फ़न बराए फ़न
कुछ लोगों को मुझसे शिकायत है कि यह अच्छे-खासे गंभीर लेख को आम लोगों की ज़बान में पेश करके हल्का बना देता है। ख़ुदा जाने इन बुज़ुर्गों को मेरे एक इससे भी ज़्यादा चिंताजनक और बुनियादी हल्केपन के शौक़ का एहसास अभी तक क्यों नहीं हुआ। बड़े-बड़े नज़रियों और विचारधाराओं पर ग़ौर करते हुए आम तौर पर मैंने उनकी सबसे सही धारणा के बजाय सबसे लोकप्रिय धारणा को सामने रखा है। जिन दिनों बहसों का ज़ोर था, कुछ मुसलमान यह ख़बर सुनकर फूले नहीं समाते थे कि अमेरिका में एक शख़्स ने अपनी रिसर्च से साबित कर दिया है कि हज़रत ईसा का वजूद ही नहीं था। मगर इंजील (बाइबल) में मसीह की जो धारणा पेश की गई है, वह इतनी संतोषजनक है कि अगर हज़रत ईसा हमारी आँखों के सामने मौजूद होते, तो इसके अलावा और क्या होते। अगर वाक़ई उनका वजूद फ़र्ज़ी है, तो हमें इंसानी कल्पना पर नाज़ होना चाहिए कि वह ऐसे अफ़साने रच सकती है जो हक़ीक़त से ज़्यादा जानदार हों, और आम इंसानियत की मानसिक गहराई पर भी फ़ख़्र करना चाहिए कि वह आज़ाद ख़याल शोधकर्ताओं और विद्वानों की तरह जड़ नहीं है, बल्कि अफ़सानों की हक़ीक़त को समझ सकती है।
मार्क्सवादी आलोचना पर अपने विचार ज़ाहिर करते हुए भी मैंने मार्क्सवादी आलोचकों के काम को मार्क्स और लेनिन की वसीयतों से ज़्यादा अहमियत दी है। इसी तरह संतुलित स्वभाव और संतुलित दिमाग़ वाले रूसो से भी मैंने जान-पहचान बढ़ाने की कोशिश नहीं की। बल्कि रोमानी शायरों के उग्र महबूब और इमाम ज़ां ज़ाक (रूसो) को बदनाम करने में लगा रहा हूँ। मुझे एहसास है कि यह सब बहुत बड़ी शोध संबंधी ग़लतियाँ हैं। मगर मेरी भी यह मजबूरी है कि मुझे सिर्फ़ ऐसे ख़यालात से दिलचस्पी है जिन्होंने ज़िंदा इंसानों के दिलो-दिमाग़ में अच्छी या बुरी, किसी न किसी तरह की हलचल पैदा की; जो मुमकिन है कि बिगड़ी हुई शक्ल में प्रचलित हुए हों, मगर जिनसे पीढ़ियों की पीढ़ियाँ प्रभावित हुईं।
मुझे हक़ीक़त के मुक़ाबले अफ़सानों से ज़्यादा लगाव है। क्योंकि जब तक हक़ीक़त पर इंसानों की कल्पना का अमल नहीं होता, वह मुर्दा रहती है। हक़ीक़त में मायने उसी वक़्त पैदा होते हैं जब वह अफ़साना बन जाए। अजायबघर की अलमारियों के शीशे भी ज़रूर साफ़ रहने चाहिए, लेकिन मेरा दिल इंसानी दिमाग़ों की क्रिया और प्रतिक्रिया के अध्ययन में ही लगता है।
इसलिए 'कला के लिए कला' का ज़िक्र करते हुए मैं न तो यह मालूम करने की कोशिश करूँगा कि यह जुमला किसने ईजाद किया, न यह पता लगाऊँगा कि वह साल कौन-सा था और उस दिन मौसम कैसा था, न यह ग़ौर करूँगा कि इस नज़रिए के जन्मदाता का मतलब क्या था, उसने कहाँ तक इसकी पाबंदी की, उसके अनुयायी कौन-कौन थे, उन्होंने असल नज़रिए में क्या-क्या बदलाव और इज़ाफ़े किए और क्यों किए। यह मसले मुश्किल हों या आसान, मैं इन्हें हल करने का ख़याल ही अपने दिल में न आने दूँगा। 'कला के लिए कला' वाले नज़रिए के बारे में जो ख़ुशफ़हमियाँ या ग़लतफ़हमियाँ प्रचलित हो चुकी हैं, सिर्फ़ उन्हीं को बहस का विषय बनाऊँगा। क्योंकि आम इंसानों की मानसिक ज़िंदगी पर सिर्फ़ उन्हीं का असर पड़ा है।
आजकल हर मुल्क में आलोचना की एक ऐसी विचारधारा क़ायम है जिसकी राय साहित्य के सीधे और निजी प्रभाव पर नहीं, बल्कि राजनीतिक फ़ायदे-नुक़सान पर आधारित होती है। इस विचारधारा के नज़दीक अलग-अलग आदमियों के साहित्यिक स्वभाव का फ़र्क़ कोई मायने नहीं रखता। जहाँ किसी का साहित्य और कला से असाधारण लगाव देखा, फ़ौरन सौंदर्यवादियों और 'कला के लिए कला' वालों के झुंड में हाँक दिया। इन लोगों के लिए भेड़, बकरी, गधे, घोड़े सब एक हैं क्योंकि सबकी चार टाँगें हैं। बहरहाल, मुझे कुछ ऐसी शिकायत भी नहीं। मेरा तो बल्कि थोड़ा-सा फ़ायदा ही है। अगर लोमड़ी भी ऊँट का बच्चा होने के शक में पकड़ी जाने लगे, तो 'ऊँट रे ऊँट तेरी कौन-सी कल सीधी' का ताना बेअसर होकर रह जाता है। फिर तो ऊँट में लोमड़ी जैसी लचकदार कमर, चिकने-चिकने सफ़ेद बाल, समझ-बूझ, फुर्ती हर चीज़ साबित की जा सकती है। इसलिए 'कला के लिए कला' की जो भी परिभाषा तय की जाए, इसके चाहने वालों में जिन लोगों को चाहे शामिल किया जाए, मुझे सब क़बूल है।
वैसे 'कला के लिए कला' का जुमला सुनकर मेरे ज़ेहन में तीन अलग-अलग धारणाएँ पैदा होती हैं।
(1) कुम्हार को मालूम है कि मैं जो घड़ा बना रहा हूँ, उसमें पानी रखा जाएगा। यह हक़ीक़त उसकी चेतना में इस तरह समा चुकी है कि अब उसे इसका ख़याल भी नहीं आता और न कभी उसके दिल में ऐसा घड़ा बनाने की ख़्वाहिश पैदा होती है जिसमें पानी रखा ही न जा सके। जिस तरह मिट्टी का इस्तेमाल उसके काम की एक पहले से तय की हुई शर्त है, उसी तरह घड़े की उपयोगिता भी। वह इन शर्तों को तक़रीबन स्वाभाविक रूप से स्वीकार करता है। अब उसका पूरा ध्यान इस बात पर लगता है कि मैं घड़े को अपनी क्षमता भर ख़ूबसूरत बनाऊँ। उसे कला की उपयोगिता से इनकार नहीं है। क्योंकि घड़ा बनाने का ख़याल ही उसे एक भौतिक ज़रूरत के तहत आया है। मगर उसके ध्यान का केंद्र सौंदर्य का तत्व है। यही रवैया एक अदीब (लेखक) और शायर का भी हो सकता है, बल्कि किसी न किसी हद तक हर कामयाब कलाकार का होना चाहिए। वरना कला का सम्मान किए बग़ैर कला पैदा नहीं हो सकती। इसलिए इस हद तक तो हर कलाकार 'कला के लिए कला' का क़ायल होता है।
अगर समाज में तालमेल, एकाग्रता और केंद्रीयता हो, तो चाहे वैचारिक तौर पर कला का एक ख़ास उपयोगी मक़सद ही क्यों न समझा जाता हो, मगर ऊपर बताई गई क़िस्म की कला-भक्ति का वजूद ज़रूरी हो जाता है। अगर रूस में ख़ालिस और तालमेल से भरी साम्यवादी (कम्युनिस्ट) सभ्यता कभी मुकम्मल हुई, तो उस दौर के रूसी भी कला-भक्ति से नहीं बच सकेंगे।
(2) आंतरिक रूप से तालमेल वाले समाज में हर शारीरिक और मानसिक काम का मक़सद और रास्ता, फ़र्ज़, काम करने का तरीक़ा और जीवन-व्यवस्था में उसकी जगह तय होती है। एक काम न तो दूसरे काम की ज़रूरतों और संबंधों को हड़प सकता है, न उसके हक़ में अपनी ज़रूरतों से पीछे हट सकता है। इसलिए कला की जगह भी इस तरह तय होती है कि लोग इसे कला ही समझकर अपनाते हैं। किसी और काम का विकल्प समझकर नहीं। टी. एस. इलियट ने कहा है कि 'कला के लिए कला' के असली मायने तो बस सत्रहवीं और अठारहवीं सदी के लोग समझते थे। इसका मतलब यही है कि उस ज़माने में लोग कला को न तो आर्नल्ड की तरह मज़हब की जगह देना चाहते थे, न ऑस्कर वाइल्ड की तरह पूरी ज़िंदगी की, न कम्युनिस्टों की तरह सियासत की। यह नज़रिया उपयोगिता को कला की हदों से बाहर नहीं करता। यह बात तो अलग-अलग हर सभ्यता पर निर्भर है कि वह कला में उपयोगिता चाहती है या नहीं, और चाहती है तो किस क़िस्म की उपयोगिता।
यह मानसिकता किस क़िस्म की होती है और इससे जो कला की धारणा पैदा होती है, उसकी कैफ़ियत (स्थिति) क्या होती है। इन सब बातों को असंतुलित समाज में रहने वाले पूरी तरह नहीं समझ सकते। एक चेतावनी यह भी ज़रूरी है कि अलग-अलग मानसिक कारकों की अलग-अलग जगह तय करने के मायने यह नहीं हैं कि इन फ़र्क़ को राजनीतिक संविधान या दंड संहिता की शक्ल में लिख दिया गया हो। इनमें से कुछ हदबंदियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें संतुलित समाज के लोग ध्यान में तो रखते हैं, मगर उनकी प्रकृति बयान नहीं कर सकते। इनको अल्फ़ाज़ की शक्ल में रूप देने की ज़रूरत संतुलन बिगड़ने के बाद होती है, ताकि इनका विरोध या समर्थन किया जा सके। बहरहाल, कला और ज़िंदगी में फ़र्क़ करने की क्षमता संतुलित समाज के संतुलन का एक ज़रूरी इज़हार (अभिव्यक्ति) है।
(3) 'कला के लिए कला' (फ़न बराए फ़न) का सबसे लोकप्रिय विचार यह है कि कलाकार जीवन की तमाम दिलचस्पियों से बेपरवाह होकर बस सौंदर्यपरक संतुष्टि के पीछे पड़ा रहे। यह विचार इस लिहाज़ से तो बेतुका है कि शुद्ध कला का मुकम्मल नमूना कम से कम साहित्य में तो उपलब्ध हो नहीं सकता। अलबत्ता यह ज़रूर मुमकिन है कि कोई कलाकार सौंदर्य-पूजा की धुन में अपने अनुभवों को सीमित कर ले और इस तरह अपनी रचनाओं को नुक़सान पहुँचाए। जिस तरह आजकल बहुत से लोग इस कोशिश में लगे हैं कि कला को जीवन बना दें, उसी तरह साठ-सत्तर साल पहले पश्चिम में दो-चार लोगों ने चाहा था कि सारी ज़िंदगी को कला बना दें या ज़िंदगी को ऐसा निचोड़ें कि उसमें कला के सिवा कुछ रह ही न जाए... और कला भी अपने हल्के से हल्के मायनों में। इन लोगों की यह कोशिश बेकार गई और बेकार जानी भी चाहिए थी। इस भद्दी शक्ल में यह नज़रिया शायद ही किसी बड़े कलाकार ने क़बूल किया हो।
अलबत्ता इतना ज़रूर हुआ कि जब लोगों को कला और दूसरे मानसिक कारकों का फ़र्क़ जानने की फ़िक्र हुई तो वे इस नतीजे पर पहुँचे कि कला की रूह सौंदर्यपरक संतुष्टि है। अब कलाकार यह कोशिश करने लगे कि अपनी रचनाओं में ज़्यादा से ज़्यादा सौंदर्यपरक संतुष्टि प्रदान करें। मगर व्यावहारिक तौर पर मुझे कोई ऐसा समझदार कलाकार नज़र नहीं आता जिसने इस नज़रिए पर यक़ीन लाने के बाद ज़िंदगी के सबसे अहम पहलुओं को नज़रअंदाज़ कर दिया हो या उनसे दिलचस्पी ख़त्म कर दी हो, या महज़ सौंदर्यपरक संतुष्टि का रसिया बनकर रह गया हो। ज़्यादा से ज़्यादा यह गुमान मुझे गोएथे के बारे में हो सकता है। मगर ख़ुदा जाने क्यों, मुझे गोएथे से कोई लगाव ही नहीं होता। इसलिए मैंने उसकी तहरीरें बहुत कम पढ़ी हैं। बिना जाने-बूझे उसे सज़ा के लायक़ कैसे क़रार दे दूँ।
इसके अलावा एज़रा पाउंड ने दुनिया के बेहतरीन साहित्य का पाठ्यक्रम तय करते हुए बोदलेयर को नज़रअंदाज़ कर दिया है और गोएथे को रखा है, आख़िर कोई तो बात होगी ही। हालाँकि 'कला के लिए कला' की जो शक्ल असल में नुक़सानदेह थी, उस पर तक़रीबन अमल हुआ ही नहीं, छुटभैयों की तो मैं बात ही नहीं कर रहा, मगर आम तौर से लोग 'कला के लिए कला' का मतलब वही समझते हैं और इसी हैसियत से इस नज़रिए का विरोध होता है। पिछले सौ साल के दौरान कलाकारों ने संन्यासियों की तरह कला की पूजा की है और इसकी ख़ातिर हर क़िस्म की क़ुर्बानियाँ दी हैं। इसलिए शायद इस ग़लतफ़हमी के लिए भी गुंजाइश निकल आती है। मगर एक ख़ास राजनीतिक पार्टी का यह रवैया भी रहा है कि जिस कलाकार में अपने ढंग की राजनीति नज़र न आई, उसे सौंदर्य-पूजक की गाली दे दी।
