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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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सनाउल्लाह ज़हीर

1964 - 2022 | फ़ैसलाबाद, पाकिस्तान

सनाउल्लाह ज़हीर के शेर

मैं दे रहा हूँ तुझे ख़ुद से इख़्तिलाफ़ का हक़

ये इख़्तिलाफ़ का हक़ है मुख़ालिफ़त का नहीं

उस के कमरे से उठा लाया हूँ यादें अपनी

ख़ुद पड़ा रह गया लेकिन किसी अलमारी में

मेरा ये दुख कि मैं सिक्का हूँ गए वक़्तों का

तेरा हो कर भी तिरे काम नहीं सकता

कहानी फैल रही है उसी के चारों तरफ़

निकालना था जिसे दास्ताँ के अंदर से

अपनी मस्ती कि तिरे क़ुर्ब की सरशारी में

अब मैं कुछ और भी आसान हूँ दुश्वारी में

तिरे मकाँ का तक़द्दुस अज़ीज़ था इतना

मैं रहा हूँ गली से परे उतार के पाँव

ख़ला में तैरते फिरते हैं हाथ पकड़े हुए

ज़मीं की एक सदी एक साल सूरज का

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