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रसा चुग़ताई

1928 - 2018 | कराची, पाकिस्तान

रसा चुग़ताई

ग़ज़ल 40

अशआर 34

तुझ से मिलने को बे-क़रार था दिल

तुझ से मिल कर भी बे-क़रार रहा

कौन दिल की ज़बाँ समझता है

दिल मगर ये कहाँ समझता है

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जिन आँखों से मुझे तुम देखते हो

मैं उन आँखों से दुनिया देखता हूँ

उन झील सी गहरी आँखों में

इक लहर सी हर दम रहती है

तिरे नज़दीक कर सोचता हूँ

मैं ज़िंदा था कि अब ज़िंदा हुआ हूँ

पुस्तकें 6

 

चित्र शायरी 4

 

वीडियो 29

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ऑडियो 10

अपनी बे-चेहरगी में पत्थर था

इस से पहले नज़र नहीं आया

ज़िंदगी के सराब भी देखूँ

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