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राज़ मुरादाबादी

1916 - 1982 | कराची, पाकिस्तान

राज़ मुरादाबादी के शेर

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हर इक शिकस्त-ए-तमन्ना पे मुस्कुराते हैं

वो क्या करें जो मुसलसल फ़रेब खाते हैं

किसी के वादा-ए-सब्र-आज़मा की ख़ैर कि हम

अब ए'तिबार की हद से गुज़रते जाते हैं

रंग-ओ-बू के पर्दे में कौन ये ख़िरामाँ है

हर नफ़स मोअत्तर है हर नज़र ग़ज़ल-ख़्वाँ है

जैसे निज़ाम-ए-दहर पे हो दस्तरस उन्हें

ज़ुल्फ़ें खुली उधर कि इधर रात हो गई

तग़ाफ़ुल इक हसीं धोका है नासेह

मोहब्बत आज़माई जा रही है

'राज़' क्या कहिए अभी तक लुत्फ़ क्यों जीने में है

यादगार-ए-‘इश्क़-ए-रफ़्ता इक ख़लिश सीने में है

दिल की बिसात क्या है निगाहों का ज़िक्र क्या

सूनी पड़ी है अंजुमन-ए-जाँ तिरे बग़ैर

वो कम-नज़र हैं जो देते हैं शम' को इल्ज़ाम

ख़ुद अपनी आग में जलता है आप परवाना

मुद्दतें गुज़री हैं तर्क-ए-आरज़ू को फिर भी 'राज़'

आज तक इक नक़्श-ए-हसरत दिल के आईने में है

इज़हार-ए-शौक़ 'अर्ज़-ए-वफ़ा सज्दा-ए-नियाज़

वो सामने जो आएँ तो क्या क्या कीजिए

दिल की बे-कैफ़ियों को क्या कीजे

फ़स्ल-ए-गुल है मगर बहार नहीं

रुकते नहीं हैं पा-ए-जिहत-आश्ना कहीं

मंज़िल भी एक संग-ए-निशाँ रहगुज़र में है

वो क्या छुटे हयात के 'उनवाँ बदल गए

दुनिया समझ रही है अभी जी रहा हूँ मैं

'राज़' मेरे शे'र हैं अफ़्साना मेरे 'इश्क़ का

दास्तान-ए-ज़िंदगी है शा'इरी काहे को है

लाहौर रश्क-ए-गुलशन-ए-फ़िरदौस है मगर

बे-रंग-ओ-बे-नशात है जाँ तिरे बग़ैर

रुकते नहीं हैं पा-ए-जिहत-आश्ना कहीं

मंज़िल भी एक संग-ए-निशाँ रहगुज़र में है

अल्लह-रे इल्तिफ़ात-ओ-नदामत की साज़िशें

नज़रें मिलीं तलाफ़ी-ए-माफ़ात हो गई

क्या मुझे उन के तग़ाफ़ुल में भी लुत्फ़ आने लगा

आज ये क्या है तग़ाफ़ुल में कमी काहे को है

इज़हार-ए-शौक़ 'अर्ज़-ए-वफ़ा सज्दा-ए-नियाज़

वो सामने जो आएँ तो क्या क्या कीजिए

अगर सुन ले तो नासेह 'इश्क़ हो जाए मोहब्बत से

कुछ इस अंदाज़ के खाए हैं धोके 'उम्र भर मैं ने

अब वो साक़ी वो महफ़िल रंगीं सोहबतें

ज़हर के कुछ घूँट हैं ये मय-कशी काहे को है

तर्क-ए-त'अल्लुक़ात को मुद्दत गुज़र गई

उफ़ रे हयात फिर भी जिए जा रहा हूँ मैं

वो सज्दा जिस से बू आती है ज़ाहिद हूर-ओ-ग़िल्माँ की

फ़रेब-ए-बंदगी कहिए ख़ुदा की बंदगी क्यों हो

ख़ुद किया तर्क-ए-त'अल्लुक़ हम से

ख़ुद ही रंजूर हुए जाते हैं

उन के बग़ैर नींद कहाँ चश्म-ए-शौक़ में

ये और बात है कि बसर रात हो गई

ख़ुद अपनी तजल्ली ख़ुद अपनी निगाहें

मोहब्बत में गुज़रे हैं ये भी ज़माने

हुस्न की बारगाह में झूम के 'राज़' पढ़ ग़ज़ल

फ़िक्र-ए-रसा के साथ साथ तर्बियत-ए-जिगर भी है

मैं चराग़-ए-रहगुज़र हूँ हर मुसाफ़िर के लिए

बाद-ए-सरसर हो कि तूफ़ाँ रात भर जलना मुझे

मिरी सम्त मंज़िल को बढ़ते जो देखा

मिरा साथ छोड़ा मिरे रहनुमा ने

हश्र तक अब कोई पर्दे में रहे

हम ही मंसूर हुए जाते हैं

अब तवज्जोह ही नहीं उन की तो क्या रंग-ए-हयात

मुफ़्त का इल्ज़ाम है ये ज़िंदगी काहे को है

काश जुस्तुजू ही रहे हासिल-ए-हयात

'इश्क़-ओ-तलब की मौत है तकमील-ए-आरज़ू

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