मेहदी इफ़ादी के लेख
हाली-ओ-शिब्ली की मु'आसिराना चशमक
विषय का नयापन चाहता था कि जहाँ तक हमारी आख़िरी महफ़िल का ताल्लुक़ है, इस लपेट में कोई छूटने न पाए, लेकिन अफ़सोस है कि सामग्री की कमी ने ज़्यादा फैलने का मौक़ा नहीं दिया और हालाँकि "चश्मक" (नोक-झोंक) का दायरा ख़ालिस हाली और शिबली की क़लम की शोख़ी से आगे
फ़लसफ़-ए-हुस्न-ओ-इशक़ (यूनानियों के नुक़्ता-ए-ख़्याल से)
औरत क्या है? वह दुनिया में क्यों आई? उसके वजूद का अंतिम उद्देश्य यानी उसका असल मक़सद क्या है? यह और इस तरह के बहुत से सवाल हैं जो एक समझदार दिमाग़ का ध्यान खींच सकते हैं और जिन पर हर ज़माने में कुछ न कुछ ग़ौर हुआ है, लेकिन इन सबका मुख़्तसर, मगर मुकम्मल
शे'र-उल-अजम पर एक फ़लसफ़ियाना नज़र
शेर-उल-अजम पर एक दार्शनिक नज़र 1 / 4 आजकल के जीवन स्तर में बड़ी मुसीबत यह है कि "दूसरा दर्जा" कोई चीज़ नहीं, या तो सिर्फ़ "लंगोटी" हो। जहाँ इससे बढ़े, फिर बीच में रुकने की गुंजाइश नहीं, एकदम से "पहला दर्जा" अपनाना होगा। विकास के सिद्धांत की