राशिद मुफ़्ती के शेर
फ़र्क़ कोई नहीं मगर है भी!
तल्ख़ दोनों हैं ज़हर भी मय भी
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दस्तक तिरे हाथ की है लेकिन
दरवाज़ा हवा से बज रहा है
सीना-ए-आदमी की बात है और
यूँ तो छलनी है सीना-ए-नय भी
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