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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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नय्यर वास्ती

1901 - 1982

नय्यर वास्ती के शेर

सुब्ह-दम सह्न-ए-गुलिस्ताँ में सबा के झोंके

आतिश-ए-दर्द-ए-मोहब्बत को हवा देते हैं

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