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वसीम हैदर के शेर

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क़ैद करता हूँ हसरतें दिल में

फिर इन्हें ख़ुद-कुशी सिखाता हूँ

तुझ को हो मेरे लम्स की ख़्वाहिश शदीद-तर

तुझ से तमाम 'उम्र मिरा सामना हो

सुनता रहता हूँ तो वो कुछ भी कहे जाता है

उस को लगता है कि मे'यार यही है अपना

हवस पूरी हुई जब कहीं तो 'इल्म हुआ

तिरे बदन का रहा मुझ को आसरा बड़ी देर

अब वो अच्छा मुझे पसंद नहीं

जो बुरा भी क़ुबूल होता था

मिरे ख़मीर पे सारी ही सर्फ़ हो गई थी

फिर उस के बा'द उदासी नई बनाई गई

ख़ुशबूओं का नुज़ूल होता था

पहले पत्ता भी फूल होता था

फिर तिरी मुख़्तारी-ए-'आलम का क्या

मैं ने तुझ से कुछ नहीं माँगा अगर

मरते वक़्त फ़रिश्ता बोले

कैमरा देख के हाथ हिलाएँ

मैं वो पत्थर हूँ कि वहशत में उठा कर जिस को

बे-सबब यूँही कहीं फेंक दिया जाता है

हम दु'आ को हाथ उठाए गिड़गिड़ाते रह गए

तुम ने तनज़न भी अगर कुछ बात की पूरी हुई

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