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jis ke hote hue hote the zamāne mere

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हिरोइन

इस्मत चुग़ताई


अनुवाद : Rekhta Editor

MORE BYइस्मत चुग़ताई

    ताली हमेशा दो हाथ से बजती है। साहित्यिक ताली बजाने के लिए भी दो हाथों की ज़रूरत पड़ती है और आम तौर पर इन दो हाथों से हमारा मतलब साहित्य के हीरो और हीरोइन से है। यूँ तो ऐसा साहित्य भी है जिसमें हीरो और हीरोइन नहीं, वह साहित्य भी ऐसा ही है जैसे किसी ने एक हाथ और पैर के तलवे की मदद से ताली बजा दी हो। ऐसी ताली बज तो गई मगर किताबों की जिल्दों ही में गूँज कर रह गई, अवाम तक उसकी पहुँच हो सकी और अगर सारे साहित्य में हीरोइन और हीरो हुए तो यक़ीनन यह सूखा सत्तू बनकर गले में फँस जाता। अवाम का ध्यान खींचने के लिए बंदर-बंदरिया को डुगडुगी बजाकर नचाना पड़ता है, वैसे अगर उपदेश देने खड़े हो जाएँ या ज़माने के हालात सुनाने लगें, तो ज़ाहिर है कि कोई भी सुनेगा। देखिए ना, शिक्षा विभाग और मस्जिदों से लोग कितना कतरा कर निकलते हैं। लिहाज़ा जब किसी को कुछ कहना होता है तो बंदर-बंदरिया के गले में डोरी बाँधी और डुगडुगी बजाना शुरू कर दी। हीरो और हीरोइन के रसीले कारनामों से ऐसी रंगीनियां भरीं कि लोग टूट पड़े, कुछ एहसासों को फुसलाया, कुछ जज़्बातों को गुदगुदाया और मतलब हासिल हो गया। शिक्षा विभाग में सबसे ज़्यादा अहमियत दिलचस्प पाठों को हासिल है, हर बात ऐसी सूरत में पेश करनी चाहिए कि बच्चे उसमें गिल्ली-डंडे और कबड्डी की रौनक़ें पाकर आकर्षित हो जाएँ। साहित्य का भी कुछ यही हाल है। कड़वी से कड़वी खुराक शक्कर में लपेट कर दे दीजिए, लोग वाह-वाह करके निगल जाएँगे। रामायण और महाभारत का ज़माना क्यों अब तक कल की बात बना हुआ है। अज़ीम बेग चुग़ताई ने क़ुरान की मदद से पर्दे को चाक करना चाहा मगर सिवाय मौलवियों की जूतियों के कुछ मिला। लेकिन शरीर बीवी ने कुनैन खिलाकर और कोलतार ने अक़्लों पर काला पर्दा डालकर हिजाब को मार भगाया। अल्लामा राशिद-उल-खैरी और प्रेमचंद जी अगर हीरो-हीरोइन के कंधों का सहारा लेते तो आज लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ के बजाय सिर्फ़ खस्ताहाल पुस्तकालयों में पड़े ऊँघ रहे होते।

