली बेग

जन्म : 15 Apr 1815 | अलीगढ़, उत्तर प्रदेश

निधन : 18 Aug 1879 | एटा, उत्तर प्रदेश

आप ही पर नहीं दीवाना-पन अपना मौक़ूफ़

और भी चंद परी-ज़ाद हैं अच्छे अच्छे

मिर्ज़ा हातिम अली बेग, तख़ल्लुस ‘मेहर’, उर्दू साहित्य के एक विशिष्ट शायर थे और मिर्ज़ा ग़ालिब के समकालीन होने के साथ उनके मित्रों में भी शामिल थे। उन्होंने कम उम्र, लगभग चौदह वर्ष की आयु में ही शायरी शुरू कर दी थी और अपनी अधिक लेखन क्षमता तथा अभिव्यक्ति पर पकड़ के कारण जल्द ही एक महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर लिया। उनके कलाम में सरलता, प्रवाह और भाषा पर पूर्ण अधिकार दिखाई देता है, जबकि तारीख़ कहने (क्रोनोग्राम) में भी उन्हें विशेष महारत हासिल थी।

प्रारंभ में वो हाई कोर्ट के वकील रहे, बाद में Revolt of 1857 के दौरान सरकार के प्रति वफ़ादारी के पुरस्कार स्वरूप उन्हें ख़िलअत और दो गाँवों की जागीर प्रदान की गई, जिसकी आमदनी से उन्होंने अपना शेष जीवन आराम से बिताया। वो आगरा में मानद मजिस्ट्रेट के पद पर भी कार्यरत रहे।

उनकी रचनाओं में दीवान-ए-मेहर, पारा-ए-अरूज़, अयाग़-ए-फ़रंगिस्तान, मसनवी दाग़-ए-फ़िगार, दाग़-ए-दिल-ए-मेहर और मसनवी शुआ-ए-मेहर शामिल हैं, जो उनके कलात्मक वैविध्य और काव्य कौशल का प्रमाण हैं। मिर्ज़ा मेहर का निधन 1879 में हुआ।

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