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वसीम नादिर

1974 | बदायूँ, भारत

1990 के दशक के मारूफ़ उर्दू ग़ज़ल शायर

1990 के दशक के मारूफ़ उर्दू ग़ज़ल शायर

वसीम नादिर के शेर

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मैं ख़ुशबुओं के ज़िक्र पे ख़ामोश ही रहा

हालाँकि एक फूल मिरे हाफ़िज़े में था

हम चाहते थे मौत ही हम को जुदा करे

अफ़्सोस अपना साथ वहाँ तक नहीं हुआ

बहुत तेज़ाब फैला है गली-कूचों में नफ़रत का

मोहब्बत फिर भी अपने काम से बाहर निकलती है

तुम्हारे बा'द अब जिस का भी जी चाहे मुझे रख ले

जनाज़ा अपनी मर्ज़ी से कहाँ कंधा बदलता है

उस ने ता'रीफ़ के पत्थर से किया है ज़ख़्मी

ये निशाना बड़ी मुश्किल से ख़ता होता है

लोग तो और भी अकेले हैं

तुम को एहसास कुछ ज़ियादा है

'नादिर' तुम अपनी प्यास कहाँ ले के गए

क़तरे उधार माँग के दरिया बने हैं लोग

सब लोग जो हैरत से तुझे देख रहे हैं

सर तेरा बहुत छोटा है दस्तार बड़ी है

ये सोच लो ख़ुशबू को तरस जाओगे एक दिन

फूलों को सियासत का हुनर दे तो रहे हो

एहसान कर रहा है तिरा हिज्र इन दिनों

मैं इन दिनों ख़ुदा के ज़ियादा क़रीब हूँ

हमी अकेले नहीं ज़िंदगी से हारे हुए

बहुत से लोग खड़े हैं बदन उतारे हुए

मोहब्बतों के हसीं ख़्वाब ले के आँखों में

'बशीर-बद्र' को पढ़ता हुआ वो एक लड़का

'उम्र भर दुश्मनों के साथ रहे

आग से रौशनी का काम लिया

तिरे बग़ैर भी कहती है मुझ से जीने को

ये ज़िंदगी भी सही मशवरा नहीं देती

बिछड़ कर आप से ये तज्रबा हो ही गया आख़िर

मैं अक्सर सोचता था लोग कैसे टूट जाते हैं

तुम्हें ये 'इश्क़ बिछड़ कर समझ में आएगा

चराग़ बुझते हैं तब जा के रात खुलती है

ये 'इश्क़ लाएगा उस मोड़ पर तुझे एक दिन

ग़ज़ल नहीं तू मिरा नाम गुनगुनाएगा

मोहब्बत बोझ बन कर ही भले रहती हो काँधों पर

मगर ये बोझ हटता है तो कंधे टूट जाते हैं

तुम हम को जवाँ देख के हैरान हुई हो

पहचान तो लेती कि वो बेटा है हमारा

नस्लें वहशी हो जाती हैं यार हिफ़ाज़त करने में

ख़ुश होने की बात नहीं है सहरा की सुल्तानी पर

सब अपने नाम की तख़्ती लगाए बैठे हैं

पता सभी को है ये सल्तनत ख़ुदा की है

अब इस से बढ़ के मोहब्बत किसी को क्या देगी

किसी की आँख का आँसू किसी की आँख में है

मोहब्बतों को कहीं से मदद नहीं मिलती

ये जंग ऐसी है जिस में रसद नहीं मिलती

मुझे रहना था तिरी आँख में आँसू की तरह

मैं तो नाकाम हूँ दोस्त सितारा बन कर

तुम्हें भी भीड़ में खोना पड़ेगा

तुम्हारे पास भी चेहरा नहीं है

वो चल रहा था ग़ैर के शाने पे सर रखे

मैं भी किसी के साथ उसी क़ाफ़िले में था

थकन से चूर हो कर गिर गया बिस्तर पे मैं अपने

मगर अब तक तिरी तस्वीर से बाज़ू नहीं निकले

मैं ख़ुशबुओं के ज़िक्र पे ख़ामोश ही रहा

हालाँकि एक फूल मिरे हाफ़िज़े में था

समुंदरों को बहुत हसरतों से तकते हो

तुम अपनी आँखें भी सहरा बना के छोड़ोगे

आँसू हमारा उस की हथेली पे गया

शहज़ादा आज अपनी हवेली पे गया

बस इक जुनून समुंदर में ग़र्क़ होने का

नहीं तो और नदी के उफान में क्या है

महफ़िल-ए-शे'र-ओ-सुख़न यूँ ही रहें बाग़-ओ-बहार

नस्ल-दर-नस्ल चले मीर-तक़ी-'मीर' का दुख

ऐसे मौक़े' तो असीरी में कई बार मिले

हम अगर चाहते ज़ंजीर बदल सकते थे

हवा से कह दो कि ख़ुशबू का हाथ छोड़ भी दे

अभी चराग़ की लौ को तिरी ज़रूरत है

दर्द वहीं ज़ंजीर वहीं दीवार वहीं

'इश्क़ से आख़िर झगड़ा क्या है 'आली जाह

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