    साहित्य और ज़िंदगी, साहित्य और समाज, साहित्य और इतिहास में चोली-दामन का साथ है, अगर इन्हें एक-दूसरे से अलग करने की कोशिश की जाएगी तो दोनों मिट जाएँगे। दूसरे मायनों में अगर साहित्य से ज़िंदगी यानी हीरो और हीरोइन को अलग कर दिया जाए तो एक खालीपन रह जाएगा। हीरो से ज़्यादा मैं इस वक़्त हीरोइन की हैसियत (जो साहित्य में है) पर ग़ौर करना चाहती हूँ। हीरोइन जाम-ए-जम (जादुई प्याले) की सी हैसियत रखती है। उस पर एक नज़र डालकर ही हम उसके ज़माने के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक हालात का अंदाज़ा लगा सकते हैं। मसलन फ़साना-ए-आज़ाद की औरत को देखकर जो उस ज़माने का अंदाज़ा लगाया जा सकता है, वह यह है कि उस वक़्त जो चर्चा के लायक़ औरत थी, वह निहायत सभ्य, पढ़ी-लिखी और दिलचस्प तवायफ़ थी। सरशार को भला शरीफ़ घराने की औरत कहाँ मिली होगी और वह भी मुसलमान ख़ानदान की। उस वक़्त शरीफ़ बीवियाँ घर में बैठी हंडिया-चूल्हे से सिर मार रही होंगी। सड़ी-बसी, बेढंगी नौकरानियाँ, जिनसे ऊबकर लोग तवायफ़ों की आगोश में दिल-ओ-दिमाग़ का सुकून तलाश करने जाते हैं। यह तवायफ़ इतनी बाज़ारी और कारोबारी क़िस्म की थी, वह बिल्कुल शरीफ़ज़ादियों की तरह रहती मगर शरीफ़ज़ादियों से ज़्यादा खुशमिज़ाज और नफ़ीस थी। ज़ाहिर है कि तवायफ़ की हैसियत बिल्कुल एक 'बाग़-ए-आम' (सार्वजनिक पार्क) की सी थी जो अवाम के चंदे से अवाम की खुशी के लिए क़ायम किया जाए। हर मर्द की इतनी हैसियत कहाँ कि पढ़ी-लिखी, सलीक़ेमंद बीवी शानदार मकान में फूलों से लदी और इत्र में बसी हुई रख सके। लिहाज़ा उसने इसका निहायत आसान इलाज निकाला। घर में तो बीवी रखी जो नस्ल बढ़ाने के अलावा दूसरी ज़रूरतों को भी पूरा करती रही और बाज़ार में तवायफ़ जो कोमल जज़्बातों की पाल-पोस करती रही। यह बड़ा कारगर इंतज़ाम साबित हुआ, घर भी रहा, रंगीनियां भी। मगर तवायफ़ की सौतन गृहस्थिन ने शरारतें शुरू कर दीं, अगर मियाँ रूह के सुकून के लिए तवायफ़ के यहाँ गए तो वह भी मोहल्ले-टोले में आँख लड़ाने लगी। मजबूरन वे शौहर जिन्हें बाग़-ए-आम की सैर ज़रा महँगी पड़ती थी, वापस गृहस्थिन की तरफ़ लौट पड़े। सोचा कि चौराहे की हाँडी से तो अपनी दाल-रोटी ही बेहतर है। औरत भी कुछ शेर हो गई, उसने वह सब कुछ सीखना शुरू किया जिसकी तलाश में शौहर तवायफ़ के पास जाता था। मगर आहिस्ता-आहिस्ता उसने क़दम बढ़ाए। अहिंसा की पॉलिसी के तहत तवायफ़ के दर से भीख माँगकर इज़्ज़त और तवज्जो हासिल करना शुरू की। सरशार की कामयाब तवायफ़ को शिकस्त देकर प्रेमचंद की गृहस्थिन दबे पैर घूँघट काढ़े, क़दम-क़दम पर पैर चूमती, माथा टेकती, साहित्य में रेंगने लगी। बाग़-ए-आम के सैलानी अपने ही गमले में छुई-मुई का कल्ला फूटते देखकर कुछ हैरान, कुछ मगरूर उसकी सिंचाई करने लगे। रंडी तो ख़ैर थी ही, मगर यह मीठी-मीठी, मासूम सी हानिरहित चीज़ कुछ ऐसी प्यारी मालूम हुई कि तवायफ़ का पलड़ा उचक गया। उसकी खूबियाँ ऐब हो गईं। वही नाज़-ओ-अदा जिसकी तलाश में नाकें रगड़ने जाते थे, रंडी के चोंचले बन गए। चौराहे के नल को गंदा कहकर लोगों ने अपने ही घरों में कुएँ खोदना शुरू कर दिए। मगर ये कुएँ रोज़-ब-रोज़ गहरे होते गए। यहाँ तक कि किनारे हाथ से छूट गए और डूबना पड़ा। तवायफ़ बहुत झुँझलाई, बहुत बिगड़ी मगर ताज सदा एक के सिर नहीं रहता। अदूरदर्शी ने फल तो कच्चे-पक्के खूब खाए मगर नई पौध नहीं लगाई और उधर मासूम घूँघट वाली ने नई पौध भी लगाई और पुरानों को भी सींचा।

