सय्यद एहतिशाम हुसैन के लेख
हिंद-ए-आर्याई, मुस्लमानों की आमद से पहले
हिंदुस्तान में आर्याई ज़बान के इतिहास के बारे में अक्सर यह ख़याल ज़ाहिर किया गया है कि आज तक हिंदुस्तान का इतना व्यवस्थित और निरंतर इतिहास किसी दूसरे देश में नहीं मिलता और हर दौर में इसके विकास की निशानदेही स्पष्ट मिसालों से की जा सकती है। इसमें शक नहीं
तन्क़ीद और 'अमली तन्क़ीद
साहित्य की आलोचना के सिद्धांत क्या हैं? आलोचना से क्या तात्पर्य है? ऐसे सवालों का जवाब देने से पहले इस पर ग़ौर करने की कोशिश करनी चाहिए कि साहित्य क्या है? क्योंकि जैसे ही साहित्य के बारे में बातचीत शुरू होगी, आलोचना के सिद्धांत ख़ुद-ब-ख़ुद सामने आते
उसूल-ए-तंक़ीद
ज्ञान और कलाओं के जन्म और उनकी शुरुआत की खोज, इंसान को इतिहास के उन धुंधलकों में ले जाती है, जहाँ दिमाग़ के लिए रास्ता साफ़ नहीं होता, नियम और क़ायदे मार्गदर्शन नहीं करते और अनुमान या अधूरे ज्ञान की रोशनी सिर्फ़ इतना बताती है कि जीवन के संघर्ष ने न सिर्फ़
इक़बाल ब-हैसियत-ए-शा'इर और फ़लसफ़ी
अगर दर्शन की शुरुआत हैरत (आश्चर्य) से होती है, तो इक़बाल दर्शन की दुनिया के एक खोजी यात्री थे। अगर शायरी रूह की ऊंची उड़ान के पलों में गाया हुआ गीत है, तो इक़बाल हसीन और नायाब, असरदार और जोशीले गीतों के शायर थे। हिंदुस्तानी मुसलमानों के वैचारिक जीवन
तंक़ीद, नज़रिया और 'अमल
साहित्य की आलोचना के उसूल क्या हैं? आलोचना से क्या मतलब है? ऐसे सवालों का जवाब देने से पहले इस पर ग़ौर करने की कोशिश करनी चाहिए कि साहित्य क्या है? क्योंकि जैसे ही साहित्य के बारे में बातचीत शुरू होगी, आलोचना के उसूल ख़ुद-ब-ख़ुद सामने आते जाएँगे। साहित्य
अदब और तहज़ीब
कभी-कभी यह सवाल पूछा भी जाता रहा है और ख़ुद मेरे ज़ेहन को भी उलझाता रहा है कि किसी क़ौम की तहज़ीबी ज़िंदगी से उसके अदब का क्या ताल्लुक़ होता है। पहली नज़र में यह सवाल एक जानी-बूझी चीज़ से जुड़ा है और हर शख़्स किसी न किसी शक्ल में यह जानता है कि तहज़ीब
अख़्तर शीरानी की रूमानियत
अख़्तर शीरानी की शायरी के बारे में राय देते हुए शायद नए और अनुभवी दोनों तरह के आलोचक सबसे पहले इसी सच्चाई पर ज़ोर देंगे कि वह एक रोमानी शायर थे। रोमानियत एक ऐसी अस्पष्ट संकल्पना है कि इसके सही घटकों का पता लगाने में मुश्किलें आती हैं क्योंकि व्यक्तिगत
जदीद उर्दू शायरी और समाजी कश्मकश
इंसानों की शुरुआती सामाजिक चेतना से लेकर इस वक़्त तक उनके एहसास, अंतर्ज्ञान, रुचि और नज़रिए में जो बदलाव हुए हैं, वो उस जद्दोजहद की कहानी हैं जो समाज की बढ़ती और फैलती हुई ज़रूरतों में संतुलन क़ायम करने के लिए इंसानों ने की हैं। यह कोई आध्यात्मिक या ख़याली
मुशा'इरे की इफ़ादियत
यह सवाल मुद्दतों से पूछा जा रहा है कि मुशायरों की कोई अहमियत और उपयोगिता है या नहीं? ऐसे सवाल का जवाब "हाँ" या "नहीं" में नहीं दिया जा सकता और अगर दिया जाएगा तो यह हमारे ज़ेहन का किसी तरफ़ मार्गदर्शन नहीं करेगा। विश्लेषण करके इसकी शुरुआत, उत्कर्ष या
उर्दू शायरी में क़ौमियत
