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नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
तड़प सेहन-ए-चमन में आशियाँ में शाख़-सारों में
जुदा पारे से हो सकती नहीं तक़दीर-ए-सीमाबी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इस बस्ती के इक कूचे में
मस्ताना हाथ में हाथ दिए ये एक कगर पर बैठे थे
यूँ शाम हुई फिर रात हुई जब सैलानी घर लौट गए
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
परछाइयाँ
बस्ती के सजीले शोख़ जवाँ बन बन के सिपाही जाने लगे
जिस राह से कम ही लौट सके उस राह पे राही जाने लगे
साहिर लुधियानवी
हिंदी ग़ज़ल
तुम्हीं से प्यार जताएँ तुम्हीं को खा जाएँ
अदीब यूँ तो सियासी हैं पर कमीन नहीं
दुष्यंत कुमार
नज़्म
मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा
मर्द-ए-सिपाही है वो उस की ज़िरह ला-इलाह
साया-ए-शमशीर में उस की पनह ला-इलाह
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी
मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी
मुझ को रातों की सियाही के सिवा कुछ न मिला