    नतीजा यह कि रंडी के खंडहरों को मिटाकर गृहस्थिन ने दुनिया बनानी शुरू कर दी और फिर उसकी कमान चढ़ गई, वही एड़ी तले कुचलने वाले मर्द उसके समर्थन में एक-दूसरे को लानत-मलामत करने लगे। एक-दूसरे के ऐब खोलकर बीच सड़क पर पटक दिए। वह खुद निष्पक्ष रही, किसी से लड़ी भिड़ी, अहिंसा की क़ायल, मगर जैसे गाँधी जी व्रत रख-रख कर गवर्नमेंट को बौखलाए देते हैं, बिल्कुल उसी तरह झुकी-झुकी आँखों से, नक़ाब के पीछे से तहलका मचाने लगी। लेकिन अब भी पूरी जीत हासिल हो सकी। क्योंकि तवायफ़ के बाद फ़ैशनेबल मेम या पारसन ने कुछ कुछ हिस्सा मैदान का घेरे रखा। साहित्य की इस क़िस्म की हीरोइन ने हर कहानी और हर क़िस्से में घुसना शुरू किया। मगर वह जिसने तवायफ़ को मार भगाया, उस मेम से क्या दबती। उसने इतना तो मालूम कर लिया कि घर में बैठने से काम नहीं चलेगा। मर्द मजबूरन उसे घर में बंद करके अकेला बाहर जाता है मगर वहाँ वह अकेला रह नहीं सकता। वह सीधे हाथ में छड़ी और उल्टे हाथ में औरत चाहता है। दिल-ओ-दिमाग़ की ताक़त के लिए घर में रखी हुई माजून दफ़्तर और कारोबार में भला क्या मदद पहुँचा सकती थी। लिहाज़ा वक़्ती गुज़ारे के लिए उसने दफ़्तर ही में दूर बैठी हुई टाइपिस्ट, कभी-कभी नज़र जाने वाली मैनेजर की हसीन लड़की और ऐसी ही इक्का-दुक्का हीरोइन ढूँढकर जिस्म तापना शुरू कर दिया। इसके जवाब में गूदड़ का लाल, रौशनग बेगम, ज़ोहरा बेगम की हीरोइन को देखकर हमें मानना पड़ता है कि औरत की जंग बराबर जारी रही और जीत आख़िर में उसी की हुई।

    मगर उसे फिर भी चैन नहीं आया। उसने तो बिल्कुल ही गले का फंदा बनने का फैसला कर लिया था। वह और आगे बढ़ी, पहले तो घर की चारदीवारी में चचेरे-ममेरे भाइयों, उनके दोस्तों और आस-पड़ोस वालों से आँख-मिचौली शुरू कर दी। अज़ीम बेग की हीरोइन ने परदे और बुर्क़े के ताने-बाने के अंदर कुश्तियाँ लड़नी शुरू कर दीं। मौक़ा-बेमौक़ा सिर पर चढ़ बैठी। गर्दन में झूल गई। सीने से लगी। ये छुपे-ढके जलवे और भी ज़्यादा गुदगुदाने लगे। तवायफ़ों के नखरे पुराने और प्रेमचंद की अहिंसा की क़ायल पवित्र चेली, बेवकूफ़ और बुज़दिल नज़र आने लगी, उसके भोंदूपन से जान जलने लगी। जितना भी वह नाक रगड़ती गई, उससे नफ़रत होती गई। यहाँ तो अब सिर्फ़ वह हीरोइन पैर जमा सकती थी जो मुँह का निवाला उचक ले। भिड़ों का छत्ता मुँह पर उलट दे। मीठी-मीठी नज़रों के बजाय कुनैन में बुझे हुए तीरों से मुँह और ज़बान की ख़ातिरदारी करे। पढ़ी-लिखी चाहे ख़ाक हो, मगर वक़्त-बेवक़्त थप्पड़ और चांटों से गाल सेंक दे। तनख़्वाह कम, गुज़ारा मुश्किल, लेकिन अगर ऐसी शोख़ और चुलबुली बीवी हो जो सारे दुख-दर्द चुटकियों में उड़ा दे, तो फिर कौन जन्नत की आरज़ू में मरे।