राजनीति दर्शन में क़ौम और क़ौमियत का अर्थ बहुत ही बहस का सवाल बन गया है। लेकिन साहित्य और शायरी में इसकी स्थिति इतनी उलझी हुई नहीं है क्योंकि शायर की चेतना में क़ौमियत का एहसास एक जज़्बे, एक न्यायपूर्ण अधिकार और एक मानवीय मूल्य के रूप में पैदा होता है।
नई शा'इरी का पस-मंज़र
हर इंसानी अमल (कार्य) समय और स्थान की सीमाओं के अंदर होता है। शायरी की रचना और कुछ न हो, एक अमल ज़रूर है, जो किसी न किसी तरह की आंतरिक या बाहरी प्रेरणा से वजूद में आती है। इसलिए इसके सामने आते ही प्रतिक्रिया का सिलसिला भी शुरू हो जाता है। समय और स्थान
नया अदब और तरक़्क़ी-पसंद अदब: एक मुबाहिसा
नया अदब और तरक़्क़ी पसंद अदब: एक बहस सैयद एहतेशाम हुसैन यह बहस साहित्य के उन विद्यार्थियों के लिए बहुत फ़ायदेमंद होगी जो अकादमिक स्तर पर साहित्यिक आंदोलनों की सही रूप-रेखा और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से वाक़िफ़ होना चाहते हैं। मेरा ख़याल है कि अगर
अदब में तंज़ की जगह
अगर यह सही है कि साहित्य (अदब) जीवन का तर्जुमान (प्रवक्ता) और चित्रकार होने के साथ-साथ उसका आलोचक भी है, तो आलोचना और परख के तमाम साधन, साहित्य के ज़रिए जीवन की कशमकश को समझने-समझाने और उसके विकास और पतन का विश्लेषण और इज़हार करने में लेखक की समझ (चेतना)
ज़बान और रस्म-ए-ख़त
ज़बान की राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय और सांस्कृतिक अहमियत इल्मी नज़रिए से मानी हुई बात है। देखा जाता है कि दुनिया की छोटी से छोटी और असभ्य क़ौम के पास भी ज़बान मौजूद है। ज़्यादातर लोग ऐसे हैं जिन्हें यह मसला परेशान नहीं करता कि इंसान बोलने की ताक़त से
ग़ज़ल में महबूब का बदलता किरदार
साहित्य की कुछ विधाएं इतनी जानदार और लचीली होती हैं कि विरोध के बावजूद कभी रूप और कभी रंग बदलकर अपनी ज़िंदगी का यक़ीन दिलाती रहती हैं। उर्दू ग़ज़ल का भी यही हाल है। इसका सदाबहार हुस्न यूनानी देवकथाओं की उन परियों की याद दिलाता है जो कभी बूढ़ी नहीं होतीं।
अदब का माद्दी तसव्वुर
अदब (साहित्य) और ललित कलाओं के दूसरे रूपों का ख़्वाब हमेशा बहुत ज़्यादा व्याख्याओं की वजह से परेशान रहा है। किसी तरह की भौतिक बुनियाद को न मानने की वजह से शेरो-अदब की दुनिया ज़्यादातर ख़्वाब और ख़याल की दुनिया समझी गई, जिसके न तो रास्ते तय हैं और न दिशा
अवध की अदबी फ़िज़ा (ग़दर से पहले)
पूरब की शाही और जागीरदारी तहज़ीब की आख़िरी बहार ने अपनी एक झलक उस अवध में दिखलाई जिस पर ग़दर से पहले एक ईरानी ख़ानदान ने सौ साल से कुछ ज़्यादा अरसे तक हुकूमत की। तारीखी लिहाज़ से उरूज और ज़वाल (उत्थान और पतन) की यह एक ऐसी मिली-जुली दास्तान है जिसमें
अदब में जिन्सी जज़्बा
साहित्य में यौन भावना थोड़े-बहुत फ़र्क़ के साथ यौन भावना तमाम जानदारों में पाई जाती है और एक विश्वव्यापी जैविक नियम बनकर ज़िंदगी को बाक़ी रखने का ज़रिया बनती है। इंसानी ज़िंदगी में भी इसका अमल किसी न किसी शक्ल में हर ज़माने में जारी रहा है। अगर इसकी