मोहसिन आफ़ताब केलापुरी के शेर
तुम्हारी याद भी चुपके से आ के बैठ गई
ग़ज़ल जो 'मीर' की इक गुनगुना रहा था मैं
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टैग : मीर तक़ी मीर
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