    मर्द, औरत के ज़ुल्म सहने के लिए ही पैदा हुआ है। उसके बिना तो वह जन्नत में भी रहने को तैयार हो सका। हज़रत आदम ने बैठे-बिठाए पसली चीर कर इस आफ़त को निकाल डाला और अपने सिर पर सवार कर लिया। चाहे बीवी हो या रंडी, जो लगाम पकड़े, हाँके चले जाएँगे। जितने कोड़े ज़्यादा पड़ेंगे, चाल में मस्ती और रवानी बढ़ती जाएगी। मगर हर बात की हद होती है। दिल के साथ-साथ वह कथनी और करनी की भी चौकीदार बन बैठी और दिमाग़ की पहरेदारी शुरू कर दी। साँप के मुँह की छछूँदर बन गई। जो निगली जाए, थूकी जाए। छतरी, टोपी और बरसाती कोट की तरह साथ टँग कर रह गई। यहाँ तक कि मर्द चीख़ उठा। सबसे पहले पतरस क़बूले और उनके बाद अज़ीम बेग और शौक़त थानवी भी चीख़-चीख़ कर दुहाई देने लगे। उधर चाचा छक्कन, मुंशी जी, मिर्ज़ा जी और हज़ारों 'जी' भी पुकार उठे,

    यह ज़्यादती है बेगम! हमें हँसाओ मगर इतना नहीं कि पेट में दर्द उठने लगे।

    उधर हीरोइन ढीली डोरी खींचती गई। उसने यह राज़ भी मालूम कर लिया कि अगर वह ज़रा दबी हुई है, तो सिवाय इसके और कोई बात नहीं कि मियाँ पैसों पर अकड़ते हैं। क्यों यह चार पैसों की कमाई तोड़ कर अलग कर दी जाए। लिहाज़ा मोहल्ले-टोले की सिलाई से शुरू करके वह आर्थिक बाज़ार के हर कोने में रेंगने लगी। इस नए रूप ने उसमें चार चाँद लगा दिए। वैसे अगर औरत भेस बदल कर आए तो ख़ुद उसका मियाँ उस पर आशिक़ हो जाता है। जब कमाने निकली तो यूँ मालूम हुआ जैसे कोई शानदार सर्कस शहर में गया है। औरत स्कूलों में पढ़ा रही है। मुल्ला जी हक्के-बक्के मुँह फाड़े रह गए। औरत डॉक्टर बन गई। हकीम जी मारे हैरत के पलकें झपकाने लगे। अदालत में विरोधी वकील को बौखलाहट के मारे खाँसी का दौरा पड़ गया। हटो! बचो! औरत रही है। लोग घबरा कर उलट गए और वह धड़ाधड़ मैदान मारने लगी। अर्थशास्त्र के मैदान के साथ-साथ भला वह दिल की दुनिया को क्यों तबाह करती। लिहाज़ा हर तरफ़ तबाही मचा दी।