ख़ैर, यूँ है तो यूँ ही सही। मैं 'कला के लिए कला' का यह अर्थ भी क़बूल करता हूँ और सौंदर्य-पूजकों की पूरी फ़ेहरिस्त भी जिसमें बोदलेयर, वेर्लेन, रैंबो, मालार्मे, वालेरी, ज़ीद सब शामिल हैं, बल्कि मैं तो सर्रियलिस्टों को भी इन्हीं में मिलाए देता हूँ। हालाँकि वे 'कला के लिए कला' तो दूर की बात है, कला के भी प्रशंसक नहीं थे, बल्कि कला को बिल्कुल ही ख़त्म करना चाहते थे। इसका एक तर्क तो यह है कि ठुकराए हुए और धिक्कारे हुए तो ये लोग भी हैं। दूसरे, इस समूह के अगुआ आंद्रे ब्रेतों ने अभी '49 में कहा है कि हम लोग अब भी आधुनिक दौर की उस महान परंपरा के क़ायल हैं जो बोदलेयर से शुरू होती है। इस परंपरा की श्रेणी में जिन लोगों की गिनती होती है, उनके आपस के वैचारिक मतभेद चाहे जो भी हों, मगर पहली नज़र में यही ख़याल आता है कि ये लोग कला को अपने आप में एक मक़सद समझते हैं और कला से सिर्फ़ सौंदर्यपरक आनंद हासिल करना चाहते हैं।
चलिए इस गुमान ही को हक़ीक़त समझिए। अब हम नज़रियों पर बहस नहीं करेंगे, यह भी याद नहीं रखेंगे कि रैंबो को 'कला के लिए कला' का नज़रिया क़बूल नहीं हो सकता था और वालेरी ने शुद्ध शायरी के विचार को बेतुका बताया था। हम सबको एक ही थैली के चट्टे-बट्टे समझे लेते हैं। अब हम नज़रियों को छोड़कर इन लोगों का अमल देखेंगे। हम ग़ौर करेंगे कि जब ये लोग रचना की तरफ़ आए तो उन्होंने क्या किया? महज़ हुस्न के पीछे भटकते फिरा किए या उनकी जिज्ञासा उन्हें और मैदानों में भी ले गई? सौंदर्यशास्त्र का प्रशंसक बनने के बाद उनकी ज़िंदगी कम पानी वाली नदी बनकर रह गई या उसमें समंदर का सा उफ़ान आ गया? क्या ये लोग भलाई और सच्चाई के विचारों से बिल्कुल ही किनारा कर गए? क्या इन लोगों में किसी नैतिक कशमकश के आसार नहीं मिलते? क्या यह हक़ीक़त है कि ये लोग सौंदर्यपरक संतुष्टि के अलावा अगर किसी चीज़ की तरफ़ माइल होते हैं तो दूषित भावनाओं और नैतिक विनाश की तरफ़? क्या ये लोग ज़िंदगी से मुँह मोड़कर मौत की तरफ़ जा रहे हैं? अब हम इन सब सवालों के जवाब ढूँढेंगे। नज़रियों में नहीं बल्कि रचनाओं में।
उन्नीसवीं सदी के पहले पचास साल तक आलोचना का आम और हावी रुझान यही था कि साहित्य के मक़सदों में फ़ायदा और आनंद दोनों चीज़ें शामिल हैं। इसके बाद या तो फ़ायदे की शर्त बिल्कुल ही उड़ा दी जाती है या उसका ज़िक्र दबी ज़बान से होता है। नज़रिया बनाने वालों के ज़ेहन में आनंद का विचार जितना भी ऊँचा और महान हो, वह अलग चीज़ है। मगर आम आदमी इस लफ़्ज़ का मतलब बहुत ही मामूली क़िस्म का मज़ा लेना या सुरूर समझता है। एक ख़ास राजनीतिक झुकाव रखने वाली आलोचना इसी अर्थ पर ज़ोर देती है ताकि चंद अदीबों के बारे में आम लोगों का यह यक़ीन और मज़बूत हो जाए कि ये तो दिन-रात पीनक में पड़े सौंदर्यपरक संतुष्टि की चुस्कियाँ लेते रहते थे। यह बात सच है कि इस समूह के शायर सौंदर्यपरक रूप को मुकम्मल करने पर अपना पूरा ज़ोर लगाते हैं। मगर उन्हें अपनी रचनाओं या रचनात्मक संघर्ष में कुल मिलाकर जो मज़ा मिलता था, उसके चंद नमूने देख लीजिए।
बोदलेयर से यह महान परंपरा शुरू होती है। रैंबो ने उसे शायरों का बादशाह बल्कि ख़ुदा कहा है। इस ख़ुदा ने अपनी सौंदर्यपरक संतुष्टि के लिए एक मानसिक जन्नत तैयार की है। जब वह इस जन्नत का लुत्फ़ लेने के लिए वहाँ पहुँचता है तो उसे जो कुछ नज़र आता है, उसका ख़ुलासा आप भी मुलाहज़ा फ़रमाइए:
ऐ वीनस! तेरे द्वीप में मुझे बस एक प्रतीकात्मक सलीब खड़ी मिली जिस पर मेरी ही छवि लटकी हुई थी... ऐ मेरे आक़ा, मुझे इतनी ताक़त और हिम्मत अता फ़रमा कि मैं अपने दिल और अपने जिस्म को ग़ौर से देख सकूँ और मुझे घिन न आए!
फिर जब बोदलेयर ख़ुदा की बनाई हुई दुनिया की तरफ़ आकर्षित होता है तो उसे निम्नलिखित लुत्फ़ हासिल होता है:
महान जंगलो! तुमसे मुझे उतना ही डर लगता है जितना पुराने गिरजाघरों से। तुम तूफ़ानों की तरह चिंघाड़ते हो और हमारे शापित और धिक्कारे हुए दिल भी, जो हमेशा के मातम और मौत की शाश्वत कराहों का पालना हैं, तुम्हारे विलाप के जवाब में गूँज उठते हैं...
समंदर के भयानक ठहाके में मुझे किसी हारे हुए और बेबस इंसान की कड़वी हँसी सुनाई देती है जिसमें आहें और गालियाँ भरी हों!
महबूब से मुहब्बत जताने बैठता है तो उसे हिदायत करता है कि:
तू उस वक़्त तक मेरी बराबरी करने वाली नहीं हो सकती जब तक कि तू किसी के लिए दरवाज़ा खोलते हुए ख़ौफ़ज़दा न हो, तुझे हर तरफ़ मुसीबत ही मुसीबत नज़र न आए, घंटा बजे तो तू काँप न उठे।
अब आधुनिक दौर के सबसे बड़े अगुआ रैंबो को देखिए कि उनकी पीनक का क्या रंग है:
मैं ज़हर का पूरा प्याला चढ़ा गया हूँ... मेरी अंतड़ियाँ जल रही हैं। ज़हर के ज़ोर से मेरे अंगों में ऐंठन है, मेरी शक्ल बिगड़ी जा रही है। मैं बिल्कुल ढह गया हूँ, मैं प्यास के मारे मर रहा हूँ, मेरा दम घुट रहा है। मैं चीख़ तक नहीं सकता, यह जहन्नुम है, अनंत पीड़ा! ज़रा देखो आग कैसे भड़क उठी है! मैं भुना जा रहा हूँ।
उन्हें शोलों के आशियाने में सोता छोड़कर आगे बढ़िए और देखिए कि दूसरे इमाम लोत्रियामों किस तरह के आनंद में मग्न हैं,
लोत्रियामों का काल्पनिक नुमाइंदा मालदोरोर दूर समंदर में उतर गया है। वहाँ उसे एक शार्क मछली मिलती है। दोनों की आँखें यह कहती मालूम होती हैं कि यह मुझसे भी ज़्यादा भयानक है, आख़िर वह मछली को चूमता है और उससे लिपट जाता है। दो मज़बूत जांघें जोंकों की तरह इस ख़ौफ़नाक मछली की चिपचिपाती हुई खाल के इर्द-गिर्द लिपट जाती हैं, बाज़ू और गलफड़े महबूब के जिस्म को बड़े प्यार से आग़ोश में ले लेते हैं, उनके गले और सीने एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं और दोनों में से समुद्री पौधों की गंध के भभके उठने लगते हैं... वे दोनों एक लंबी, पवित्र और ख़ौफ़नाक हम-आग़ोशी में मसरूफ़ हो जाते हैं।
आख़िर में मुझे एक ऐसी हस्ती मिल गई थी जो मेरे जैसी थी। आइंदा से मैं ज़िंदगी में तन्हाई महसूस नहीं करूँगा! उसके ख़यालात भी बिल्कुल मेरे ही जैसे थे! मेरी पहली महबूबा मेरे सामने थी!
मैं आपको लेख के शुरू में ही डराना तो नहीं चाहता था मगर सौंदर्यपरक संतुष्टि का तमाशा दिखाने के लिए यह मंज़र भी पेश करना पड़ा। मगर अभी आप नाक-भौं न चढ़ाइए। नाराज़गी और निंदा के लिए बहुत वक़्त है। पहले यह और देख लीजिए कि आधुनिक दौर की महान परंपरा के नए इमामों यानी आंद्रे ब्रेतों और फ़िलिप सूपो पर कैसे सुरूर छाए हैं,
हमारा मुँह खोए हुए साहिलों से भी ज़्यादा सूखा है। हमारी आँखें बिना किसी उम्मीद के, बिना किसी मक़सद और मंज़िल के घूमती रहती हैं... शानदार स्टेशनों पर भी हमें पनाह नहीं मिलती... हर चीज़ अपनी जगह पर है और अब कोई आदमी बात नहीं कर सकता। हर अहसास मुर्दा हो गया है और अंधे भी हमसे बेहतर हैं... सारी ज़मीन की महान मुस्कान हमारे लिए काफ़ी साबित नहीं हुई... यह नेमत हर दस्तरख़्वान पर मज़ा देगी। मगर अफ़सोस कि हमें भूख ही नहीं रही!
यह तो दो-तीन मिसालें हैं। इस दौर में हर आदमी के यहाँ क़दम-क़दम पर ऐसे ही गहरे रूमानी दर्द और तकलीफ़ का इज़हार मिलता है। इस तत्व की मौजूदगी में इन लोगों की रचनात्मक कोशिशों को सिर्फ़ और महज़ मज़े लूटने या सौंदर्यपरक आनंद तक सीमित कर देना जायज़ नहीं। अगर ज़रा से लुत्फ़ की ख़ातिर इन लोगों ने यह आत्मिक पीड़ा क़बूल की है तो इनकी हिम्मत वाक़ई दाद के क़ाबिल है। इस आत्मिक तकलीफ़ की एक व्याख्या यह हो सकती है कि ख़ुद को पीड़ा देना इनके स्वभाव में शामिल था और नज़्में लिख-लिखकर वे यही तलब पूरी करते थे। इससे तो इनकार नहीं किया जा सकता मगर मनोविज्ञान से इस बात की व्याख्या नहीं हो सकती कि इनकी ख़ुद को पीड़ा देने की आदत यही शक्ल क्यों अख़्तियार करती है। ये लोग बड़े-बड़े पराभौतिक (metaphysical) सवाल पूछते हैं। इंसान क्या चीज़ है? ब्रह्मांड में इंसान की क्या जगह है? ब्रह्मांड में बुराई का वजूद क्यों है? वग़ैरह-वग़ैरह। जब इन सवालों का जवाब नहीं मिलता, या फिर सुकून देने वाला जवाब नहीं मिलता तो इनके अंदर वह ग़म-ओ-ग़ुस्सा और तकलीफ़ पैदा होती है जिसकी मैंने मिसालें दीं।
अगर ये लोग यौन चीज़ों का ज़िक्र करते हुए झेंपते तो ख़ैर हम कह सकते थे कि इनकी ख़ुद को पीड़ा देने की आदत ने निकास का यह रास्ता ढूँढा है और अपने-आप को तकलीफ़ पहुँचाने के लिए हल न हो सकने वाले पराभौतिक मसलों का झगड़ा निकाला है। मगर जैसा कि आपने देखा, इन लोगों ने शर्म-ओ-हया बिल्कुल उतार कर रख दी है, यौन भटकाव के इज़हार में उन्हें हमारा-आपका तो क्या, बहू-बेटियों का भी लिहाज़ नहीं होता। इसलिए मनोवैज्ञानिक बहानों से भी काम नहीं चलेगा। अगर ये लोग इतना दर्द अपने अंदर समेटे हुए हैं तो इसका मतलब यह है कि उन्हें सौंदर्यपरक संतुष्टि या मज़े लूटने, या ख़ुद को पीड़ा देने से किसी बड़ी चीज़ की फ़िक्र है जो इतनी अहम मालूम होती है कि इतनी तकलीफ़ से दो-चार होने के बाद भी इनकी आत्मिक कोशिश में फ़र्क़ नहीं आता और इनका संघर्ष बराबर जारी रहता है।
अब एक नया सवाल पैदा होता है। अगर इन लोगों की रचनात्मक कोशिशों का मक़सद सौंदर्यपरक संतुष्टि से कुछ ज़्यादा था तो 'कला के लिए कला' (फ़न बराए फ़न) का दम भरने की क्या ज़रूरत थी? अगर इनकी रचनाओं में नैतिक मसले, ब्रह्मांडीय सवाल और एक दिल पिघला देने वाली शाश्वत लगन मिलती है तो अपने नज़रियों में कला को महज़ सौंदर्यपरक अहसास के प्रदर्शन तक सीमित कर देने में क्या तुक थी? इन लोगों के बारे में मशहूर है कि इनके लिए ज़िंदगी में सबसे बड़ी चीज़ कला है। इन्हें यह गवारा नहीं कि हमारी कला पर धार्मिक, नैतिक या राजनीतिक पैमाने लागू किए जाएँ।
जैसा कि आप जानते हैं, किसी न किसी तरह की थोड़ी-बहुत नैतिक प्राथमिकताओं के बिना कोई साहित्यिक रचना नहीं रची जा सकती। तमाम प्रचलित पैमानों को छोड़ने के बाद इनके लिए लाज़िमी हो गया कि साहित्यिक रचना के साथ-साथ मूल्य भी रचें। अगर उन्हें सिर्फ़ और महज़ संतुष्टि की तलाश थी तो उन्होंने प्रचलित पैमानों को छोड़कर बहुत बड़ी बेवक़ूफ़ी की और अपने सिर दोहरी मेहनत ले ली। इनके लिए सबसे आसान रास्ता तो यह था कि जिस तरह के मूल्य भी मयस्सर आते, क़बूल करते और उनकी बुनियाद पर अपना सौंदर्यपरक नक़्श बनाते। मगर इन सौंदर्य-पूजकों को ग़ैर-सौंदर्यपरक चीज़ों के ख़िलाफ़ इतनी गर्मी दिखाने और अपनी कला को तमाम प्रचलित धारणाओं से आज़ाद कराने की परेशानी क्यों हुई?
