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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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जाम-ए-जहाँ-नुमा

जमशेद पेशदादयान राजवंश का चौथा सम्राट, प्राचीन ईरान का बादशाह और तहमूरस का पुत्र था। उसके कार्य-काल को प्राचीन ईरान का स्वर्ण युग कहा जाता है। जमशेद ने अपने वैज्ञानिकों की मदद से एक ऐसा प्याला बनाया था जिस में वो संसार के विभिन्न भागों को देख सकता था। कहा जाता है कि जमशेद की सत्ता,गौरव एंव प्रतिष्ठा के पीछे इस जाम की बड़ी भूमिका थी। जमशेद के बाद ये जाम ख़ुसरो या केख़ुसरो (Kayanian राजवंश के महान राजा और फ़ारसी महाकाव्य ‘‘शाहनामा’’ के एक पात्र का नाम) के हाथों होता हुआ दारा के दरबार की शोभा बना। इसी वजह से इस जाम को विभिन्न नामों से पुकारा गया। जाम-ए-जमशेद, जाम-ए-जहाँ-बीं, जाम-ए-गीती-नुमा, जाम-ए-जम, जाम-ए-ख़ुसरो आदि।

और बाज़ार से ले आए अगर टूट गया

साग़र-ए-जम से मिरा जाम-ए-सिफ़ाल अच्छा है

मिर्ज़ा ग़ालिब

जो कुछ देखा तो चाहे देख ले दो क़ुर्त मय पी कर

बिसान-ए-जाम-ए-जम अहवाल-ए-जुज़्व-ओ-कुल है शीशे में

मोहम्मद रफ़ी सौदा

जमशेद जिस ने वज़अ’ किया जाम क्या हुआ

वे सोहबतें कहाँ गईं कीधर वे नाव-ओ-नोश

मीर तक़ी मीर

सलतनत दस्त-ब-दस्त आई है

जाम-ए-जम ख़ातिम-ए-जमशेद नहीं

मिर्ज़ा ग़ालिब

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