    तो... यह कमाऊ हीरोइन शारीरिक और दिमाग़ी तौर पर चुस्त-दुरुस्त, बिल्कुल लुटेरों की तरह चारों तरफ़ हाथ मारने लगी। अब तो मज़ाक़ की हद हो गई। ख़ैर, कुनैन खिलाती थी, थप्पड़ लगाती थी तो कोई हर्ज़ था। यह तो एक औरत के नखरे हुए। चौकीदारी करती थी। ज़रा सी बात पर टसुए बहाने लगती थी। साया बनकर वक़्त-बेवक़्त सवार रहती थी तो क्या था? थी तो अपनी मोहताज! अपनी बिल्ली भी कभी पंजा मार बैठती है। मगर ख़ुर-ख़ुर करके फिर अपना नर्म-गर्म जिस्म पैरों से रगड़ कर मना भी तो लेती है। फ़ैशन भी करती है। ख़र्च है तो क्या। है तो अपनी। हमीं से तो माँग कर इतराती है। हमारी जेबों से तो इठला-इठला कर पैसा निकालती है, लेकिन यह बिल्कुल मर्दाना अंदाज़ में आर्थिक दुनिया में खम ठोंक कर जो ख़ुद अपनी कमाई कह कर खसोट ले जाती है, यह तो सरासर डाका है। साफ़ धोखा! नतीजा यह कि बड़ी जल्दी यह हीरोइन डायन बन गई। बहुत समझाया, साफ़-साफ़ दिखा दिया कि ऐसी ज़िद्दी और आज़ाद औरतों का बड़ा बुरा अंजाम होता है। हराम के बच्चे पैदा हो जाते हैं। इज़्ज़तें ख़ाक में मिल जाती हैं। सारी दुनिया जनम पर थूकती है। दफ़्तर में क्लर्क बहका ले जाते हैं। अस्पतालों में डॉक्टर रोग लगा देते हैं। स्कूलों में मास्टर आशिक़ हो जाते हैं। उधर माँ-बाप को हिदायत की रौशनी दिखाई गई, स्कूल में हर लड़की को कम-से-कम एक बार ज़रूर नाजायज़ बच्चे की माँ बनना पड़ता है। पढ़ना-लिखना कुछ नहीं, सिर्फ़ इश्क़बाज़ी सिखाई जाती है।

    शर्म दिलाई, बेटियों और बीवियों की कमाई खाते हो। डूब नहीं मरते। ये मास्टर देखने में खटाई जैसे सूखे-सड़े, मगर हर एक अपने वक़्त का मजनूँ और फ़रहाद है। उस वक़्त की जो कहानी उठा कर देखिए, बस उस्ताद और छात्रा के दर्द भरे इश्क़ और भयानक अंजाम से भरी नज़र आएगी।

    यक़ीनन यह साहित्य भी अपना असर दिखाता और हीरोइन वापस पस्ती के चरणों में सिर झुकाए धकेल दी जाती। बात यह हुई कि बाज़ार में जाने क्यों लड़कों से ज़्यादा लड़कियों की माँग हो गई। अगर एक ग्रेजुएट बीस रुपया कमाता तो लड़की एक सौ बीस मार लेती। ज्यों-ज्यों स्त्री-शिक्षा कारगर होती गई, पुरुषों की शिक्षा फ़िज़ूल और बेकार बनती गई। हीरोइन ने पैर मज़बूत जमा दिए। लेकिन साथ ही साथ एक अजीब-ओ-ग़रीब कशमकश शुरू हो गई। पढ़ी-लिखी लड़कियों की माँग बढ़ी मगर उस तेज़ी से नहीं जिस तेज़ी से तादाद बढ़ी। एक वक़्त था जब मैट्रिक पास लड़की नायाब समझी जाती थी, अब गली-गली ग्रेजुएट उग आईं। शादी के बाज़ार में बड़ी अफ़रा-तफ़री मच गई। एक पढ़ी-लिखी लड़की के लिए कम से कम आई.सी.एस. या पी.सी.एस. तो हो। काश गवर्नमेंट लड़कियों की तादाद देखकर अफ़सरों की नियुक्ति करती, तो यह मुसीबत क्यों टूटती। ये गिने-चुने अफ़सर तो ऊँट की दाढ़ में ज़ीरा बनकर रह गए। जिसने ऊँची बोली लगाई वही ले उड़ा। नतीजा यह हुआ कि ग्रेजुएट और पढ़ी-लिखी (लड़कियों की बड़ी तादाद इस इंतज़ार में कि कब गवर्नमेंट ऑफ़िसर बरसें और वे समेट लें, अलग-अलग विभागों में नौकर हो गईं।) इससे यह समझना चाहिए कि अफ़सरों की तादाद कम रही तो क्लर्क, बदक़िस्मत स्कूल मास्टर, नाकाम और उजड़े हुए डॉक्टर नहीं पैदा हुए, वे तो और भी ज़ोरों से पैदा हुए। अब इन बेचारों के पास दो रास्ते रह गए, या तो जाहिल लड़कियों से नसीबा फोड़ लें या अमीर और पढ़ी-लिखी लड़कियों से ख़याली इश्क़ करके ज़िंदगी उनकी याद में गुज़ार दें। जिन्होंने दिल पर पत्थर रखकर सिर फोड़ लिया, उनकी रूहें भी जीवन साथी की तलाश में भटकती रहीं। ज़िंदगी भर हम-ख़याल और हम-मिज़ाज बीवी का अरमान दिल में कचोके मारता रहा और जो ज़्यादा हिम्मत वाले थे वे आस-पड़ोस की कभी-कभी नज़र जाने वाली अप-टू-डेट हसीना की आग में सुलगने लगे। आख़िर वाले तादाद में ज़्यादा बढ़े और नतीजा यह हुआ कि औरतें और मर्द पैदा होते गए और दुनिया में रहते रहे। एक-दूसरे के लिए नहीं बल्कि मुनासिब रिश्ते के लिए! बिल्कुल जैसे एक दुकान में कपड़े के गट्ठर पड़े गल-सड़ रहे हों। और दूसरी तरफ़ लोग सड़कों पर नंगे घूम रहे हों। एक होटल में बासी मिठाइयों और खानों के अंबार नालियों में उँडेले जा रहे हैं और दूसरी तरफ़ लोग भूख से मर रहे हैं, ज्यों-ज्यों दुकानें और होटल साज़-ओ-सामान से भर जाते हैं, सड़कों पर नंगे और भूखों की तादाद बढ़ती जाती है। इसी तरह एक पिंजरे में लड़के और दूसरे में लड़कियाँ बंद करके बीच में चाल-चलन के पहरेदार बिठा दिए गए। लड़कियाँ कुँवारी बैठी सूख गईं, उधर लड़के हैवान बनते चले गए।