उन्नीसवीं सदी के मध्य में बहुत से पढ़े-लिखे लोगों का विश्वास धर्म पर से उठ गया था। जो ज़्यादा संवेदनशील थे, वे और चीज़ों को भी शक की नज़र से देखने लगे थे। यह प्रक्रिया और इसके कारण और परिणाम कोई ऐसी ढकी-छिपी बातें नहीं हैं। इसलिए मैं संक्षेप से काम लूँगा। एक ख़ास हलक़े के ख़याल में यह सब मध्यम वर्ग के पतन की निशानियाँ हैं। यह राय भी अपनी जगह दुरुस्त है मगर साहित्य के विद्यार्थी की तसल्ली के लिए इतनी बात काफ़ी नहीं। मार्लो के ज़माने में और उससे भी सौ साल पहले वियों के ज़माने में तो मध्यम वर्ग का पतन तो अलग रहा, तरक़्क़ी भी पूरी तरह शुरू नहीं हुई थी। अलबत्ता कुछ-कुछ आसार ज़रूर नज़र आने लगे थे। मगर इन दोनों शायरों की निजी ज़िंदगी और रचनाएँ कई अहम बातों में हमारे विचाराधीन शायरों की ज़िंदगी और रचनाओं से मिलती-जुलती हैं। ख़ासकर वियों में तो ठेठ इसी तरह का दर्द और तकलीफ़ मिलती है जो वेर्लेन और रैंबो में है। चुनाँचे साहित्य में विश्वव्यापी संशयवाद की प्रक्रिया का अध्ययन करते हुए हमें अपनी पड़ताल की शुरुआत पुनर्जागरण (Renaissance) के दौर से करनी पड़ेगी जब विभिन्न प्रभावों के अधीन चर्च, बल्कि धर्म से असंतोष का सिलसिला शुरू हुआ।
धर्म की सच्चाई या ज़रूरत आपको स्वीकार हो या न हो, एक बात माननी पड़ती है कि आम आदमी को धर्म दो-चार बड़ी तकलीफ़देह समस्याओं से सुरक्षित रखता है। उदाहरण के लिए, एक तो सवाल है ब्रह्मांड में बुराई के वजूद का, दूसरा सवाल है व्यक्तिगत अस्तित्व (अमरता) का। तीसरा मामला है इस दुनिया में इंसान की हैसियत का। मैं यह दावा नहीं करता कि धर्म इन मसलों को दो और दो चार की तरह हल कर देता है या धर्म पर ईमान लाने के बाद आदमी को इस क़िस्म की कोई चिंता होती ही नहीं। लेकिन इतनी बात है कि धर्म में आपको ज़रूरी तौर पर दो-चार बातों पर अगर-मगर किए बिना ही ईमान लाना पड़ता है, और इन बुनियादी मान्यताओं को मान लेने के बाद एक ऐसा तार्किक ढांचा बन जाता है जो एक आम आदमी की आध्यात्मिक समस्याओं को संतोषजनक तरीक़े से हल कर देता है। लेकिन इन बुनियादी मान्यताओं को छोड़ दिया जाए तो ये समस्याएं ऐसी ख़ौफ़नाक शक्ल अख़्तियार कर लेती हैं कि अभी तक इंसानी दिमाग़ इन्हें हल नहीं कर सका है, और हल सोचा भी है तो यह कि ऐसी बातों से कन्नी काट कर निकल जाओ।
मगर कलाकार के लिए मुसीबत यह है कि वह अनुभवों से आँखें नहीं चुरा सकता। नतीजा यह है कि उसे लगातार दर्द और पीड़ा की शिद्दत बर्दाश्त करनी पड़ती है। वियों और मार्लो ने शुरू में ही महसूस कर लिया था कि यह धर्महीनता हमें कैसे-कैसे कुएं झांकवाएगी। मार्लो का शैतान तक यह स्वीकार करता है कि ख़ुदा से बिछड़ जाना नरक की यातनाओं से भी बड़ी यातना है। वियों एक और बात भी महसूस करता है, वह यह कि पूंजीवादी व्यवस्था में इंसान की क्या गत बनने वाली है। इसलिए समाज की तरफ़ से भी अनिश्चितता की नींव पड़ चुकी है। संदेहवाद की विभिन्न क़िस्में अपनी अत्यंत भयानक शक्ल में आधुनिकता के कवियों के यहाँ ज़ाहिर होती हैं। अब समाज सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से भी असंतुलित हो चुका है और इसकी व्यवस्था में इतनी जान नहीं रही कि सब व्यक्तियों को एक सूत्र में जोड़े रखे, या उनसे वफ़ादारी की मांग मनवा सके।
विज्ञान ने ख़ुदा को ब्रह्मांड से बेदख़ल कर दिया था, मगर विज्ञान उन सवालों का कोई जवाब न दे सका, जिन्हें ख़ुदा की संकल्पना किसी न किसी तरह हल कर देती थी। इसलिए कलाकारों को विज्ञान पर भी भरोसा न रहा। उन्नीसवीं सदी का एक नया देवता था तरक़्क़ी, लेकिन तरक़्क़ी का अर्थ अगर सिर्फ़ कहीं न कहीं चलते रहना है तो जैसा राँबो ने कहा था, यह भी मुमकिन है कि दुनिया घूम-फिर कर वहीं आ जाए जहाँ से चली थी। संक्षेप में यह कि कलाकार, धर्म, विज्ञान, देश और क़ौम, परिवार, नैतिक विचारों—सबसे विरक्त होता चला गया क्योंकि उसकी दुनिया में कोई केंद्रीय विचार नहीं रहा था जिससे ये सब चीज़ें बंधी रह सकें।
लेकिन चूंकि इन विचारों की पकड़ आम लोगों पर बाक़ी थी और अलग-अलग लोग अलग-अलग तरीक़ों से इस श्रद्धा को अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे थे, इसलिए कलाकार और भी चौकन्ना हो गया। इसलिए हम देखते हैं कि सौंदर्यपरक संतुष्टि प्राप्त करने और प्रदान करने के अलावा वह एक और काम ज़रूर कर रहा है, यानी हर प्रचलित विचार से इंकार। कम से कम उसमें यह ख़्वाहिश ज़रूर नज़र आती है कि धोखा नहीं खाऊंगा और अपनी कला में खोट की मिलावट नहीं होने दूंगा। अगर किसी ग़ैर-सौंदर्यपरक विचार की ज़रूरत पड़ी तो ख़ुद ढूंढ लूंगा। दूसरों की बात का यक़ीन नहीं करूंगा।
कलाकार की दुनिया में उसका सौंदर्य-बोध या स्नायविक अनुभव (nervous experience) वह आख़िरी चीज़ रह गई थी जिस पर वह यक़ीन कर सके। हालांकि थोड़े ही दिन बाद उसे इस चीज़ पर भी शक होने लगा। अपने आप से ईमानदारी बरतने और मिलावटों से पाक रहने की लगन थी जिसने 'फ़न बराए फ़न' (कला के लिए कला) के सिद्धांत को जन्म दिया। कलाकार ज़िंदगी से या नैतिक समस्याओं से भाग नहीं रहा था। अलबत्ता उसे दूसरों के पेश किए गए हल मंज़ूर नहीं थे। 'फ़न बराए फ़न' का नज़रिया कोई पनाहगाह नहीं था, बल्कि युद्ध का मैदान था। कलात्मक बोध के अलावा तमाम मूल्यों को रद्द करके कलाकार ज़बरदस्ती ओखली में अपना सिर दे रहा था। आधुनिक युग से पहले कलाकार आसानी से कह सकते थे कि हमारी कला का मक़सद लाभ भी है और आनंद भी। क्योंकि उनके ज़ेहन में लाभ का स्पष्ट विचार मौजूद था। मगर नए कलाकार के पास नफ़ा-नुक़सान का कोई बना-बनाया पैमाना नहीं था। उसे तो ख़ुद तजुर्बे करके पता लगाना था कि नफ़ा क्या होता है और नुक़सान क्या। अगर उसने लाभ का ख़याल छोड़ दिया तो वह मजबूर था।
कला पर किसी और क़िस्म के पैमाने लागू न करने का व्यावहारिक अर्थ यह होता है कि कलाकार किसी संस्था या प्रचलित विचार की मदद स्वीकार करने को तैयार नहीं है, बल्कि महज़ अपने बलबूते पर हक़ीक़त की तलाश करना चाहता है। भले ही आख़िर में उसे हक़ीक़त उन्हीं संस्थाओं में मिले। 'फ़न बराए फ़न' हर क़िस्म की आसानियों, प्रलोभनों और स्वार्थों से सुरक्षित रहकर इंसानी ज़िंदगी की बुनियादी हक़ीक़तों को ढूंढने की ख़्वाहिश का नाम है। देखने में तो यह बात ज़रूर आपत्तिजनक मालूम होती है कि इस नज़रिए में एक आदमी के निजी अनुभवों को सबसे बड़ा पैमाना माना गया है। मगर इस आपत्ति में यह हक़ीक़त ध्यान में नहीं रखी गई कि यहाँ एक आदमी का सवाल नहीं बल्कि कलाकार का सवाल है। कलाकार महज़ एक आदमी नहीं होता। कलाकार तो सीधे तौर पर ज़िंदगी का माध्यम है। वह एक प्रयोगशाला है जहाँ ज़िंदगी तजुर्बे करती है।
राँबो के अनुसार हमें यह नहीं कहना चाहिए कि मैं सोचता हूँ, बल्कि मुझे सोचा जाता है। इसलिए कलाकार की रचनाओं को एक आदमी की राय से नहीं समझा जा सकता। यह और बात है कि झूठे कलाकारों से भी हमें समय-समय पर वास्ता पड़ता है। मगर इस तरह तो झूठे पैग़ंबरों की भी दुनिया में कमी नहीं। बिहार के क़श्क़ चीपल ग़ज़नग़ साहब भी तो सीधे अल्लाह मियां से ख़िताब लेकर नाज़िल हुए थे। मगर उन्हें किसी ने कलीम-उल्लाह नहीं समझा।
इन स्पष्टीकरणों के बाद बेहतर होगा कि मैं आधुनिक कवियों के दो-चार ऐसे बयानों का जायज़ा लूँ जो देखने में बड़े ख़तरनाक मालूम होते हैं। बोदेलेयर ने कहा है कि किसी को इल्ज़ाम देना, किसी का विरोध करना, बल्कि इंसाफ़ की मांग करना भी बद-मज़ाक़ी (भद्दापन) है। ज़ाहिर में तो इसका मतलब यह मालूम होता है कि कलाकार को इंसाफ़ और आज़ादी की लड़ाई से वास्ता नहीं रखना चाहिए। मगर यह बयान ऑस्कर वाइल्ड का नहीं बोदेलेयर का है। बोदेलेयर के सामने एक निहायत ही ज़बरदस्त मसला था। हक़ीक़त का जो विचार अब तक प्रचलित था वह काम नहीं दे रहा था। अब कलाकार के लिए ज़रूरी था कि हक़ीक़त को नए सिरे से समझे। हक़ीक़त का विचार निश्चित न हो सका है तो इंसाफ़ का मतलब भी अस्पष्ट हो जाता है। इस सूरत में किस क़िस्म के इंसाफ़ की मांग की जाए? दरअस्ल इस क़िस्म के संदेहवाद से इंसाफ़ की लड़ाई में कोई कमी नहीं आती। क्योंकि इससे इंसाफ़ का मसला सुलझता है। अगर इस क़िस्म के शक को रूस, अमेरिका और इंग्लैंड के सत्ताधारी अपने दिल में कभी-कभी जगह दे दिया करते तो यू.एन.ओ. (UNO) कफ़न सीने वालों की सभा बन कर न रह जाती।
इसी तरह जब रां बो नैतिकता को दिमाग़ की कमज़ोरी बताता है तो इसका मतलब सिर्फ़ यह होता है कि जो लोग हालात का लिहाज़ किए बिना प्रचलित नैतिक क़ानून को बिना किसी सवाल के मान लेते हैं, वे सोचने की ताक़त नहीं रखते। ख़ुद रां बो में भी नए नैतिक मूल्य देने की ताक़त थी या नहीं, इसका हाल उसका कलाम पढ़कर ही मालूम हो सकता है। अब आंद्रे ज़ीद का एक बदनाम जुमला लीजिए... नेक जज़्बातों से सिर्फ़ बुरा साहित्य पैदा हो सकता है। इस बयान से यह नतीजा निकालना ग़लत है कि ज़ीद फ़नकार को नेकी से बिल्कुल बेपरवाह हो जाने का मशवरा दे रहे हैं, बल्कि उनका कहना यह है कि समाज का अंदरूनी संतुलन बिगड़ चुका हो, मगर अच्छे और बुरे का विचार वही चला आ रहा हो जो मुकम्मल तालमेल और संतुलन के वक़्त था, तो ऐसा विचार फ़नकार को सही रचना में मदद नहीं दे सकता। क्योंकि उसका काम नई हक़ीक़तों की खोज भी है। बिल्कुल इन्हीं मायनों में बोदेलेयर ने शैतान को निर्वासितों की लाठी और आविष्कारकों का चराग़ कहा है। अगर आपको नए नैतिक पैमाने ढूँढने हैं तो प्रचलित पैमानों को ज्यों का त्यों क़ुबूल नहीं कर सकते। इसके लिए तो कभी-कभी अच्छे को बुरा और बुरे को अच्छा समझकर तजुर्बा करना पड़ेगा कि हक़ीक़त क्या है।
इसलिए ये फ़नकार हर क़िस्म के प्रचलित विचारों से अपने फ़न को आज़ाद रखने पर अड़े रहे हैं। बल्कि ज़ीद ने तो इस मामले में बड़ी सख़्ती से काम लिया है। उन्होंने कहा है कि अगर आप किसी जमात में शामिल होंगे तो जमात आपको क़ैद कर लेगी। असल फ्रांसीसी जुमले का अनुवाद उर्दू में नहीं हो सकता। वर्ना इसका तो एक अर्थ यह भी होता है कि अगर आप कोई फ़ैसला करेंगे तो उस फ़ैसले के क़ैदी होकर रह जाएँगे। यानी ज़ीद चाहते हैं कि आप अपने तजुर्बों से कभी संतुष्ट न हों, बल्कि जो बात तय कर लें उसे फिर शक की ख़ुर्दबीन से देखें। इसी तरह रूहानी सफ़र में वे पहले से तय की हुई मंज़िल के क़ायल नहीं हैं। उनका ख़याल है कि अक्सर रचनात्मक विचार यूँ ही खेल ही खेल में पैदा होते हैं।
आजकल फ्रांस में एक आंदोलन चला है ज़िम्मेदार साहित्य का। इसके बारे में ज़ीद ने कहा था कि आज तो आप साहित्य को ज़िम्मेदार बना रहे हैं, कल कहेंगे कि ख़याल को भी ज़िम्मेदार होना चाहिए यानी अगर तयशुदा तरीक़ों के अलावा किसी और तरह सोचने की पाबंदी हो गई तो रचनात्मक विचारों का बीज ही मारा जाएगा। ज़ीद के नज़दीक जिन विचारों से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचा है, वे आमतौर पर रूहानी या ज़हनी खेल से पैदा हुए हैं। 'फ़न बराए फ़न' (कला के लिए कला) के नज़रिए को भी आप इसी क़िस्म का खेल समझिए। जो लोग किसी न किसी शक्ल में कला की श्रेष्ठता के क़ायल थे, उनकी बुनियादी ख़्वाहिश ज़िंदगी से किनाराकशी नहीं थी। जिस तरह दुनिया की शुरुआत से लेकर आज तक फ़नकार नए विचारों, कल्पनाओं और एहसासों को रचने का खेल खेलते चले आए हैं, वही खेल ये लोग भी खेल रहे थे। फ़र्क़ यह है कि उनके खेल के नियम ज़रा अलग थे। यह खेल यूँ खेला जाता था कि पहले तो सृष्टि को टुकड़े-टुकड़े कर दो और फिर एक नई सृष्टि बनाओ जो पहले से ज़्यादा हसीन, तालमेल वाली, संतुलित और सार्थक हो। इस खेल में ये लोग हारे हों या जीते हों, बहरहाल उन्होंने खेला ज़रूर...
