आज के चुनिन्दा 5 शेर

बताऊँ क्या तुझे हम-नशीं किस से मोहब्बत है

मैं जिस दुनिया में रहता हूँ वो इस दुनिया की औरत है

असरार-उल-हक़ मजाज़

दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने दिया

जब चली सर्द हवा मैं ने तुझे याद किया

जोश मलीहाबादी

तेरा चुप रहना मिरे ज़ेहन में क्या बैठ गया

इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया

तहज़ीब हाफ़ी
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तबाह कर गई पक्के मकान की ख़्वाहिश

मैं अपने गाँव के कच्चे मकान से भी गया

शाहिद कबीर

बे-सबब बात बढ़ाने की ज़रूरत क्या है

हम ख़फ़ा कब थे मनाने की ज़रूरत क्या है

शाहिद कबीर
आज का शब्द

फ़स्ल-ए-बहाराँ

  • fasl-e-bahaaraa.n
  • فصل بہاراں

शब्दार्थ

spring season

जब फ़स्ल-ए-बहाराँ आती है शादाब गुलिस्ताँ होते हैं

तकमील-ए-जुनूँ भी होती है और चाक गरेबाँ होते हैं

शब्दकोश

Quiz A collection of interesting questions related to Urdu poetry, prose and literary history. Play Rekhta Quiz and check your knowledge about Urdu!

The Risala 'Urdu-e-Moalla' is a?
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क्या आप जानते हैं?

दत्तात्रिया

बिरिज मोहन दत्ता त्रिया कैफ़ी देहलवी (1866-1955) जो उर्दू के आशिक़ कहलाते थे, क़ादिर उल कलाम शायर, नाटककार, उपन्यासकार और निबंधकार थे। उन्होंने शुरू में अपने कलाम का न केवल मौलाना अल्ताफ़ हुसैन हाली से सुधार कराया था बल्कि अपने लेखन में उनके विचारों की पैरवी भी करते थे। दत्ता त्रिया कैफ़ी ने मशहूर मुसद्दस हाली (मद ओ जज़्र ए इस्लाम) के अनुरूप "भारत दर्पण" नाम से एक मुसद्दस (शायरी में छः पंक्तियों वाला काव्य) भी लिखी थी जो "मुसद्दस कैफ़ी" कहलाती है। यह मुसद्दस आर्य हिंदुओं की पिछली महानता वर्तमान स्थिति और भविष्य की तरक़्क़ी पर एक दिलचस्प नज़्म है।
उस मुसद्दस का एक शे'र है:
घटा कुफ़्र और जह्ल की सर से सरकी
खुलीं ब्रह्म विद्या से आंखें बशर की
दत्ता त्रिया कैफ़ी बड़े विद्वान और ज्ञानी व्यक्ति थे। उर्दू, फ़ारसी, अरबी और अंग्रेज़ी भाषाओं में तो पारंगत थे ही, संस्कृत और हिन्दी में भी दक्ष थे।
उर्दू की पहली व्याकरण की किताब "दरिया ए लताफ़त"जो फ़ारसी भाषा में सन् 1808 में लिखी गई थी,उसका उर्दू अनुवाद भी पंडित बिरिज मोहन दत्ता त्रिया कैफ़ी ने किया था।

क्या आप जानते हैं?

परवीन

परवीन शाकिर (1952-1994) अपनी छोटी सी उम्र में शोहरत और लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचीं। सन् 1976 में जब उनका पहला काव्य संग्रह "ख़ुशबू" प्रकाशित हुआ जिसका आवरण मशहूर चित्रकार सादिक़ैन साहब ने बनाया था, उसे देखकर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने मुस्कुराकर कहा था:
"मैंने तो उम्र भर में इतनी नज़्में कही हैं।" सादिक़ैन साहब ने जवाब दिया, "परवीन शाकिर ज़्यादा कहती हैं मगर अच्छा कहती हैं।"
"ख़ुशबू" का पहला संस्करण छः महीने में ही बिक गया। उसके बाद उनकी कई और किताबें प्रकाशित हुईं।
क्या आप जानते हैं कि परवीन शाकिर उर्दू शायरी की दिलनवाज़ और महबूब शख़्सियत, आमतौर पर किसी महफ़िल में होतीं, घर में होतीं तो अपने पांव से जूते उतार दिया करती थीं। आमतौर पर गाड़ी भी नंगे पांव चलाया करती थीं।

क्या आप जानते हैं?

