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Mehshar Afridi's Photo'

महशर आफ़रीदी

1966 | मुंबई, भारत

प्रतिष्ठित शाइर, अपनी मोहक शाइरी और प्रभावशाली पाठ के लिए मशहूर और मुशायरों की सम्मानित और लोकप्रिय शख़्सियत

प्रतिष्ठित शाइर, अपनी मोहक शाइरी और प्रभावशाली पाठ के लिए मशहूर और मुशायरों की सम्मानित और लोकप्रिय शख़्सियत

महशर आफ़रीदी के शेर

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ज़मीं पर घर बनाया है मगर जन्नत में रहते हैं

हमारी ख़ुश-नसीबी है कि हम भारत में रहते हैं

मुझे जिस हाल में छोड़ा उसी हालत में पाओगी

बड़ी ईमान-दारी से तुम्हारा हिज्र काटा है

मैं इस लिए भी हमेशा ख़मोश रहता हूँ

मिरे दिमाग़ में इक शोर मचता रहता है

'अक़्ल और 'इश्क़ लड़ते रहे देर तक

'अक़्ल मारी गई 'इश्क़ ज़िंदा रहा

तुम मुझे अपनी क़सम दे कर कहो

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तुम्हारे हुस्न को कब तक वरक़ वरक़ पढ़ते

सो एक रात में पूरी किताब पढ़ डाली

वो कुछ ग़लत नहीं था हमीं बेवक़ूफ़ थे

शीशे को साफ़ करते रहे इस तरफ़ से हम

जब तुम्हारी ये मातमी आँखें

मुस्कुराती हैं शोर थमता है

ज़रा बाहों के हल्क़े और कस लो

मोहब्बत साँस लेना चाहती है

उस की मग़रूर हवा तेज़ क़दम चलती रही

लौ लरज़ती ही रही मेरी पशेमानी की

यूँ मोहब्बत का बदल कुछ भी नहीं

सोचता हूँ इतना हक़ दे दूँ तुम्हें

विसाल-ए-यार फुर्क़तों की रुत बदल नहीं रहा

बदन क़रार पा गया है दिल सँभल नहीं रहा

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