मुमकिन है 'फ़न बराए फ़न' का नज़रिया बड़ा घातक हो। मगर मैंने तो अपनी सी लीप-पोत कर ही दी। बहरहाल आप मेरी बात पर न जाइए। जिन लोगों को इस नज़रिए से जुड़ा समझा जाता है, उनकी रचनाएँ देखिए। आधुनिक परंपरा ने जो कुछ सोचा, समझा और महसूस किया है, उस पर जो कुछ बीती है, उसकी नाकामियाँ और कामयाबियाँ, ग़रज़ हर चीज़ का निचोड़ रां बो की नज़्म 'दोज़ख़ में एक मौसम' में आ गया है जो 1873 ई. में लिखी गई थी। यह नज़्म आपको बताएगी कि अगर सौंदर्य-पूजा के बारे में किसी को ख़ुशफ़हमियाँ थीं तो वे कितनी जल्दी दूर हो गईं और हर फ़नकार को अपनी-अपनी जगह पर पता चल गया कि सौंदर्य के विचार की बुनियाद कुछ ग़ैर-सौंदर्यपरक और सर्वव्यापी मूल्यों और नैतिक पैमानों पर न हो तो सौंदर्य का अहसास अपने आप में एक मुसीबत बन जाता है। रां बो की नज़्म यूँ शुरू होती है,
अगर मुझे ठीक याद है तो एक ज़माने में मेरी ज़िंदगी एक दावत थी, जहाँ हर दिल का कँवल खिल जाता था, जहाँ हर तरह की शराब का दौर चलता था।
एक शाम मैंने हुस्न को अपने घुटनों पर बिठा लिया... और मुझे उसका मज़ा कड़वा लगा... और मैंने उसे गालियाँ दीं।
दरअसल सारी बात इन तीन छोटे-छोटे जुमलों में आ गई है। नैतिकता और मज़हब या एक संतुलित और सर्वव्यापी जीवन-व्यवस्था की इजाज़त से निकाह पढ़वाए बिना हुस्न को घुटनों पर बिठाने का यही अंजाम होता है। ख़ैर, आप रां बो की ज़बानी ही सुनिए कि आगे क्या गुज़री,
मैंने क़ानून के ख़िलाफ़ हथियार उठा लिए।
मैं भाग खड़ा हुआ। ऐ जादूगरनियो, ऐ ग़रीबी, ऐ नफ़रत, मैंने अपना ख़ज़ाना तुम्हारे सुपुर्द कर दिया!
आख़िर यह हाल हुआ कि हर तरह की इंसानी उम्मीद मेरी रूह से ग़ायब हो गई। हर ख़ुशी का गला घोंटने के लिए मैं बहरा बनकर वहशी दरिंदे की तरह उस पर झपट पड़ा।
मैंने जल्लादों को बुलाया ताकि दम तोड़ते हुए उनकी बंदूकों के कुंदे दाँतों से चबा सकूँ। मैंने महामारियों को पुकारा कि रेत से, ख़ून से मेरा गला घोंट दें। मैंने मुसीबत को अपना माबूद बना लिया। मैं कीचड़ में लोटा। मैंने जुर्म की हवा से अपने आप को सुखाया और मैंने दीवानगी से दिल्लगी की।
और बहार का मौसम मेरे लिए सुध-बुध खोए हुए पागलों का सा भयानक क़हक़हा लेकर आया।
यह हालत सिर्फ़ रां बो ही की नहीं हुई बल्कि इस परंपरा के और शायरों को भी, दूसरे विचारों से किनाराकशी करके सिर्फ़ सौंदर्य-पूजा करने की कोशिश में इसी क़िस्म के तजुर्बों से दो-चार होना पड़ा। अब उनके सामने दो रास्ते थे। या तो अपना ख़ज़ाना जादूगरनियों को, ग़रीबी को, नफ़रत को सुपुर्द करके आराम से बैठ जाएँ कि जो गुज़रती है गुज़रा करे। या फिर अपनी ज़िंदगी को नई नैतिक बुनियादों पर फिर से तामीर करें। ताकि सौंदर्य-पूजा से ऐसे भयानक नतीजे पैदा न हों। इन शायरों ने दोनों बातें कीं। कभी तो हिम्मत हार के बैठ गए, कभी हिम्मत करके उठ खड़े हुए। उनकी बेदिली के नमूने तो मैं पेश कर ही चुका हूँ और न भी करता तो औरों ने उन्हें बदनाम करने में क्या कसर छोड़ी है। मैं तो सिर्फ़ यह दिखाऊँगा कि इन लोगों में निर्माण की इच्छा कितनी तीव्र थी।
रां बो ने उपरोक्त नज़्म में वर्लेन से अपने बारे में ये अल्फ़ाज़ कहलवाए हैं, जब वह मुझे बेदिल सा मालूम होता तो मैं उसके हर अजीबोग़रीब और पेचीदा काम को ध्यान से देखती। चाहे वह काम अच्छा हो या बुरा। मुझे यक़ीन था कि मैं उसकी दुनिया में कभी हार नहीं पा सकती। रातों को मैं उसके सोते हुए प्यारे जिस्म के बराबर लेटी घंटों जागती रही हूँ और यह मालूम करने की कोशिश करती रही हूँ कि आख़िर वह हक़ीक़त से इतना क्यों बचना चाहता है। ऐसी ख़्वाहिश तो आज तक किसी आदमी के दिल में भी न पैदा हुई होगी। उसकी तरफ़ से तो मुझे कोई डर नहीं था, मगर मुझे महसूस होता था कि वह समाज के लिए एक ज़बरदस्त ख़तरा बन सकता है... शायद वह ज़िंदगी को बदलने के छिपे हुए रहस्यों से वाक़िफ़ है? फिर मैं ख़ुद ही जवाब देती कि नहीं, वह तो सिर्फ़ उन रहस्यों की तलाश में है।
यह वाक्य, 'ज़िंदगी का बदलना' इस लायक़ है कि इसे सारे आधुनिक साहित्य का शीर्षक समझा जाए। वह हक़ीक़त जिससे रां बो या दूसरे शायर बचने की कोशिश कर रहे हैं, वह सिर्फ़ हक़ीक़त का प्रचलित विचार है, जिसमें नैतिकता से लेकर राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था तक सब चीज़ें आ जाती हैं। ये लोग मौजूदा हक़ीक़त से मुक्त होने की कोशिश कर रहे हैं ताकि एक नई हक़ीक़त की रचना कर सकें। और तो और ख़ुद ज़ीद के यहाँ, जिनके ख़िलाफ़ आजकल यह बात बहुत ज़ोरों से कही जा रही है कि उन्हें निजी संतुष्टि के अलावा किसी चीज़ से कोई मतलब नहीं, यह ख़याल बार-बार मिलता है कि इंसान प्रकृति के मुक़ाबले पर डट जाए, उसे क़ाबू में लाने की कोशिश करे और इस तरह अपनी ज़िंदगी बदले। उन्हें प्रोमीथियस की दास्तान बहुत प्रिय है। क्योंकि उसने इंसान के फ़ायदे के लिए आसमान से आग चुराई थी, जिससे ज़िंदगी का नक़्शा बहुत कुछ बदला।
रां बो को तो तमाम प्राकृतिक और अलौकिक रहस्यों को मालूम करने की ऐसी लगन थी कि दिल में हर वक़्त आग भड़कती रहती थी। उसने अपने दो ख़तों में एक बाक़ायदा नज़रिया पेश किया है कि शायर को रहस्यदर्शी (आरिफ़) भी होना चाहिए। उसमें यह योग्यता हो कि वह हर चीज़ की तह तक देख सके और भविष्य का नज़ारा भी कर सके। इस रहस्यदर्शी का एक ख़ास फ़र्ज़ यह है कि अपने अंदर जो बुद्धि से परे ताक़तें मौजूद हैं, उनकी मदद से बाहरी हक़ीक़त का नक़ाब फाड़ दे और इस पर्दे के पीछे जो शाश्वत प्रकाश (अज़ली नूर) है, वहाँ तक पहुँच जाए। उसकी राय में सबसे पहला रहस्यदर्शी बोदेलेयर था। रां बो कहता है कि आइंदा से शायरी कर्म के साथ-साथ नहीं चलेगी, बल्कि आगे रहेगी। आगे रहने का मतलब यह नहीं कि शायर कर्म से मुक्त होकर पूर्ण विचार (फ़िक्र-ए-मुतलक़) में डूब जाएगा। रां बो शायर को आसमान से आग चुराने वाला बताता है। यानी शायर जिन हक़ीक़तों को बेनक़ाब करेगा, वे सिर्फ़ सौंदर्यपरक संतुष्टि के काम नहीं आएँगी बल्कि उनसे इंसान की ज़िंदगी बदलेगी और बेहतर शक्ल अख़्तियार करेगी।
ज़िंदगी को नए सिरे से रचने का ख़याल सिर्फ़ ख़्वाहिश तक सीमित नहीं रहा। इन लोगों ने अपनी सी कोशिश ज़रूर की, चाहे वे कामयाब हुए हों या नाकामयाब, या यह कोशिश सिरे से निरर्थक ही क्यों न हो। इस वक़्त ज़िक्र सिर्फ़ कोशिश का है। कोशिश की प्रकृति का नहीं। रां बो कहता है, मैंने नए फूल, नए सितारे, नए जिस्म, नई ज़बानें ईजाद करने की कोशिश की है। मुझे ऐसा महसूस हुआ है जैसे मुझमें अलौकिक ताक़तें आ गई हों। अपोलीनेयर की एक नज़्म का अंश देखिए, हम आपको निहायत अजीब और विशाल ज़मीनें देना चाहते हैं जहाँ जो भी चाहे उसे फूलों से लदे हुए रहस्य हासिल हो सकते हैं। वहाँ तरह-तरह की नई आग है। जिसके रंग आज तक किसी ने देखे भी न होंगे। हज़ारों नई-नई शक्लें हैं जिन तक वहम-ओ-गुमान का भी गुज़र नहीं हुआ। हमें इन सबको हक़ीक़त बख़्शनी है। इसी ख़्वाहिश का इज़हार सां पोल रो ने यूँ किया है, जो दुनिया अभी तक अज्ञात है हमें वहाँ जाकर इंसानों की नई बस्तियाँ बसानी हैं।
जैसा इन अंशों से भी ज़ाहिर होता है, नई कला वर्तमान-पूजक या जड़ता-पूजक नहीं है। इसकी आँखें बराबर भविष्य की तरफ़ लगी हुई हैं। इन फ़नकारों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि शायर को अपने अंदर दूरदर्शिता की सलाहियत पैदा करनी चाहिए। बल्कि कुछ ने तो यह राय दी है कि फ़नकार को चाहिए कि अतीत की यादों को ज़ेहन से बिल्कुल निकाल दे ताकि भविष्य का नज़ारा सीधे तौर पर कर सके। चुनाँचे इस सिलसिले में एक नई और ज़ाहिर तौर पर निरर्थक सी शब्दावली वजूद में आई है: भविष्य की याद। अब दो-चार नमूने इन फ़नकारों की भविष्य-परस्ती के देखिए।
सां पोल रो ने कहा है, कला सिर्फ़ यह नहीं है कि मौजूदा लम्हे को देखा और महसूस किया जाए, बल्कि कला का ख़ास काम यह है कि वर्तमान समय की हदों के पार जा के उन ख़यालात को पहले से देखा और महसूस किया जाए जिन पर अभी तक अमल नहीं हुआ। शार्ल क्रो की ख़्वाहिश है कि अपना तो बस एक रास्ता हो, एक माबूद (पूज्य) हो... भविष्य! अपोलीनेयर की राय में, नई रूह का तक़ाज़ा है कि हम पैग़ंबराना फ़र्ज़ अख़्तियार करें। दरअसल अपोलीनेयर का नज़रिया इन सब शायरों से ज़्यादा उम्मीद-परस्ताना रहा है और उन्होंने भविष्य के बारे में बड़ी-बड़ी उम्मीदों का इज़हार किया है... और ठेठ लड़ाई के ज़माने में। एक अंश उनकी नज़्म का भी मुलाहज़ा फ़रमा लीजिए,
चेतना की गहराइयो! कल तुम्हें खंगाला जाएगा और कौन जाने इस पाताल (तहत-उस-सरा) में से कैसी-कैसी जानदार हस्तियाँ, बल्कि पूरी-पूरी कायनातें निकलेंगी... इंसान को पता चलेगा कि मैं दरअसल बहुत ज़्यादा पाक, ताक़तवर और अक्लमंद हूँ।
यह तो यह, ख़ुद रां बो जो ख़ुशी को लानत कहता है, क्योंकि ख़ुशी हमें रूहानी जद्दोजहद और हक़ीक़त की तलाश से ग़ाफ़िल करती है, जो अपनी ज़ेहनी ज़िंदगी को दोज़ख़ से ताबीर करता है, उस ज़माने के इंतज़ार में है जब ज़िंदगी नई शक्ल में ज़ाहिर होगी। वह दिन कब आएगा जब हम साहिलों और पहाड़ों के उस पार ज़ालिमों और राक्षसों के पतन, अंधविश्वास के ख़ात्मे, नई जद्दोजहद और नई अक़्ल-ओ-दानिश की पैदाइश का इस्तक़बाल करने जाएँगे और ज़मीन पर मसीहा के प्रकट होने के वक़्त अपना श्रद्धा-सुमन (हदिय-ए-अक़ीदत) लेकर सबसे पहले पहुँचेंगे? उसे इंतज़ार ही नहीं बल्कि यक़ीन है कि दोज़ख़ की रात ख़त्म हो जाएगी और सुबह के वक़्त हम कठोर सब्र की ताक़त से लैस अज़ीम-उश-शान शहरों में दाख़िल होंगे।
ज़िंदगी को बदलने की ख़्वाहिश के साथ-साथ सबसे अहम मसला यह पैदा होता है कि ज़िंदगी को बदलने का ज़रिया क्या हो। उन्नीसवीं सदी में मज़हब के ज़रिए ज़िंदगी को बदलने का ख़याल आम तौर से हास्यास्पद समझा जाता था। अलबत्ता साइंस से यह उम्मीद ज़रूर थी। फ़नकार ने इस माहौल में अपने आप से यह सवाल पूछा है कि अगर इंसान को बाहरी माहौल पर पूरा अधिकार हासिल हो जाए, हर चीज़ का इल्म नसीब हो जाए और हर मुमकिन हुनर मिल जाए तो क्या ज़िंदगी बदल जाएगी? चुनाँचे रां बो ने मान लिया है कि ये सब चीज़ें मेरे क़ब्ज़े में आ गईं, मैं हर क़िस्म के रहस्यों को बेनक़ाब करना जानता हूँ, वे मज़हबी रहस्य हों या प्राकृतिक मौत, पैदाइश, भविष्य, अतीत, ब्रह्मांड की व्यवस्था, शून्यता (अदम) में नए से नए भ्रम पैदा करने में उस्ताद हूँ... मुझमें सब हुनर हैं... आपको हब्शियों के गाने चाहिए या हूरों का नाच? क्या आप चाहते हैं कि मैं ग़ायब हो जाऊँ, ग़ोता मारूँ और अँगूठी निकाल लाऊँ? बोलिए आप क्या चाहते हैं? मैं सोना बनाऊँगा, बड़ी-बड़ी अक्सीर दवाएँ बनाऊँगा।
अव्वल तो यह जो आदमी बोल रहा है वह दोज़ख़ में है और इस इल्म-ओ-हुनर के बावजूद उसे छुटकारा नहीं मिलता, फिर आपने देखा रां बो ने इल्म-ओ-हुनर के कारनामों को बाज़ीगरी बना के दिखा दिया है। चूँकि इल्म-ओ-फ़न से ज़िंदगी बदल नहीं सकी इसलिए इनकी अहमियत उसकी नज़रों में इससे ज़्यादा नहीं। अपनी नज़्म के आख़िरी हिस्से में रां बो इस नतीजे पर पहुँचता है, मैं समझता था कि मुझे अलौकिक ताक़तें हासिल हो गई हैं। ख़ैर, अब मुझे चाहिए कि अपनी कल्पना (तख़य्युल) और अपनी यादों को दफ़्न कर दूँ। अब उसे यह भी पता चल गया है कि इल्म-ओ-हुनर मेरे काम क्यों नहीं आया। मैं नैतिकता से बिल्कुल दूर हो गया था। मैं अपने आप को फ़रिश्ता या अक्लमंद समझता था। मगर मैं तो फिर ज़मीन पर वापस आ गया हूँ।
फ़रिश्ते का मतलब है मुकम्मल इंसान। जो आदमी अपने आप को मुकम्मल समझता हो वह अपनी ज़िंदगी को बदल नहीं सकता, इसी तरह सिर्फ़ समझदारी से भी वह उसूल हाथ नहीं आ सकता जो ज़िंदगी को एक व्यवस्थित और संतुलित रूप दे दे। सिर्फ़ इल्म (ज्ञान) से सहज प्रवृत्तियों की व्यवस्था और संगठन मुमकिन नहीं, बल्कि इल्म में सहज प्रवृत्तियों का साधन बनने की ज़बरदस्त सलाहियत (क्षमता) है और सहज प्रवृत्तियों के आज़ाद हो जाने को ही राँबो (Rimbaud) दोज़ख़ (नरक) समझता है। इसलिए इल्म और फ़न (कला) के भरोसे पर मुक्ति, या ज़िंदगी को बदलने की कोई सूरत नज़र नहीं आती।
चूँकि फ़नकार इन दोनों चीज़ों से निराश हो चुका है, मगर साथ ही ज़िंदगी को बदलने की ख़्वाहिश अब भी बाक़ी है। इसलिए उसका सबसे अहम फ़र्ज़ यह हो जाता है कि ज़िंदगी को बदलने का नुस्ख़ा हर जगह ढूँढे। अगर अक़्ल के ज़रिए मुमकिन न हो तो अक़्ल से परे ताक़तों के ज़रिए। इसलिए इस अंधी तलाश का जज़्बा सारी जदीद (आधुनिक) परंपरा पर हावी है। इस तलाश का रूपक सफ़र है। यूँ तो शातोब्रियाँ और बायरन जैसे रूमानी शायर भी सफ़र के बड़े शौक़ीन थे। मगर उनका सफ़र ग़म भुलाने या नए एहसासात का लुत्फ़ उठाने के लिए था, हक़ीक़त की तलाश के लिए नहीं। इस नए सफ़र की शर्तें सबसे पहले बोदेलेयर ने गिनाईं। बोदेलेयर के मुसाफ़िर को एक अनहोनी लगन खाए जाती है, वह यह भी नहीं जानता कि कहाँ जा रहा हूँ और क्यों जा रहा हूँ, मगर बराबर चलता रहता है। इस सफ़र की एक ख़ासियत यह है कि इसमें न बादबान (पाल) की ज़रूरत पड़ती है और न भाप की। बस शर्त यह है कि आदमी वह चीज़ ढूँढ कर लाए जो नई हो और जिसे कोई न जानता हो। जैसे-जैसे यह जदीद परंपरा आगे बढ़ती है, जिस्मानी ठहराव का तत्व भी बढ़ता जाता है।
आंद्रे सालमों ने कहा है, मैं ऐसे स्टेशन के ख़्वाब देखता हूँ, जहाँ से गाड़ियाँ ही न चलती हों... ठहराव भी बड़ा अच्छा सफ़र है। बस सब्र करके अपने सामान पर बैठ जाना चाहिए। इन शेरों से यह नतीजा भी निकाला जा सकता है कि शायर मुकम्मल जड़ता की सलाह दे रहा है। मगर यह व्याख्या ग़लत है। शायर अनजान नई हक़ीक़त की तलाश को जिस्मानी हरकत से आज़ाद करना चाहता है। पॉल क्लोदेल के अनुसार, सवाल चलने का नहीं है बल्कि पाने का है। जिस तरह नया सफ़र हरकत से आज़ाद है, उसी तरह नतीजों की प्रकृति भी ध्यान में नहीं रखी जाती। यह तो ठीक है कि असल मक़सद ज़िंदगी को बदलना है, मगर जब नुस्ख़े का पता ही नहीं तो जुनूनी खोजी के लिए यही रह जाता है कि जो चीज़ भी हाथ आए उसे आज़माए। यह तलाश फ़नकार की जान को इस तरह लगी है कि उसे किसी चीज़ का डर ही नहीं। बोदेलेयर ने इस तलाश की प्रकृति दो लाइनों में बयान कर दी है, गुफ़ा की गहराई में कूद पड़ो, चाहे वहाँ जन्नत हो या जहन्नुम... अनजान हक़ीक़त की गहराइयों में ताकि कोई नई चीज़ हाथ आ सके।
और यह गुफ़ा कौन सी है? ख़ुद फ़नकार की हस्ती। इस चीज़ को आत्ममुग्धता और अहंकार कहकर बदनाम किया जाता है। मगर इन लोगों को अपने अंदर गोता लगाने की ज़रूरत इस वजह से पेश आई कि ये लोग अपने निजी तजुर्बों के ज़रिए देख चुके थे कि बाहरी ज़िंदगी की व्यवस्था से रूहानी बेचैनी, असंतुलन और पीड़ा ख़त्म नहीं होती, बल्कि शायद निराशा कुछ और गहरी हो जाती है। इसलिए अपने अंदर डूबकर ये लोग तजुर्बा करना चाहते थे कि आख़िर हमारी भीतरी ज़िंदगी में अव्यवस्था की वजह क्या है। इसकी व्यवस्था हो सकती है या नहीं। अगर हो सकती है तो किस उसूल के तहत। इस क़दम का मतलब यह नहीं था कि बाहरी दुनिया से तो लुत्फ़ ले चुके, अब ज़रा अपनी हस्ती से दिल बहलाएँ, बल्कि इन लोगों का मक़सद अपनी अंदरूनी ज़िंदगी का तटस्थ अध्ययन (objective study) करना था।
लाफ़ोर्ग ने सफ़र के मायने अपने अंदर उतर जाना बताए हैं और सां-पोल रू ने इस तरह चलना कि आँखें अंदर की तरफ़ लगी हों। इन वाक्यों से यह शक ज़रूर होता है कि ये लोग सिर्फ़ पलायन या सुख भोगने के ख़्वाहिशमंद हैं। मगर असल में नए फ़नकार को तलाश इस बात की है कि मेरी भीतरी ज़िंदगी असल में चीज़ क्या है। बाइबल की मशहूर कहानी है कि एक आदमी का बेटा घर से भाग खड़ा हुआ था और बड़ी मुसीबतें उठाने के बाद वापस आया था। ज़ीद (Gide) ने इसे नए मायने पहनाए हैं। बेटा घर लौटकर आता है तो माँ पूछती है कि तुम घर से क्यों चल दिए थे। बेटा जवाब देता है कि मैं ढूँढ यह रहा था कि आख़िर मैं हूँ कौन... ज़ीद के नज़दीक यह खोज-बीन महज़ फ़नकारों का चोंचला नहीं है, बल्कि अच्छे हुक्मरानों के लिए भी ज़रूरी है।
ज़ीद के नॉवेल 'तेज़े' (Thésée) में बूढ़ा बाप हीरो को नसीहत करता है कि सबसे पहले तुम यह मालूम करो कि तुम कौन हो। इसके बाद अपने पूर्वजों की परंपरा से वाक़फ़ियत पैदा करो। किसी और जगह ज़ीद ने इस खोज का तरीक़ा भी बता दिया है, दुख सहते हुए अपने आप को इस तरह देखना जैसे दुख सहने वाला कोई और हो। बोदेलेयर ने तो ख़ैर ख़ुदा से दुआ माँगी ही है कि मुझे घिन न आए। राँबो ने भी अपने ज्ञानी और शायर की ख़ासियतें यूँ बयान की हैं, वह अपनी रूह को ढूँढता है। उसका मुआयना करता है, उसे तरह-तरह से आज़माता है, उसे समझाता है।
जिस चीज़ को इन लोगों की पतनशीलता, विलासिता या बदकिरदारी कहा जाता है, उसे इन्हीं व्याख्याओं को ध्यान में रखकर समझने की कोशिश करनी चाहिए। अमल में तो ख़ैर नहीं, मगर ख़याल की हद तक यह दुरुस्त है कि नए तजुर्बों की धुन में ये लोग नैतिकता, अक़्ल और इंसानियत, सब की हदों से गुज़र गए। एक छोटी सी मिसाल यह है कि एक दिन बैठे-बैठे राँबो ने वेर्लेन (Verlaine) से कहा कि हाथ फैलाओ और एक नया तजुर्बा हासिल करो। वेर्लेन ने हाथ फैलाया तो राँबो ने चाकू मार दिया। मगर यहाँ मज़े का सवाल पैदा नहीं होता। ये लोग अपनी हस्ती के हर पहलू से सीधे वाक़फ़ियत हासिल करना चाहते थे। चाहे वह पहलू बुरा हो, या अक़्ल के ख़िलाफ़ हो, या ग़ैर-इंसानी हो। उनका इकलौता मक़सद इंसान के मुताल्लिक़ (बारे में) सच्चा इल्म हासिल करना और इंसान की गहराई तक पहुँचना था। ये लोग अपने ऊपर तजुर्बे करते थे। इनकी बाज़ (कुछ) बातों में हमें कामुकता नज़र आती है। मगर इनकी कामुकता, अय्याशी और तमाशबीनी से कोसों दूर है। अपनी कामुकता का मुताला (अध्ययन) भी ये लोग संन्यासियों जैसी सख़्ती के साथ करते थे।
ज़ीद के 'तेज़े' ने बीसियों औरतों से दिल लगाया, मगर दिल अटकाया कहीं नहीं। अपनी इस कमज़ोरी को क़बूल करते हुए वह कहता है कि मुझे इससे यह फ़ायदा ज़रूर हुआ कि अपने आप को जानने में बड़ी मदद मिली। बोदेलेयर ने कहा कि मैं उन चीज़ों की तलाश में हूँ जो ख़ाली हैं, काली हैं और नंगी हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि आइंदा से बदकारी के अलावा उसका कोई और काम ही नहीं होगा। जिन ज़मीनों को इंसानी तजुर्बों की हदों से बाहर समझकर और शून्यता या ख़ालीपन कहकर यूँ ही छोड़ दिया गया है, बोदेलेयर वहाँ की भी सैर करने पर अड़ा हुआ है। जिन चीज़ों को प्रचलित नैतिकता ने वर्जित क़रार दे दिया है, वह उन्हें भी आज़माना चाहता है कि उनकी हक़ीक़त क्या है और इंसानी ज़िंदगी से उनका क्या ताल्लुक़ है।
नंगेपन से मुराद यह है कि वह हर क़िस्म के ज़हनी पर्दों को चीर कर हक़ीक़त को असली शक्ल में देखना चाहता है, यहाँ तक कि ख़ौफ़नाक प्रवृत्तियों को भी। इसी तक़ाज़े के तहत इन लोगों से कुछ भयानक हरकतें हुई हैं... अमल में बहुत कम, ख़याल में बहुत ज़्यादा, बल्कि एक हद तक ये लोग अपनी खोज के लिए ख़याली बदअमली (बुरे कर्मों) को ज़रूरी समझते हैं। चुनाँचे राँबो ने अपने आरिफ़ (द्रष्टा) के बारे में कहा है, मगर सवाल अपनी रूह को बेइंतिहा ख़ौफ़नाक बनाने का है। वह बहुत बड़ा मुजरिम, बहुत ही धिक्कारा और कोसा हुआ बन जाता है और साथ ही सबसे बड़ा आरिफ़ भी... क्योंकि उसे वह चीज़ मिल जाती है जिससे कोई वाक़िफ़ ही नहीं है।
अपने आप को जानने की कोशिश में फ़नकार को बड़े-बड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं। वह हर क़िस्म की शख़्सियत और किरदार अपना कर देखता है, ज़िंदगी की हर शक्ल को आज़माता है, हक़ीक़त को हर रूप और हर आकार में तलाश करता है। यह कोशिश हास्यास्पद तो ज़रूर है और फ़नकार को ख़ुद इसका एतराफ़ (स्वीकार) है, मगर जिस समाज में मरकज़ियत (केंद्रीयता) न रही हो, वहाँ यह कोशिश लाज़िमी बन जाती है ताकि मरकज़ (केंद्र) को फिर से ढूँढा जा सके या नया मरकज़ ईजाद किया जा सके। हमारे ज़माने में राजनेता तो अलग रहे, बड़े-बड़े फ़लसफ़ी (दार्शनिक) इस रियाज़त से थक कर किसी न किसी नज़रिए के साए में जा बैठे हैं। मगर एक फ़नकार है जिसने हार नहीं मानी। ख़ुदा नहीं मिलता तो न सही, मगर फ़नकार ने बोलने वाले बछड़ों को हर शक्ल में पहचान लिया है।
ख़ैर, अब आप राँबो की ज़बान से सुनिए कि हक़ीक़त की तलाश के सिलसिले में फ़नकार ने कैसे-कैसे तजरबे किए हैं, मगर थकने में नहीं आया। आओ भेस बदलें... नट, फ़क़ीर, फ़नकार, डाकू, पादरी। मुझ में सब हुनर हैं... आओ जितनी भी शक्लें ज़ेहन में आएँ, बना के देखें। अब मैं अपने आप को किसके हाथ बेचूँ? किस जानवर को पूजूँ? किस पवित्र बुत पर हमला करूँ? कौन से दिल तोड़ूँ? कौन सा झूठ अपनाऊँ...? किसके ख़ून में चलूँ?