    नतीजा यह कि इंसानियत ज़्यादा भूखी, अपाहिज और अमानवीय बनती गई और फिर एक ऐसा तबक़ा पैदा हुआ जो बरसों की छुपी-ढकी गंदगियों के मवाद की तरह फूट पड़ा। उसने जो पहला काम किया वह तोड़-फोड़ था। बूढ़े घने हुए पेड़ का तना उखाड़े बग़ैर नया पौधा लगाना दुश्वार है, पुराने मकान को ढहा कर ही नई कोठियाँ बनाई जा सकती हैं, सबसे पहले तो औरत और मर्द के बीच में जो पहरेदार बैठा था उससे मुठभेड़ हुई। चूँकि बग़ैर औरत के दुनिया अधूरी थी, घर में अपनी कमाई से औरत रखने की ही आर्थिक हालत ने इजाज़त दी और पहरेदारों ने। लाचार होकर वह वापस तवायफ़ की आगोश में जा गिरा। गृहस्थ हीरोइन के राज में तवायफ़ मिट-मिटा कर ख़ाक हो चुकी थी। बेक़द्री और फटकार ने उसे सूरत से बे-सूरत कर दिया था। कुछ दिवालिया होकर निकाह कर बैठी थीं। कुछ लंबी-चौड़ी दुकानें लुटवा कर गंदी नालियों के पास खोंचा लगा चुकी थीं। कुछ ने रूप बदल डाला था। और जैसे तवायफ़ हीरोइन से मर्द को छीनने के लिए गृहस्थन ने घूँघट उठाया था, आज उसने उसी फेंके हुए आँचल में मुँह छिपाने की कोशिश की थी। कभी गृहस्थन ने उसके हथकंडे और बनाव-सिंगार छीने थे, आज उसने गृहस्थन की बेचारगी और बेबसी की आड़ ली और सिवाय बिल्कुल निचले तबक़े के, तवायफ़ को पहचानना भी दुश्वार हो गया था और जब यह बाग़ी तबक़ा तवायफ़ की तलाश में निकला तो उसकी बुरी हालत देखकर उसका जी दहल गया। तवायफ़ अब वह सरशार की चहकती हुई बुलबुल नहीं रही थी। बल्कि भूखी कमीनी बिल्ली बन गई थी, सिवाय फ़क़ीरों और इक्का-ताँगा वालों और मज़दूरों के किसी को उसका नाम-ओ-निशान भी मालूम रहा था। अपना मतलब था तो उसी तवायफ़ को शेरों में पिरो डाला, क़सीदों में गूँध कर, नॉवेलों में सजा कर, साहित्य को उसकी लौंडी बना दिया और फिर जो भूले तो ऐसा भूले कि लौट कर ख़बर भी ली। घर में नल लग गया तो मीठे पानी के कुओं को ऐसा भुला दिया कि वे अंधे होकर साँपों और कनखजूरों का ठिकाना बन गए और अब वक़्त पड़ा तो उसी के किनारे प्यासी ज़बानें लटकाए हाँप रहे हैं। यही नहीं बल्कि म्युनिसिपैलिटी से कहकर सफ़ाई कराने पर तुले हुए हैं, मगर यह अंधा कुआँ दोबारा काम के लायक़ होने से पहले बड़ी सख़्त मदद का तलबगार था, चुनाँचे बाग़ी तबक़ा उसकी हिमायत में चीख़ पड़ा। पुकार-पुकार कर उसने दुनिया के उस ज़ख़्म को दिखाया जो नासूर बनकर बजबजा उठा था। ग़रीब मगर ख़ुद्दार नौजवान उस तबक़े की हिफ़ाज़त को उठ खड़ा हुआ जो उसकी थी। उसके काम सकती थी। उसे सारा हुस्न और तमाम नज़ाकतें उस टकियाई और फ़क़ीरनी में नज़र आईं जिसमें दुनिया भर की गंदगियाँ जज़्ब हो चुकी थीं। मगर जो उसे मिल सकती थी, बेक़द्री की वजह से वह गिर गई थी। और उसी के करम की मोहताज थी, शरीफ़ औरत उस नौजवान की ज़िंदगी से दूर-तर होती गई। वह उसके बारे में कुछ जान सका और उसने जानने की कोशिश की। उसकी नज़रों में वह सिर्फ़ नकचढ़ी, ख़ुदग़रज़ और झूठी मख़लूक़ बनकर रह गई जो प्यार भरी नज़रों को गाली और इश्क़ को घिनौना समझती है। जो मुहब्बत करना बेइज़्ज़ती समझती है। और मर्द की हिफ़ाज़त को अपनी तौहीन। उसमें आम तवायफ़ जैसी गंदी भयानक कशिश कहाँ? आम तवायफ़ से वह तवायफ़ मुराद नहीं जो बड़े आदमियों की दुनिया में चमका करती है बल्कि सड़क की वह नंगी भूखी कुतिया जो राह चलते की टाँग पकड़ कर घसीटती है, जो हर क़ीमत पर हर हैसियत के इंसान को लंगर बाँटती है, उसकी गंदगी और ग़लाज़त घिन खाने की चीज़ नहीं बल्कि सुधार की मोहताज है। अगर हमारे मकान में नाली सड़ रही है तो यह उस बेचारी नाली का क़ुसूर नहीं बल्कि मकान-मालिक का क़ुसूर है, उसे गंदा कहकर मुँह मोड़ लेने से गंदगी दूर नहीं हो जाएगी। तवायफ़ गंदी और बीमार, कमीनी और जालसाज़ है तो उसका क़ुसूर नहीं बल्कि उस निज़ाम का क़ुसूर है जो इंसानियत की यूँ बेक़द्री करता है। नए अदीबों ने तवायफ़ों का हाल लिखकर बेशक एक बदबूदार फोड़े का मुँह खोल दिया जिसने नाज़ुक-मिज़ाज लोगों की कोमल तबीयत पर बुरा असर डाला, मगर इस फोड़े का मवाद निकल जाने से दुनिया के थोड़े-बहुत दुख मिट जाने की संभावना पैदा हो गई। तवायफ़ कैसी भी ज़लील हो, हमारी दुनिया के जिस्म का एक हिस्सा है, उसे सड़ा कर नहीं फेंका जा सकता। लोग उसे औरत नहीं मानते, वह जो दुनिया के हर दुखियारे का सहारा, हर भूखे का दस्तरख़्वान है, वह बेशक औरत नहीं मगर उससे भी ज़्यादा काम की हस्ती है।

