इबराहीम नूरी के शेर
यज़ीद-ए-वक़्त की नींदें हराम होती हैं
हुसैन अब भी तिरे इज्तिमा-ए-चेहलुम से
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere