राज़ मुरादाबादी के शेर
हर इक शिकस्त-ए-तमन्ना पे मुस्कुराते हैं
वो क्या करें जो मुसलसल फ़रेब खाते हैं
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किसी के वादा-ए-सब्र-आज़मा की ख़ैर कि हम
अब ए'तिबार की हद से गुज़रते जाते हैं
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रंग-ओ-बू के पर्दे में कौन ये ख़िरामाँ है
हर नफ़स मोअत्तर है हर नज़र ग़ज़ल-ख़्वाँ है
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- ग़ज़ल देखिए
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जैसे निज़ाम-ए-दहर पे हो दस्तरस उन्हें
ज़ुल्फ़ें खुली उधर कि इधर रात हो गई
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तग़ाफ़ुल इक हसीं धोका है नासेह
मोहब्बत आज़माई जा रही है
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'राज़' क्या कहिए अभी तक लुत्फ़ क्यों जीने में है
यादगार-ए-‘इश्क़-ए-रफ़्ता इक ख़लिश सीने में है
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दिल की बिसात क्या है निगाहों का ज़िक्र क्या
सूनी पड़ी है अंजुमन-ए-जाँ तिरे बग़ैर
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वो कम-नज़र हैं जो देते हैं शम' को इल्ज़ाम
ख़ुद अपनी आग में जलता है आप परवाना
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मुद्दतें गुज़री हैं तर्क-ए-आरज़ू को फिर भी 'राज़'
आज तक इक नक़्श-ए-हसरत दिल के आईने में है
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इज़हार-ए-शौक़ 'अर्ज़-ए-वफ़ा सज्दा-ए-नियाज़
वो सामने जो आएँ तो क्या क्या न कीजिए
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दिल की बे-कैफ़ियों को क्या कीजे
फ़स्ल-ए-गुल है मगर बहार नहीं
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रुकते नहीं हैं पा-ए-जिहत-आश्ना कहीं
मंज़िल भी एक संग-ए-निशाँ रहगुज़र में है
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वो क्या छुटे हयात के 'उनवाँ बदल गए
दुनिया समझ रही है अभी जी रहा हूँ मैं
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'राज़' मेरे शे'र हैं अफ़्साना मेरे 'इश्क़ का
दास्तान-ए-ज़िंदगी है शा'इरी काहे को है
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लाहौर रश्क-ए-गुलशन-ए-फ़िरदौस है मगर
बे-रंग-ओ-बे-नशात है ऐ जाँ तिरे बग़ैर
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रुकते नहीं हैं पा-ए-जिहत-आश्ना कहीं
मंज़िल भी एक संग-ए-निशाँ रहगुज़र में है
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अल्लह-रे इल्तिफ़ात-ओ-नदामत की साज़िशें
नज़रें मिलीं तलाफ़ी-ए-माफ़ात हो गई
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क्या मुझे उन के तग़ाफ़ुल में भी लुत्फ़ आने लगा
आज ये क्या है तग़ाफ़ुल में कमी काहे को है
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इज़हार-ए-शौक़ 'अर्ज़-ए-वफ़ा सज्दा-ए-नियाज़
वो सामने जो आएँ तो क्या क्या न कीजिए
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अगर सुन ले तो नासेह 'इश्क़ हो जाए मोहब्बत से
कुछ इस अंदाज़ के खाए हैं धोके 'उम्र भर मैं ने
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अब न वो साक़ी न वो महफ़िल न रंगीं सोहबतें
ज़हर के कुछ घूँट हैं ये मय-कशी काहे को है
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तर्क-ए-त'अल्लुक़ात को मुद्दत गुज़र गई
उफ़ रे हयात फिर भी जिए जा रहा हूँ मैं
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वो सज्दा जिस से बू आती है ज़ाहिद हूर-ओ-ग़िल्माँ की
फ़रेब-ए-बंदगी कहिए ख़ुदा की बंदगी क्यों हो
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ख़ुद किया तर्क-ए-त'अल्लुक़ हम से
ख़ुद ही रंजूर हुए जाते हैं
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उन के बग़ैर नींद कहाँ चश्म-ए-शौक़ में
ये और बात है कि बसर रात हो गई
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ख़ुद अपनी तजल्ली ख़ुद अपनी निगाहें
मोहब्बत में गुज़रे हैं ये भी ज़माने
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हुस्न की बारगाह में झूम के 'राज़' पढ़ ग़ज़ल
फ़िक्र-ए-रसा के साथ साथ तर्बियत-ए-जिगर भी है
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मैं चराग़-ए-रहगुज़र हूँ हर मुसाफ़िर के लिए
बाद-ए-सरसर हो कि तूफ़ाँ रात भर जलना मुझे
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मिरी सम्त मंज़िल को बढ़ते जो देखा
मिरा साथ छोड़ा मिरे रहनुमा ने
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हश्र तक अब कोई पर्दे में रहे
हम ही मंसूर हुए जाते हैं
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अब तवज्जोह ही नहीं उन की तो क्या रंग-ए-हयात
मुफ़्त का इल्ज़ाम है ये ज़िंदगी काहे को है
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ऐ काश जुस्तुजू ही रहे हासिल-ए-हयात
'इश्क़-ओ-तलब की मौत है तकमील-ए-आरज़ू
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