फ़नकार इतनी दौड़-धूप करता है, मगर अपनी मेहनत का फल खाने की उसे जल्दी नहीं है। अगर उसकी मेहनत ज़ाया गई है तो जाए, मगर अपनी नाकामी पर पर्दा डालना उसे गवारा नहीं। राँबो तरह-तरह से ज़िंदगी को बदलने की कोशिश करता है मगर हर बार उसे पता चलता है कि यह तो वही ज़िंदगी है और असली ज़िंदगी ग़ायब है। चुनाँचे फ़नकार अपनी नाकामी और महरूमी का एतराफ़ (स्वीकार) बेखटके कर लेता है। बल्कि उसे यह महसूस हो जाता है कि इस नाकामी का कारण भी ख़ुद मेरे अंदर मौजूद है। चुनाँचे लोत्रियामों ने कहा है, वह तूफ़ान की तरह आज़ाद था, लेकिन आख़िर एक दिन अपनी ख़ौफ़नाक इच्छाशक्ति के बेक़ाबू साहिलों पर फँस कर रह गया।
इन लोगों को अपनी सरशारी (मस्ती) के बावजूद इल्म है कि हम ज़िंदगी को जिस पैमाने पर बदलने की कोशिश कर रहे हैं, वह दरअसल इंसान से मुमकिन ही नहीं। बहरहाल अपनी सी कोशिश हम भी कर रहे हैं। राँबो ने साफ़ लफ़्ज़ों में कह दिया है कि रूहानी कशमकश भी उतनी ही ख़ौफ़नाक होती है जितनी इंसानों की जंग, मगर इंसाफ़ का जलवा सिर्फ़ ख़ुदा ही को हासिल हो सकता है। सिर्फ़ पराभौतिक (मेटाफ़िज़िकल) मामलों ही में नहीं, मामूली इंसानी मामलों में भी इनकी ख़ुद-आगाही (आत्म-जागरूकता) हद से बढ़ी हुई है। इन लोगों पर आप कोई ऐसा एतराज़ नहीं कर सकते जो उन्होंने ख़ुद अपने ऊपर न किया हो। इन लोगों ने यहाँ तक तस्लीम किया है कि हमारी जद्दोजहद का मक़सद कितना ही बुलंद क्यों न सही, हमारी जो गत बन गई है वह इस अमल का लाज़िमी हिस्सा सही, मौजूदा समाज कितना ही बुरा सही, मगर मौजूदा हालत में समाज के लिए हमें क़ुबूल करना दुश्वार है।
राँबो ने वर्लेन से अपने बारे में कहलवाया है, वह कुछ नहीं जानता, और काम वह कभी कर के नहीं देगा। वह तो इस तरह ज़िंदगी बसर करना चाहता है जैसे कोई सोते में चल रहा हो। क्या सिर्फ़ अपनी नेक-मिज़ाजी और रहमदिली के बल पर उसे हक़ीक़ी दुनिया में रहने का हक़ हो सकता है? ग़ालिबन इन फ़नकारों में ख़ुद-आगाही (आत्म-जागरूकता) के लिए एक अलग हिस (संवेदना) मौजूद है। ये लोग चाहे जिस हालत में भी हों, चाहे उन्होंने अपने बाक़ी हवास (इंद्रियों) को तितर-बितर और गडमड कर दिया हो, मगर यह अतिरिक्त हिस कभी ग़ाफ़िल नहीं होती। लोत्रियामों ने इनकी पूरी कैफ़ियत का ख़ुलासा एक जुमले में बयान कर दिया है, मैंने तुम्हें धोखा देने के लिए ज़रूर ऐसा कहा था, मगर दरअसल मेरी अक़्ल कभी ग़ैर-हाज़िर नहीं होती। इस अतिरिक्त हिस को ऐसा बुनियादी तशक्कुक़ (संदेहवाद) कहा जा सकता है जो अपने आप से भी मुतमइन (संतुष्ट) नहीं होता, अपने आप को भी माफ़ नहीं करता। बोदलेयर ने अपने रियाकार क़ारी (पाखंडी पाठक) को अपना हमशक्ल और भाई कहा था। यह ज़ेहनियत इस पूरी रिवायत पर हावी है, बल्कि यह जुमला और शायरों और अदीबों के यहाँ भी गूँजता है।
मैंने कहा था कि ये लोग अपना मारूज़ी मुताला (वस्तुनिष्ठ अध्ययन) करना चाहते थे, मगर मुमकिन है यह महज़ दावा ही दावा हो, बल्कि बदकारी का पर्दा बन गया हो। इसलिए एक ज़रा लंबा इक़्तिबास (उद्धरण) और पेश करूँगा। अगर एक अच्छा-ख़ासा माक़ूल आदमी अपने बीवी-बच्चों और घर-बार को छोड़ कर एक सत्रह-अठारह साल के लड़के के पीछे-पीछे शहर-दर-शहर, मुल्क-दर-मुल्क भटकता फिरे तो वाक़ई बड़ी बात है। मगर आपको दिखाना यह चाहता हूँ कि वर्लेन और राँबो ने इस क़िस्म की औबाशी (आवारागर्दी) से हासिल क्या किया? राँबो ने उपरोक्त नज़्म के एक हिस्से में अपनी दोनों की दास्तान लिखी है। अपने आप को जहन्नुमी दूल्हा क़रार दिया है और वर्लेन को पगली दुल्हन। अब सुनिए कि यह पगली दुल्हन क्या कहती है,
मैं बर्बाद हो गई, मेरी नाक में दम आ गया। मैं नापाक हूँ... मैं जहन्नुमी दूल्हे की बाँदी बन गई हूँ... वह बच्चा ही सा था... उसकी लताफ़तों (कोमलताओं) ने मुझे मसहूर (मंत्रमुग्ध) कर लिया। मैं उसके पीछे ऐसी दीवानी हुई कि अपने इंसानी फ़र्ज़ भी भूल बैठी... जहाँ वह जाता है मैं भी उसके साथ-साथ जाती हूँ, मैं मजबूर हूँ और वह अक्सर मुझ पर, मुझ बेचारी पर ख़फ़ा होता रहता है। वह तो भूत है भूत, आदमी थोड़ी है... कभी बेशर्मी की बातों पर फ़ख़्र करता है, कभी संगदिली को हसीन बना देता है और मैं सुनती रहती हूँ... अक्सर रात के वक़्त उसका भूत मेरे सर पर भी सवार हो जाता, हम लोटे-लोटे फिरते और मैं उससे लड़ती-झगड़ती... वह दिन भी क्या होते हैं जब वह इस तरह बन-बन के चलता है जैसे बहुत बड़ा मुजरिम हो! कभी-कभी वह बड़ी प्यारी देहाती ज़बान में बातें करता है... शराबख़ानों में वह पास बैठे हुए लोगों को देख-देख के रोने लगता, जिन्हें इफ़्लास (ग़रीबी) ने जानवर बना रखा था।
वह अँधेरी सड़कों पर पड़े हुए शराबियों को उठाता। उसका अंदाज़ कुछ ऐसा होता जैसे किसी बदमिज़ाज माँ को छोटे-छोटे बच्चों पर रहम आ जाए... वह ऐसी शाइस्तगी (सभ्यता) से चलता जैसे कोई छोटी सी लड़की गिरजा (चर्च) जा रही हो... वह ऐसे बनता जैसे तिजारत (व्यापार), फ़न्ने-तिब (चिकित्सा) हर चीज़ उसे आती हो... चाहे वह कैसे ही अच्छे या बुरे, पेचीदा और अजीब-ओ-ग़रीब काम क्यों न कर रहा हो, मैं उसका साथ देती। मुझे यक़ीन था कि मैं उसकी दुनिया में दाख़िल नहीं हो सकती... मगर उसकी नेकदिली बड़ी मसहूरकुन (मंत्रमुग्ध करने वाली) है, और मैं उसकी क़ैदी हूँ, किसी और में यह ताक़त... मायूसी की ताक़त नहीं हो सकती कि उसे बर्दाश्त करे, उसकी सरपरस्ती करे और उसकी मुहब्बत का भारी बोझ उठाए... मेरी ज़िंदगी उस पर मुनहसिर (निर्भर) हो कर रह गई थी। मगर मेरी हक़ीर (तुच्छ) और बेरंग सी हस्ती से उसे क्या लगाव था...?
कभी-कभी मैं चिढ़कर उससे कहती कि मैं तुम्हारी बात समझती हूँ तो वह कंधे झटक देता। इसलिए मुझे बार-बार गुस्सा आ जाता... मगर मुझे उसके प्यार और मेहरबानियों की तलब ज़्यादा ही होती गई। उसके चूमने और गले लगाने से मुझे ऐसा मालूम होता जैसे मैं जन्नत में पहुँच गई हूँ। मुझे इन बातों की आदत पड़ गई... मगर मुझे प्यार करने के बाद कहता, जब मैं तेरे पास नहीं हूँगा तो जो बातें अब तक हुई हैं, वह तुझे कैसी बेतुकी मालूम होंगी। यानी जब न तो तेरी गर्दन में मेरी बाहें होंगी, न तेरे आराम करने के लिए मेरा सीना होगा, न मेरे होंठ तेरी आँखों पर होंगे। क्योंकि एक न एक दिन मेरा कहीं दूर चला जाना ज़रूरी है। मुझे दूसरों की भी तो मदद करनी चाहिए। यह मेरा फ़र्ज़ है... मैंने उससे वादा ले लिया कि वह मुझे छोड़कर नहीं जाएगा।
उसने यह मोहब्बत भरा वादा बीसियों दफ़ा किया है मगर यह वादा भी ऐसा ही बेअसर निकला जैसे मैं उससे कहूँ कि मैं तेरी बातें समझती हूँ... कभी-कभी मैं बिल्कुल भूल जाती हूँ कि मेरी क्या गत बन गई है। वह मुझे ताक़त देगा। हम दोनों सफ़र करेंगे, रेगिस्तानों में, शिकार खेलेंगे, अनजान शहरों की पटरियों पर सोएँगे, न कोई फ़िक्र होगी न दुख। जब मेरी आँख खुलेगी तो उसकी जादुई ताक़त की बदौलत क़ानून और रस्म-ओ-रिवाज़ बदल गए होंगे, या दुनिया वैसी की वैसी होगी, मगर मुझसे मेरी ख़्वाहिशों, मेरी ख़ुशियों और मेरी बेफ़िक्रियों पर कोई पूछताछ नहीं करेगा। मैंने इतने दुख उठाए हैं कि उनके बदले में क्या तू मुझे वह अजीब-ओ-ग़रीब ज़िंदगी दे देगा, जो बच्चों की किताबों में बसती है? वह यह नहीं कर सकता। मुझे उसके आदर्श का पता नहीं।
उसने मुझे बताया है कि मेरे दिल में कुछ पछतावे हैं, कुछ उम्मीदें हैं। मगर उनका मुझसे कोई ताल्लुक़ नहीं हो सकता। क्या उसे ख़ुदा से बात करने का सौभाग्य हासिल है? शायद मुझे ख़ुदा की तरफ़ ही लौटना चाहिए। मगर मैं बिल्कुल पाताल में जा पहुँची हूँ और मुझसे दुआ भी नहीं माँगी जाती। अगर वह मुझसे अपने दुख-दर्द बयान करे तो क्या मैं उन्हें उसकी हँसी-मज़ाक से कुछ ज़्यादा समझ लूँगी? वह मुझ पर हमला करता है, दुनिया में जिस किसी बात से भी मेरा ताल्लुक़ है, उन सब पर मुझे घंटों शर्म दिलाता रहता है। अगर मैं रोऊँ तो बिगड़ बैठता है। कुछ दिन ऐसे आते कि जो आदमी किसी न किसी क़िस्म का काम करते हैं, वह उसे किसी ख़ौफ़नाक दीवानगी के खिलौने मालूम होते। वह बड़ी देर-देर तक ऐसे हँसता कि डर लगने लगता... फिर उसका अंदाज़ नौजवान माँ या बड़ी बहन का सा हो जाता। अगर वह इतना वहशी न होता तो हमारी मुक्ति हो जाती। मगर उसकी नरमी भी तो उतनी ही जानलेवा है। मैं उसकी बाँदी बन के रह गई हूँ... मैं बिल्कुल पगली हूँ!
