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मुनीर जाफ़री के शेर

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टीस उट्ठी थी कहीं ज़ेर-ए-ज़मीं और इधर

शहर का शहर मकानों से निकल आया था

मुझ को फ़क़त शजर की नुमू से है वास्ता

सहरा को साया-दार नहीं कर रहा हूँ

मुझ को फ़क़त शजर की नुमू से है वास्ता

सहरा को साया-दार नहीं कर रहा हूँ मैं

महव-ए-सफ़र हूँ ख़ित्ता-ए-दुनिया के उस तरफ़

और ख़ुद को होशियार नहीं कर रहा हूँ मैं

दिल पर पहन लिया है वो गजरे के जैसा शख़्स

लेकिन गले का हार नहीं कर रहा हूँ मैं

ये वक़्त कैफ़ियात से भरता नहीं कभी

ये जाम इख़्तियार नहीं कर रहा हूँ मैं

आवाज़ को ग़ुबार नहीं कर रहा हूँ मैं

माहौल दाग़-दार नहीं कर रहा हूँ मैं

आवाज़ को ग़ुबार नहीं कर रहा हूँ मैं

माहौल दाग़-दार नहीं कर रहा हूँ मैं

दरिया से तो मुआहिदा तय पा गया मगर

कश्ती का ए'तिबार नहीं कर रहा हूँ मैं

दिल पर पहन लिया है वो गजरे के जैसा शख़्स

लेकिन गले का हार नहीं कर रहा हूँ मैं

ये वक़्त कैफ़ियात से भरता नहीं कभी

ये जाम इख़्तियार नहीं कर रहा हूँ मैं

ये चल-चलाव मैं ने दिया है उसे 'मुनीर'

दुनिया पे इंहिसार नहीं कर रहा हूँ मैं

ये चल-चलाव मैं ने दिया है उसे 'मुनीर'

दुनिया पे इंहिसार नहीं कर रहा हूँ मैं

दरिया से तो मुआहिदा तय पा गया मगर

कश्ती का ए'तिबार नहीं कर रहा हूँ मैं

महव-ए-सफ़र हूँ ख़ित्ता-ए-दुनिया के उस तरफ़

और ख़ुद को होशियार नहीं कर रहा हूँ मैं

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