मोहम्मद यूसुफ़ रासिख़ के शेर
समझता हूँ वसीला मग़फ़िरत का शर्म-ए-इस्याँ को
कि अश्कों से मिरे धुल जाएगा दामान-ए-तर मेरा
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere