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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

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सुल्तान अख़्तर

1940 - 2021 | पटना, भारत

अग्रणी आधुनिक शायरों में विख्यात।

अग्रणी आधुनिक शायरों में विख्यात।

सुल्तान अख़्तर

ग़ज़ल 55

अशआर 12

मैं वो सहरा जिसे पानी की हवस ले डूबी

तू वो बादल जो कभी टूट के बरसा ही नहीं

फ़ुर्सत में रहा करते हैं फ़ुर्सत से ज़्यादा

मसरूफ़ हैं हम लोग ज़रूरत से ज़्यादा

इक ख़ौफ़-ए-बे-पनाह है आँखों के आर-पार

तारीकियों में डूबता लम्हा है सामने

सफ़र सफ़र मिरे क़दमों से जगमगाया हुआ

तरफ़ तरफ़ है मिरी ख़ाक-ए-जुस्तुजू रौशन

हमारी सादा-मिज़ाजी पे रश्क करते हैं

वो सादा-पोश जो बे-इंतिहा रंगीले हैं

पुस्तकें 8

 

वीडियो 21

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ऑडियो 20

अपनी तहज़ीब की दीवार सँभाले हुए हैं

काम आती नहीं अब कोई तदबीर हमारी

किसी के वास्ते जीता है अब न मरता है

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