मोमिन

मोमिन ख़ां मोमिन (1800-1852), वही जिनके बारे में कहा जाता है कि मिर्ज़ा ग़ालिब ने उनके एक शे'र
तुम मेरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता
पर अपना पूरा दीवान देने की बात कही थी। मोमिन ग़ज़लें तो कमाल की कहते ही थे, ज्योतिष विद्या में भी बड़ी महारत हासिल थी। अक्सर हिसाब लगा कर कोई बात बताते थे और वह प्रायः पूरी होती थी। तारीख़ निकालने में भी मोमिन दक्ष थे। नित नए ढंग की तारीख़ें कहते थे। अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले मोमिन घर की छत से गिर पड़े, हाथ पांव टूट गए। उन्होंने उस घटना की तारीख़ कही और भविष्यवाणी की कि मैं पांच महीने बाद मर जाउंगा। और वही हुआ,उस घटना पर कही गई तारीख़ आख़िरकार मौत की तारीख़ भी साबित हुई और उनके मज़ार पर अंकित है।
मोमिन ने कई इश्क़ किए, उनकी ग़ज़लें पढ़ कर महसूस होता है कि शायर किसी काल्पनिक नहीं बल्कि एक जीती-जागती महबूबा के इश्क़ में गिरफ़्तार है। ग़ज़लों के अलावा उन्होंने 12 मसनवियां भी लिखीं जिनमें से 6 का विषय ख़ुद उन ही का इश्क़ है। सोलह साल की उम्र में पहली मसनवी "शिकायत सितम" लिखी थी जो उनके एक इश्क़ की ही दास्तान थी।

क्या आप जानते हैं?

फ़ैज़

विश्व विख्यात शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शादी सन्1941 में ब्रिटिश नागरिक एलिस जार्ज से श्रीनगर में हुई थी और उनका निकाह शेख़ मोहम्मद अब्दुल्लाह ने पढ़ाया था। उन दोनों ने महाराजा हरि सिंह के "परी महल" में हनीमून मनाया था। एलिस का नाम कुलसूम रखा गया था लेकिन वह एलिस फ़ैज़ ही कहलाती थीं। निकाह के साथ एक अनुबंध भी हुआ था जिसमें लिखा गया था:
"एलिस को ख़ुलअ(पति से तलाक) लेने का अधिकार था और एलिस के जीवित रहते हुए फ़ैज़ को दूसरी शादी की अनुमति नहीं थी। इसके अलावा एलिस के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी फ़ैज़ की थी जबकि एलिस की कमाई पर सिर्फ़ एलिस का अधिकार था।"
दोनों की शादीशुदा ज़िंदगी बहुत कामयाब रही थी। एलिस ख़ुद भी एक सामाजिक कार्यकर्ता थीं। वह युवावस्था में ही कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गई थीं। रावलपिंडी साज़िश केस के आरोप में 1951से 1955 तक फ़ैज़ जेल में रहे।उस मुश्किल दौर में एलिस ने अपनी दोनों बेटियों की देखभाल और आर्थिक खर्चों की ज़िम्मेदारी निभाई। इस दौरान फ़ैज़ और एलिस के बीच अंग्रेज़ी में जो पत्राचार हुआ वह पुस्तकार में उर्दू में "सलीबें मेरे दरीचे में" के शीर्षक से और तत्पश्चात अंग्रेज़ी में "Dear Heart" नाम से प्रकाशित हुई।

क्या आप जानते हैं?

अकबर

अकबर इलाहाबादी पूर्वी संस्कृति और सभ्यता के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने अपनी पूरी शायरी में अंग्रेज़ी सभ्यता पर कठोर व्यंग्य से काम लिया मगर स्वयं अपने पुत्र को शिक्षा के लिए लंदन भेज दिया, जिनका नाम इशरत हुसैन था। इशरत हुसैन को भेजते समय  बहुत सारी प्रतिज्ञाएं भी लीं कि अपनी प्राच्य प्रम्परा को कभी न भूलना। एक बार इशरत का ख़त आने में बहुत देर हो गई तो अकबर इलाहाबादी ने अपना मशहूर क़तअ लिख भेजा जिसके दो शे'र मुलाहिज़ा हों;

इशरती घर की मोहब्बत का मज़ा भूल गए
खा के लंदन की हवा अह्द-ए-वफ़ा भूल गए

पहुंचे होटल में तो फिर ईद की परवा न रही
केक को चख के सिवइयों का मज़ा भूल गए

आज की प्रस्तुति

सबसे गर्म मिज़ाज प्रगतिशील शायर जिन्हें शायर-ए-इंकि़लाब (क्रांति-कवि) कहा जाता है

मेरी हालत देखिए और उन की सूरत देखिए

फिर निगाह-ए-ग़ौर से क़ानून-ए-क़ुदरत देखिए

पूर्ण ग़ज़ल देखें

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