    यही वजह है कि आजकल का नौजवान गृहस्थन से ज़्यादा बाज़ारी माल की भलाई चाहने वाला है। वह उसकी ज़िंदगी से दूर और यह क़रीब है, उसे क्या मतलब कि औरतों की शिक्षा नहीं हो रही या विधवाएँ और बिन ब्याही लड़कियाँ सूख रही हैं या मियाँ-बीवी की नाकें काटे डाल रहे हैं। उसकी बला से दुनिया भर विधवा हो जाए और औरत मिटे या रहे। देखिए ना, आपके मोहल्ले की नाली ख़राब हो जाती है तो आप शोर मचा देते हैं। और आप परवाह भी नहीं करते कि इस साल लड़ाई की वजह से विक्टोरिया गार्डन में उम्दा बीज बोए जा सके। इसलिए इस साल फूलों की क्यारी की बहार से लोग महरूम रह जाएँगे। आपकी बला से फूल खिलें या खिलें मगर नाली ज़रूर साफ़ होनी चाहिए।

    अब चाहे दुनिया मौजूदा साहित्य की हीरोइन को नापाक, अश्लील और घिनौनी कहे, ज़माने ने उसे हीरोइन का रुतबा दे दिया। यह ज़माने के उतार-चढ़ाव की ढाली हुई ईंट है जो निर्माण में अपनी जगह पा गई। यह तो हुई हीरोइन सरशार की नाज़-ओ-अदा भरी नाज़नीन, जिसे दुनिया में सिवाय खाने-पीने और ऐश करने के किसी बात की फ़िक्र नहीं... मैंने ग़लत कहा, एक बात की बेइंतहा फ़िक्र है और वह इश्क़ लड़ाने की। यह ज़माना है फ़ुर्सत और ख़ुशहाली का। फिर इसके मुक़ाबले में प्रेमचंद की सताई हुई औरत, और राशिद अल-ख़ैरी की कुचली हुई विधवा, यह ज़माना है आर्थिक कशमकश का और सुधार का, फिर लीजिए हास्य लेखकों को... ये हँस गए और हँसा गए। चमड़ी में मगन, आगे जाना पीछे हटना। फिर एम. असलम की साधु की लड़की जिसे सिवाय नदी के किनारे आने-जाने वालों से प्रेम की पतंगें बढ़ाने और भंवरों के साथ गीत गाने के और कोई काम नहीं। मिस हिजाब की बेवक़ूफ़, आलसी और निकम्मी कुँवारी लड़की जिसे सिवाय चूहों से डर कर बेहोश हो जाने के और कुछ नहीं आता। जहाँ हुस्न और इश्क़ को बनावट ने उल्लू बना रखा है। यह ज़माना है तंग आकर ऊँघने का। और फिर कृश्न की ज़िंदा औरत, बेदी की कारोबारी हीरोइन, मंटो की जीती-जागती सबकी जानी-पहचानी बेहया रंडी, इस्मत की बेचैन मुँहफट और बेशरम लड़की, सत्यार्थी की ख़ानाबदोश, अस्करी की फ़िलॉसफ़र मेम साहब... यह ज़माना है ज़िंदा रहने के लिए लड़ मरने का, कुछ निर्माण करने के लिए जद्दोजहद का, कुछ मिटाने के लिए और कुछ बनाने के लिए। दीन और दुनिया को पलट कर रख देने का। जैसा कि मौजूदा माहौल से ज़ाहिर हो रहा है।

    अब देखना है कि हमारी आने वाली ज़िंदगी की हीरोइन किस शान से सामने आती है। ख़ुदा के बाद औरत की ही पूजा साहित्य में की गई है। या शायद उसका नंबर पहले आता है और फिर दुनिया की दूसरी ताक़तों का। जहाँ तक अंदाज़ा लगाया जाता है, आने वाली हीरोइन तो ज़ालिम होगी मज़लूम, बल्कि सिर्फ़ एक औरत होगी। और शैतान और देवता के बजाय लेखक उसे औरत का रुतबा ही देंगे। और फिर निर्माण शुरू होगा।

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