मुईद रशीदी
ग़ज़ल 125
अशआर 146
इतना आसाँ नहीं लफ़्ज़ों को ग़ज़ल कर लेना
शोर को शेर बनाने में जिगर लगता है
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एक खिड़की खुली रहती है नज़र में हर दम
एक मंज़र पस-ए-मंज़र भी नज़र आता है
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ज़िंदगी हम तिरे कूचे में चले आए तो हैं
तेरे कूचे की हवा हम से ख़फ़ा लगती है
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ठहरे हुए पानी का मुक़द्दर नहीं होता
बहते हुए पानी का तक़ाज़ा है गुज़र जा
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हादसे नहीं हुए कि तज्रबा नहीं हुआ
मुख़्तसर सी ज़िंदगी में क्या से क्या नहीं हुआ
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