Font by Mehr Nastaliq Web

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर

ख़ातिम-ए-सुलैमानी / मोहर-ए-सुलेमानी

    क़ुरआन में हज़रत सुलैमान के विशाल साम्राज्य का उल्लेख किया गया है। इस में उनके उस तख़्त बारे में भी बताया गया है जो हवाओं पर उड़ता था। हज़रत सुलैमान जहाँ चाहते उस तख़्त के माध्यम से पहुँच जाते थे। जीव-जंतु भी उनके अधीन थे जो उनकी भाषा भी समझते थे। परन्तु क़ुरआन और इस्लामी परम्पराओं में कहीं भी सुलैमान की अंगूठी के बारे में कोई उल्लेख नहीं मिलता। ख़ातिम-ए-सुलैमानी की पूरी कलपना इस्राईली परम्परा की देन है। इन परम्पराओं के अनुसार सुलैमान की अंगूठी पर इस्म-ए-आज़म (ईश्वर का नाम) नक़्श था। जिसकी वजह से वो तमाम जीव-जंतु पर शासन करते थे। ये भी कहा जाता है कि एक बार ये अंगूठी उनकी दासी की वजह से शैतान के हाथ में चली गई। शैतान ने उस अंगूठी का प्रयोग कर के सुलैमान का रूप धारण कर लिया और तख़्त-ए-सुलैमानी को अपने क़ब्ज़े में ले लिया। एक दिन वो अंगूठी उसकी उंगली से निकल कर दरिया में गिर गई और एक मछ्ली ने उस को निगल लिया। फिर वही मछ्ली किसी तरह शिकार हो कर सुलैमान के पास गई। उसके पेट से अंगूठी निकाल कर सुलैमान ने दोबारा सत्ता प्राप्त की। ख़ातिम-ए-सुलैमानी को महर-ए-सुलैमानी और नगीन-ए-सुलैमानी के नाम से भी जाना जाता है।

    जिस से तेरे हलक़ा-ए-ख़ातिम में गर्दूँ था असीर

    सुलैमाँ तेरी ग़फ़लत ने गंवाया वो नगीं

    इक़बाल

    हाकिम-ए-वक़्त है तुझ घर में रक़ीब बद-ख़ू

    देव मुख़्तार हुआ मिल्क-ए-सुलैमान में

    वली दकनी

    लूँ इक मुश्त-ए-ख़ाक के बदले

    गर मिले ख़ातिम-ए-सुलैमानी

    हाली

    इक पत्थर के जो टुकड़े का नासीबाँ जागा

    ख़ातिम-ए-दस्त-ए-सुलैमाँ का नगीं बन के रहा

    इक़बाल

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY
    Click on any word to get its meaning
    बोलिए