तालिब देहलवी के शेर
शैख़-ए-हरम का ज़िक्र नहीं है मिरे नदीम
पीर-ए-मुग़ाँ के कश्फ़-ओ-करामत की बात है
बुत-ख़ाने में भी नूर-ए-ख़ुदा देखता हूँ मैं
जी हाँ ये मेरे हुस्न-ए-अक़ीदत की बात है
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टैग : ख़ुदा
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