वली उज़लत
ग़ज़ल 60
अशआर 29
सिया है ज़ख़्म-ए-बुलबुल गुल ने ख़ार और बू-ए-गुलशन से
सूई तागा हमारे चाक-ए-दिल का है कहाँ देखें
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
ऑडियो 8
आज दिल बे-क़रार है मेरा
ख़त ने आ कर की है शायद रहम फ़रमाने की अर्ज़
ग़ैर-ए-आह-ए-सर्द नहीं दाग़ों के जाने का इलाज
अन्य शायरों को पढ़िए
-
सिराज औरंगाबादी
-
जोशिश अज़ीमाबादी
-
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
-
वलीउल्लाह मुहिब
-
शाह नसीर
-
क़ाएम चाँदपुरी
-
हसरत अज़ीमाबादी
-
नूह नारवी
-
फ़ाएज़ देहलवी
-
पन्ना लाल नूर
-
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
-
मोहम्मद रफ़ी सौदा
-
सैय्यद मोहम्मद मीर असर
-
ख़्वाजा शौक़
-
मोहम्मद अली मोज रामपुरी
-
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
-
अहमद फ़राज़
-
मीर मोहम्मदी बेदार
-
अल्लामा इक़बाल
-
गुलनार आफ़रीन