रैंबो ने अपनी तस्वीर पेश करते हुए किसी क़िस्म की ख़ुशफ़हमी की गुंजाइश नहीं रखी, कोई रियायत नहीं बरती। कोई अच्छा या बुरा पहलू ऐसा नहीं रहा जो पेश न कर दिया हो। अपने बारे में इस क़िस्म की निष्पक्षता इस परंपरा के फ़नकारों का मक़सद था। इसी चीज़ को ज़्यादा तफ़सील से देखना चाहें तो प्रूस्त या जॉयस को देखिए। ये लोग नैतिक भटकाव में ज़रूर पड़े, मगर उन्होंने नैतिक भटकाव को भी नैतिक समझ का औज़ार बना दिया और अपने आप को नैतिक परख के लिए पेश किया। अपने आप से दूरी बरतने की सलाहियत के बिना नैतिक समझ का वजूद में आना नामुमकिन है। मुमकिन है कि इन लोगों ने मौजूदा नैतिकता की तोड़-फोड़ की हो। मगर साथ ही एक नई और ऊँची नैतिकता के लिए ज़मीन भी तैयार की। जिस दौर में इन लोगों ने अपनी रचनाएँ की हैं, कम से कम सियासत के मैदान में कोई आदमी नैतिकता के इस दर्जे तक नहीं पहुँच सका। बाहरी हक़ीक़त के अंदर तैरते-तैरते हमारे दानिशवर परमाणु तक तो जा पहुँचे हैं मगर चंद फ़नकारों के अलावा अपने अंदर गोता लगाने की हिम्मत इस ज़माने में और कोई नहीं कर सका, हालाँकि परमाणु ताक़त की तबाहियों को सिर्फ़ आत्म-मंथन की ताक़त ही रोक सकती है। मगर हमारी सियासत में आत्म-मंथन को पतनशीलता की शुरुआत समझा गया है।
अदब की इस परंपरा ने एक और बहुत बड़ा काम अंजाम दिया है। पुनर्जागरण के वक़्त इंसान ने समझा था कि मैं मज़हब और ख़ुदा की धारणाओं से आज़ाद होकर भी ज़िंदा रह सकता हूँ। इन अदीबों ने अपने ऊपर तजुर्बे करके साबित किया है कि मज़हब न सही तो किसी न किसी ऐसे ही व्यापक विचार के बिना इंसान संतुलित ज़िंदगी बसर नहीं कर सकता। किसी आलोचक ने इस तहरीक के शुरू में ही भाँप लिया था कि सौंदर्यशास्त्र का रास्ता ख़ुदा की तरफ़ जाता है। चुनाँचे यही हुआ। मार्लो के शैतान ने कहा था कि ख़ुदा से अलग होकर ऐसा मालूम होता है जैसे दोज़ख़ में जल रहे हों। बिल्कुल यही तजुर्बा रैंबो का है। बल्कि उसके ख़याल में तो ख़ुदा से भागना बिल्कुल नामुमकिन है। मैं छुप गया हूँ और नहीं छुपा। इस परंपरा में सिर्फ़ नकारात्मक पहलू ही नहीं है बल्कि बड़ी गहरी पराभौतिक (metaphysical) लगन मिलती है।
यूँ तो सभी शायरों ने, मगर ख़ास तौर से लाफ़ोर्ग और मैक्स जैकब ने तो बिल्कुल सूफ़ियों के से तजुर्बों को अपनी शायरी का विषय बनाया है। वैसे ये सब के सब बाहरी प्रकृति और इंसानी इंद्रियों की पाबंदियों से बाहर निकलने को बेक़रार हैं, बल्कि हक़ीक़त और हक़ीक़त का धोखा, ख़्वाब, इंसानी तजुर्बा, जैसे अस्पष्ट विचारों को भी अपने लिए दीवार समझते हैं। पियरे रेवर्डी के बक़ौल, जहाँ इंद्रियों की हुक्मरानी हो, वहाँ से हक़ीक़त ग़ायब हो जाती है, उड़ जाती है। लिहाज़ा इन लोगों की नज़र में शायर क़ैद में है, और उससे बाहर निकलने के ख़्वाब देख रहा है। ख़ुदा के विचार तक को एक शायर ने दीवार बताया है जो हमें उससे भी ज़्यादा सूक्ष्म हक़ीक़त तक पहुँचने नहीं देती। चुनाँचे ये लोग मारफ़त (आध्यात्मिक ज्ञान) भी बिल्कुल नए तरीक़े से हासिल करना चाहते हैं। इन लोगों का मक़सद यह है कि पदार्थ में थोड़ी सी अभौतिकता पैदा हो और अभौतिक हक़ीक़त में थोड़ी सी भौतिकता। जो चीज़ अनंत है, वह थोड़ी बहुत ठोस बने।
लाफ़ोर्ग पूछता है कि क्या हमें ख़ुदा को नए सिरे से नहीं बनाना पड़ेगा? यानी मारफ़त हासिल करने के लिए हमें वह एहसास पैदा करना पड़ेगा जिसका ख़याल अभी तक मारफ़त ढूँढने वालों को मयस्सर नहीं आया था। इस ख़्वाहिश का इज़हार उसने दूसरी तरह यूँ किया है, ऐ हमारे आसमानों वाले बाप! हमें रोज़ की रोटी पहुँचा। बल्कि बेहतर तो यह है कि हमें ज़रा अपने दस्तरख़्वान पर बैठ जाने दो। इसी तरह ज़ीद का हीरो तेज़े इस बात पर ताज्जुब करता है कि आख़िर अभौतिक दुनिया और बाहरी हक़ीक़त को अलग-अलग चीज़ें समझने की क्या ज़रूरत है।
तो गोया इस तरह ये फ़नकार प्रकृति के मुताल्लिक़ हमारी धारणाएँ भी बदल रहे हैं और एक नई क़िस्म का तसव्वुफ़ (सूफ़ीवाद) ईजाद कर रहे हैं। प्रकृति की गोताख़ोरी में वैज्ञानिक बहुत दूर निकल गया है। मगर आम आदमी प्रकृति को उसी तरह महसूस करता है जैसे दो सौ साल पहले, बल्कि महसूस करने का अंदाज़ तो शायद वैज्ञानिकों का भी नहीं बदला, नज़रिए बदल गए हैं। यह कोशिश सिर्फ़ फ़नकार ने ही की है कि एहसास के अंदाज़ ही को बुनियादी तौर पर बदला जाए। मसलन एक ज़रा सी बात यही है कि जहाँ हदें न हों वहाँ हदें भी महसूस की जाएँ और जहाँ हदें मौजूद हों उन्हें महसूस न किया जाए।
दूसरी कोशिश यह है कि आवाज़ या रोशनी जैसे तत्वों को उनके मूल रूप में महसूस किया जाए और ठोस और अमूर्त चीज़ों को आपस में मिला दिया जाए। इस प्रक्रिया को सां पोल रो ने न दिखाई देने वाली चीज़ों की दिखाई देने वाली ज्यामिति बना दिया है। इसी तरह एक कोशिश यह हुई है कि अंधेरे, उजाले, वास्तविक और अवास्तविक, ज़िंदा और मुर्दा के विरोध को झूठा क़रार दे दिया जाए। इसके लिए एक बिल्कुल ही नई क़िस्म की क्षमता दरकार होगी और ज़ेहन, भावनाओं, और याददाश्त सब को बेकार समझ कर छोड़ देना पड़ेगा। इसी नई क्षमता को पोल एल्वॉर ने यूं बयान किया है, मैं नज़र की शुद्ध शक्ति का ग़ुलाम बन गया, अपनी अवास्तविक और अछूती आंखों का ग़ुलाम, जो न दुनिया से वाक़िफ़ हैं न अपने आप से। यह बड़ी सुकून भरी ताक़त है। मैंने जो दिखाई देता है उसे भी ख़त्म कर दिया और जो नहीं दिखाई देता उसे भी। मैंने अपने आप को एक बेदाग़ आईने में खो दिया!
इन लोगों ने बाहरी प्रकृति और अपने अस्तित्व का विश्लेषण करके उसे बिखेर देने के बाद, उनमें से ऐसी शक्तियां निकालीं जो बुद्धि के दायरे में नहीं समातीं। उदाहरण के लिए बुराई, अव्यवस्था। मुमकिन है उन्होंने इन चीज़ों पर ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान दिया हो। बहरहाल उन्होंने यह मंज़ूर नहीं किया कि हमें अनुभव तो हो अव्यवस्था का और ब्रह्मांड को हम व्यवस्थित बनाएं। इसके बजाय उन्होंने इंसान, प्रकृति, ब्रह्मांड और वास्तविकता का ऐसा व्यापक विचार ढूंढने की कोशिश की, जिसमें इन सब तत्वों की जगह निकल आए और जो उन तमाम तत्वों पर हावी हो, जिनका मैंने ज़िक्र किया।
आप कह सकते हैं कि ऐसा विचार ढूंढने की कोशिश ही सिरे से निरर्थक और अर्थहीन है, या ऐसा विचार या विचार पहले से मौजूद हैं, या इन लोगों को इस जद्दोजहद में बड़ी सख़्त नाकामियों का मुंह देखना पड़ा और उनकी कला इंसानियत के लिए नुक़सानदेह बन कर रह गई। ये सब सवाल अलग हैं। मैं इनमें उलझना नहीं चाहता। मैं तो सिर्फ़ इतनी बात साबित कर रहा हूं कि इन लोगों ने कोरा सौंदर्यवाद नहीं अपनाया, बल्कि इंसान की पूरी संवेदना प्रणाली को बदलना चाहा। विज्ञान की नवीनतम खोजों को मानवीय चेतना में जज़्ब करने की तरफ़ पहला क़दम उठाया, जिसके बिना ज्ञान कभी-कभी वह प्रतिरूप बन जाता है जो क़ब्ज़े से निकल गया हो, और मूल तत्व के सबसे हावी तत्व यानी अनुभववाद पर एक नए रहस्यवाद की नींव रखने की कोशिश की। यह कोशिश शायद इतनी व्यापक और संपूर्ण है कि इंसान की मौजूदा क्षमताएं उनसे पार नहीं पा सकतीं। इस स्थिति में हमें गर्व करना चाहिए कि इंसान ने ऐसे महान काम का ख़्वाब देखा। इसके बाद हम जितनी चाहें आपत्तियां कर सकते हैं और वे सब की सब मुझे स्वीकार होंगी। बल्कि मैंने ख़ुद भी ऐसी आपत्तियां कई बार की हैं।
प्रकृति और पराभौतिकी के अवलोकन के लिए नई नज़र पैदा करने की कोशिश का एक ज़रूरी हिस्सा यह भी है कि एक नई कला का आविष्कार किया जाए। आम तौर से सौंदर्यवाद के जो अर्थ लिए जाते हैं, वे यहां बिल्कुल बेकार हो जाते हैं। इन लोगों की कोशिशों का निचोड़ यह है कि वास्तविकता को केवल बयान करके न रख दिया जाए, बल्कि शब्दों की मदद से एक नई वास्तविकता रची जाए। सां पोल रो के अनुसार, इन लोगों के सामने लक्ष्य पुनर्जन्म नहीं था, बल्कि केवल जन्म था। एक तरह से देखिए तो यह तत्व शायरी में हमेशा मौजूद रहा है। मगर इन लोगों ने सचेत रूप से कोशिश की कि यह तत्व हमारे यहां ज़्यादा से ज़्यादा नज़र आए। ये लोग मानो शब्द को आज़ाद कर देने की धुन में लगे हुए थे। सां पोल रो ने इस प्रक्रिया की व्याख्या यूं की है, शब्दों में पहली बार पंख लगे हों। इन पंखों से शब्द इस क़ाबिल हो जाएंगे कि वास्तविकता से पराभौतिकी में, और कल्पना से वस्तुओं की दुनिया में छलांग लगा जाएं।
इस वाक्य से स्पष्ट हो गया होगा कि यह व्यावहारिक जीवन से पलायन या केवल सौंदर्यात्मक संतुष्टि की चाह नहीं है, बल्कि प्रकृति और वास्तविकता के विचार को बुनियादी तौर पर बदलने की व्यापक कोशिश का एक हिस्सा है। इसी प्रक्रिया को रां बो ने शब्दों की कीमियागरी कहा है, या ऐसा काव्यात्मक शब्द जिससे सारी इंद्रियां फ़ायदा उठा सकें। अपने रचनात्मक प्रयासों का ज़िक्र करते हुए वह कहता है कि, मैं ख़ामोशियों को, रातों को, शब्दों की गिरफ़्त में ला रहा था, जो बयान हो सकता था उसे लिख रहा था। मैं भंवरों को क़ायम कर रहा था।
अगर आप इस प्रक्रिया को और ज़्यादा स्पष्टता के साथ समझना चाहते हैं तो ज़ां पोल सार्त्र की व्याख्या देखिए। उनके ख़्याल में कवि शब्दों का इस्तेमाल ही नहीं करता। गद्यकार शब्दों के अंदर दाख़िल होकर उनका अच्छी तरह मुआयना कर सकता है। यह बात कवि के बस में नहीं। वह शब्दों को सिर्फ़ बाहर से देखता है। गद्यकार की तरह वह किसी चीज़ को बयान नहीं कर सकता। इसके बजाय वह उस चीज़ के मुक़ाबले में, शब्दों की मदद से एक नई चीज़ बना कर रख देता है। वह शब्दों की शक्ल में चीज़ों का विकल्प पेश करता है, इसलिए उसके शेर केवल वर्णनात्मक वाक्य नहीं होते, बल्कि चीज़ें होते हैं। कवि ठेठ मायनों में रचयिता होता है। सार्त्र ने मिसाल के तौर पर रां बो की दो लाइनें पेश की हैं:
कैसे-कैसे मौसम हैं! कैसे-कैसे क़िले हैं!
वह कौन सी रूह है जो बेगुनाह हो?
सार्त्र कहते हैं, यहां न तो किसी से सवाल किया गया है, न कोई सवाल करता है, कवि बिल्कुल ग़ायब है, इस सवाल का जवाब नहीं दिया जा सकता। या यूं कहिए कि यह ख़ुद अपना जवाब है। क्या यह झूठा प्रश्न है? मगर यह समझना निरर्थक बात होगी कि रां बो यह कहना चाहता है कि हर आदमी के अपने-अपने गुनाह हैं। जैसा ब्रतों ने सां पोल रो के बारे में कहा था, अगर वह ऐसा कहना चाहता तो कह देता। उसने कोई और बात भी नहीं कहनी चाही। उसने तो एक निरपेक्ष प्रश्न पेश किया है। उसने तो रूह के एक हसीन शब्द को प्रश्नात्मक अस्तित्व प्रदान कर दिया है। यहां प्रश्न एक चीज़ बन गया है जैसे टिंटोरेटो का दर्द और पीड़ा पीला आसमान बन गया था। यह केवल अर्थ नहीं रहा, बल्कि भौतिक चीज़ बन गया है। इसे बाहर से देखा गया है और रां बो हमें दावत देता है कि हम उसके साथ मिलकर इसे बाहर से देखें। इसमें आश्चर्य इस बात से पैदा होता है कि इसे देखने के लिए हम मानवीय स्थिति की हदों से बाहर निकल जाते हैं और इसे वहां से देखते हैं जहां से ख़ुदा देखता है।
नई कला रचने की इस कोशिश को अगर हम अत्यंत महान कारनामा मान भी लें, तो भी एक आपत्ति यह उठती है कि इनमें से कुछ लोगों ने जीवन की अभिव्यक्ति करने के बजाय अभिव्यक्ति की प्रक्रिया और अभिव्यक्ति के साधनों को ही अभिव्यक्ति का विषय बनाया, बल्कि वालेरी ने तो यहां तक कह दिया कि मुझे तो बस कार्यप्रणाली से दिलचस्पी है। अगर आदमी अभिव्यक्ति का तरीक़ा ढूंढ ले, तो फिर अभिव्यक्ति की भी ज़रूरत नहीं। अगर आप सिर्फ़ सिद्धांतों तक सीमित रहें, तो वाक़ई यही मालूम होता है कि ये लोग ज़िंदगी से बेगाने हो गए होंगे। मगर सवाल मेरा या आपका नहीं, कलाकार का है। और कलाकार भी कैसे, मालार्मे और वालेरी जैसे। अगर इस स्तर का कलाकार यह खोज शुरू करता है कि अभिव्यक्ति की स्थिति क्या होती है, अभिव्यक्ति में बाधा किस तरह और किन बातों से पड़ती है, और यह रुकावट किस तरह दूर होती है, तो नामुमकिन है कि वह इंसानी दिमाग़ और इंसानी ज़िंदगी के सबसे बुनियादी तत्वों तक न पहुंच जाए।
इसलिए मौत और ज़िंदगी, जिस्म और रूह, अच्छाई और बुराई, शून्यता और वजूद, गर्ज़ इंसान के वो कौन से बुनियादी मसले हैं जो हमें मालार्मे (Mallarmé) और वालेरी (Valéry) के कलाम में न मिलें। वालेरी ने जो नज़्में इज़हार (अभिव्यक्ति) के मसलों से जुड़ी लिखी हैं, उन्हें पढ़ते हुए हमें इंसान के बारे में बड़े गहरे खुलासे होते हैं, बल्कि अच्छा-ख़ासा एक जीवन-दर्शन तैयार किया जा सकता है। रही यह बात कि इन दोनों में ज़िंदगी घटते-घटते इतनी कम हो गई थी कि इनके यहाँ मौत और ज़िंदगी का फ़र्क़ बहुत धुंधला-सा रह गया है। तो यह मसला बहस से हल नहीं हो सकता, बल्कि मालार्मे की 'एरोदियाद' (Hérodiade) और 'चरवाहे का ख़्वाब' (अनुवादक: मीराजी) या वालेरी की नज़्म 'साँप' पढ़ के देखनी चाहिए। इन लोगों ने भी मौत से कशमकश (संघर्ष) की है और मौत पर जीत पाई है। अलबत्ता गिरेबान फाड़ के ज़िंदगी! ज़िंदगी! चिल्लाते हुए नहीं भागे। इन लोगों का एक ख़ास ज़हनी कल्चर (मानसिक संस्कृति) है, एक ख़ास लब-ओ-लहजा है, इसी के अंदर रह के बात करते हैं। मालार्मे ने ज़िंदा रहने की ख़्वाहिश का इज़हार ऐसे मोहज़्ज़ब (सभ्य) लहज़े में किया है:
लेकिन ऐ मेरे दिल! ज़रा मल्लाहों का गाना तो सुन!
