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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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नाज़िर सिद्दीक़ी

1936 | कानपुर, भारत

नाज़िर सिद्दीक़ी के शेर

पसीना मेरी मेहनत का मिरे माथे पे रौशन था

चमक लाल-ओ-जवाहर की मिरी ठोकर पे रक्खी थी

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