वालेरी ने मरने की ख़्वाहिश पर जीत पाने का ज़िक्र यूँ किया है:
हवा सनकने लगी, जीने की कोशिश करनी चाहिए।
इन शायरों पर सबसे ज़्यादा लानत-मलामत (निंदा) इसलिए की जाती है कि उन्होंने सामाजिक मसलों को ध्यान देने लायक़ नहीं समझा, इसकी हक़ीक़त सिर्फ़ इतनी है कि उन्होंने किसी ख़ास जमात (पार्टी) की सियासत को ध्यान देने लायक़ नहीं समझा। यह तो मैं बहुत पहले बता आया हूँ कि उन्हें हर क़िस्म के जामिद तसव्वुरात (जड़ धारणाओं) से आज़ाद रहने की इतनी फ़िक्र क्यों थी। मगर सियासत या सियासी जमातों से अलग रहना ज़रूरी इसलिए था कि सियासी लोग सबसे अज़ीज़ धारणाओं को भी मस्लहत (सुविधा या समझौते) पर क़ुर्बान कर सकते हैं। यह सिर्फ़ ख़याली डर नहीं था बल्कि बोदलेयर (Baudelaire), वेर्लेन (Verlaine), और रैंबो (Rimbaud) इंक़लाबों में ख़ुद हिस्सा लेकर सियासी लोगों की हक़ीक़त का तजुर्बा कर चुके थे। बोदलेयर ने कहा है कि भला जम्हूरियत-परस्ती (लोकतंत्र-प्रेम) से कौन बच सकता है, यह तो आतिशक (सिफ़िलिस) के कीटाणुओं की तरह हमारे ख़ून में मिली हुई है। तो इसका मतलब यह नहीं है कि बोदलेयर अवाम का दुश्मन था, इस जुमले का मतलब यह है कि हम जानते हैं कि सियासी लोग जम्हूरियत का नाम लेकर किस तरह अपना उल्लू सीधा करते हैं, मगर इसके बावजूद हम जम्हूरी निज़ाम (लोकतांत्रिक व्यवस्था) की ख़्वाहिश करने पर स्वाभाविक रूप से मजबूर हैं। जमाल-परस्ती (सौंदर्य-प्रेम) का इल्ज़ाम अगर थोड़ा-बहुत किसी पर लग सकता है तो उइस्मांस (Huysmans) पर, मगर उस तक ने इस हक़ीक़त को महसूस कर लिया था—उसका एक किरदार कहता है कि अगर मैं अपने-आप को फ़रेब देता रहता हूँ तो क्या है, मध्यम वर्ग तो जम्हूरियत का नाम लेकर ग़रीबों को अच्छी तरह उल्लू बना रहा है, मेरा फ़रेब खाना तो फिर भी इस दर्जे का नहीं है।
सियासत-बाज़ी को छोड़िए, जहाँ तक इफ़्लास (ग़रीबी) के मसले का सवाल है, इस रिवायत (परंपरा) वालों को इसका इंतिहाई तल्ख़ (कड़वा) एहसास रहा है, बल्कि शायद इतनी तल्ख़ी उन लोगों में न होगी जो सीधे तौर पर सामाजिक मसलों को अपना मौज़ू (विषय) बनाते हैं। मिसाल देने बैठूँ तो एक नया मज़मून (लेख) तैयार हो जाएगा, एक अकेले रैंबो के यहाँ अच्छी-ख़ासी दर्जन भर नज़्में ऐसी निकल आएँगी जिनमें ग़रीबों से गहरी हमदर्दी का इज़हार किया गया है। 'मसहूर बच्चे' (मंत्रमुग्ध बच्चे), 'जुएँ चुनने वालियाँ', 'ग़रीब लोग गिरजा में' वग़ैरह-वग़ैरह।
और अपनी नज़्म 'पेरिस फिर बसता है' में तो रैंबो ने मौजूदा सियासी और मआशी निज़ाम (आर्थिक व्यवस्था) पर ऐसा ख़ौफ़नाक तंज़ (व्यंग्य) किया है जिसकी मिसाल अदब (साहित्य) पेश नहीं कर सकता। इस रिवायत ने सिर्फ़ एहतेजाज (विरोध) या हमदर्दी पर इक्तिफ़ा नहीं किया (यानी बस वहीं तक सीमित नहीं रही), बल्कि ग़ैर-सियासी इस्तलाहों (शब्दावली) में एक हमगीर (सर्वव्यापक) न्याय और आज़ादी का ख़्वाब देखा है, सिर्फ़ तोड़ा नहीं, बनाया भी है।
प्रूस्त (Proust) और जॉयस (Joyce) तक पहुँचते-पहुँचते इस रिवायत ने इंसानी ज़िंदगी के कुछ लाज़िमी इदारों (संस्थाओं) का इस्बात (पुष्टि) शुरू कर दिया है। इसलिए इन दोनों ने शुरुआती इंसानी ताल्लुक़ात, मसलन ख़ानदान की ज़रूरत का एतेराफ़ (स्वीकार) बड़े ज़ोर-शोर से किया है। इसी तरह ज़ीद (Gide) ने अपने ताज़ा-तरीन नॉवेल 'तेज़े' (Thésée) में महज़ इनफ़िरादियत (व्यक्तिवाद) को काफ़ी नहीं समझा, बल्कि रिवायत को भी आदमी के मुकम्मल विकास (नशो-नुमा) के लिए लाज़िमी बताया है। इसके अलावा इस नॉवेल में उन्होंने सीधे तौर पर एक ऐसे जीवन-निज़ाम की तारीफ़ की है जहाँ दौलत सब लोगों में बराबर तक़्सीम होती है और आदमी का सामाजिक दर्जा सिर्फ़ ज़ाती क़ाबिलियत से तय होता है। ज़ीद की इस दुनिया में न्याय ही नहीं, आज़ादी भी है। बादशाह तेज़े रूहानी दुनिया और बाहरी हक़ीक़त को अलग-अलग चीज़ें नहीं समझता और उसका मआशियात-ज़दा (अर्थव्यवस्था का मारा) मेहमान ईडिपस (Oedipus) इन दोनों को अलग-अलग मानता है। मगर इस इख़्तिलाफ़ (मतभेद) के बावजूद तेज़े का रवैया मुआनिदाना (दुश्मनी भरा) नहीं होता, बल्कि उसका अक़ीदा है कि ईडिपस के आने से मेरे शहर पर बरकतें नाज़िल हुई हैं। यह है वो दुनिया जिसे ये जमाल-परस्त (सौंदर्य-प्रेमी) बनाना चाहते हैं। यह बात आपको सिर्फ़ 'फ़न बराए फ़न' (कला के लिए कला) के पुजारियों की दुनिया में ही मिलेगी कि अपने मुख़ालिफ़ (विरोधी) को रहमत समझा जाता हो।
इस किताब में ज़ीद ने फ़र्द (व्यक्ति) के विकास और तकमील (पूर्णता) का इंतिहाई सेहतमंद तसव्वुर पेश किया है। फ़र्द को चाहिए कि अपना एक काम तय कर ले और फिर दिल-ओ-जान से उसे पूरा करने में लग जाए। रास्ते से भटकने पर तो इंसान मजबूर है। मगर हमेशा के लिए भटक कर न रह जाए। काम को बीवी-बच्चों से भी ज़्यादा अज़ीज़ रखे और उसे पूरा करके छोड़े और यह काम ऐसा हो कि इससे पूरी इंसानियत को फ़ायदा पहुँचे। इसी से फ़र्द की ज़िंदगी मुकम्मल होती है। ज़ीद के नज़दीक काम को अधूरा छोड़ना सबसे बड़ा गुनाह है और दोज़ख़ (नरक) में आदमी को यही सज़ा दी जाएगी कि जो काम तुमने पूरा नहीं किया था, उसे बार-बार करो।
आप कहेंगे कि आख़िर ज़ीद साहब को होश आ गया तो बड़ी अच्छी बात है। मगर वो ख़ुद और उनके साथ दूसरे जमाल-परस्त भी ऐसी चीज़ें लिखते रहे हैं जिनसे एक मौहूम (धुंधली-सी) जमालियाती तस्कीन (सौंदर्यात्मक संतुष्टि) तो हासिल होती है, मगर इंसानियत को और कोई साफ़ फ़ायदा नहीं पहुँचता। यह एतराज़ सिर्फ़ सियासी क़िस्म के लोगों ही की तरफ़ से नहीं लगाया जाता, बल्कि ऐसे लोगों की तरफ़ से भी जो सियासत से बाहर निकलने के लिए हाथ-पाँव मार रहे हैं। इसलिए कोएस्लर (Koestler) ने ज़ीद पर एतराज़ किया है कि उनकी किताबों में कोई ख़याल नहीं होता। बस एक मुबहम-सा (अस्पष्ट) ज़ायक़ा, एक हल्की-सी ख़ुशबू ज़रूर महसूस होती है जो उनकी तख़्लीक़ात (रचनाओं) को अदबी अज़मत (साहित्यिक महानता) अता करने के लिए काफ़ी नहीं है। क्योंकि ख़ाली ज़ायक़े से इंसानियत को कोई फ़ायदा नहीं पहुँचता, मगर कोएस्लर के ख़िलाफ़ शहादत (गवाही) देने के लिए मैं ख़ुद अपने तजुर्बात पेश करता हूँ।
ज़ीद ने युद्ध के दौरान अपनी डायरी में जो कुछ लिखा है, उसका ज़्यादातर हिस्सा विचार नहीं बल्कि सिर्फ़ यही स्वाद देता है। इत्तेफ़ाक़ की बात है कि जिन दिनों मुसलमानों के क़त्ले-आम का सिलसिला शुरू हुआ, मुझे इस डायरी के अलग-अलग हिस्से पढ़ने को मिल गए। जिस तरह के बाहरी हालात ज़ीद के लिखते वक़्त थे, उससे भी ज़्यादा चिंताजनक मेरे पढ़ते वक़्त थे। मगर मेरे सामने एक बड़ी ठोस हक़ीक़त यह भी थी कि ज़ीद के मानसिक सुकून में कोई फ़र्क़ नहीं आया था। उनके लहज़े में किसी तरह की बेचैनी नहीं आई थी। शायद ज़ीद ने इतनी ख़ूबसूरत गद्य उम्र भर में कभी नहीं लिखी। शायद उन्होंने बाहरी हक़ीक़त से इतना गहरा प्रभाव कभी क़ुबूल नहीं किया। ज़ीद का ज़ेहन वक़्ती उथल-पुथल और बेचैनी के मुक़ाबले में महज़ ज़िंदगी को तरजीह दे रहा था। उसने माहौल की निराशा और डर से हार मानना गवारा नहीं किया था। बल्कि इन हालात में भी ज़िंदगी का रस लेने में लगा हुआ था। क्या अपने अंदर इस संतुलन की सलाहियत रखना और दूसरों में यह सलाहियत पैदा करना इंसानियत की ख़िदमत नहीं है? क्या ज़िंदगी की ताक़तों को कमज़ोर न पड़ने देना एक ठोस कारनामा नहीं है? क्या इस रवैये से ज़िंदगी पर बिना शर्त यक़ीन का इज़हार नहीं होता?
जिस परंपरा की शुरुआत 'कला के लिए कला' के नज़रिए से हुई, उससे ताल्लुक़ रखने वाले कलाकारों के यहाँ इधर-उधर जो अस्वस्थ तत्व भी मिलते हों, उनसे मुझे इनकार नहीं। अलबत्ता इस बात से इनकार है कि यह परंपरा कुल मिलाकर अवाम या बेहतर ज़िंदगी या महज़ ज़िंदगी की दुश्मन है और इंसानियत को पतन या मौत की तरफ़ ले जाती है। इसके बरख़िलाफ़ यह परंपरा एक शानदार खोजी मुहिम की हैसियत रखती है जो ज़िंदगी और ज़िंदगी की बुनियादी ज़रूरतों को ढूँढने निकली है और इस हिम्मत और आत्मविश्वास के साथ कि किसी बने-बनाए विचार का सहारा तक नहीं लिया।
यह आंदोलन भलाई और सच्चाई के बुनियादी वजूद से इनकार नहीं करता बल्कि उनका मुकम्मल इक़रार चाहता है... ऐसा इक़रार जो शायद इंसान के लिए मुमकिन भी नहीं है। इंसान का स्नायु तंत्र (नर्वस सिस्टम) जितनी पीड़ा और तकलीफ़ बर्दाश्त कर सकता है, उसे कलाकारों ने आगे बढ़कर क़ुबूल किया है ताकि इंसानियत को हक़ीक़त से वाक़िफ़ करा सकें और इस लगन में उन्होंने आसानियाँ नहीं ढूँढीं, किसी स्वार्थ से समझौता नहीं किया, मुकम्मल सच्चाई के अलावा किसी और चीज़ को तवज्जो के क़ाबिल नहीं समझा। मुमकिन है कुछ कोशिशों में ये बिल्कुल नाकाम रहे हों। मगर कला सियासत का मैदान नहीं। यहाँ फ़ैसला कामयाबी और नाकामी के हिसाब से नहीं होता। यहाँ चलना ही सब कुछ है। पहुँचना न पहुँचना सब बराबर है।
यूरोप की चेतना ज़िंदगी से बेगानी होती जा रही थी। उन्होंने जहाँ तक हो सका ज़िंदगी को क़ायम रखा। उन्होंने अपने फ़र्ज़ से जी नहीं चुराया। अपना काम बेदिली से नहीं किया। इंसानियत को गर्म रखने के लिए आसमानों से आग लाने की धुन में बराबर लगे रहे। इन लोगों में जो प्रेरणा बुनियादी तौर पर काम कर रही थी, वह यही थी। इसका लिहाज़ रखे बिना उन्हें नहीं जाँचा जा सकता। समय और स्थान की स्थितियों ने जो काम उनके ज़िम्मे डाला था, उसे उन्होंने अधूरा नहीं छोड़ा। 'तेज़े' (Theseus) की तरह उनका भी शहर बन गया है और दोज़ख़ उन पर हराम हो गई है।
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