इम्ला और रस्म-ए-ख़त
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मोहतरम सद्र (आदरणीय अध्यक्ष), मुख्य अतिथि, डायरेक्टर उर्दू शिक्षण और शोध केंद्र, देवियो और सज्जनो!
मैं डायरेक्टर उर्दू शिक्षण और शोध केंद्र, लखनऊ का आभारी हूँ कि उन्होंने इस अहम सेमिनार के उद्घाटन के लिए मुझे याद किया। जब से यह केंद्र क़ायम हुआ है, इसने ज़बान के व्याकरण और भाषा शिक्षण की तरफ़ ख़ास तवज्जो दी है। रस्म-ए-ख़त (लिपि) पर इसका यह सेमिनार एक और अहम क़दम है। रस्म-ए-ख़त के मसले पर यूँ तो अरसे से लिखा जा रहा है मगर मुझे ऐसा महसूस होता है कि शिक्षण और शैक्षिक ज़रूरतों पर वह तवज्जो नहीं दी गई जिसकी ज़रूरत है। साथ ही उन उस्तादों के तजुर्बे से पूरा फ़ायदा नहीं उठाया गया जो बच्चों या अनपढ़ बालिग़ों या देश की दूसरी ज़बानें जानने वालों या विदेशी छात्रों को उर्दू सिखाते हैं।
मैं भाषा विज्ञान (लिसानियात) या ध्वनि विज्ञान (सौतियात) का माहिर नहीं, साहित्य का विद्यार्थी हूँ। लेकिन मेरी यह कोशिश ज़रूर रही है कि भाषा विज्ञान और ध्वनि विज्ञान की दी गई जानकारियों से अनजान न रहूँ। और शैक्षिक दृष्टिकोण ख़ास तौर से मेरे सामने रहा है। मुझे यह भी स्वीकार है कि शुरुआती स्तर पर उर्दू की तालीम का मेरा तजुर्बा नाम मात्र का है। माध्यमिक शिक्षा के स्तर से मेरा कुछ ताल्लुक़ रहा है मगर ज़्यादातर बी.ए. और एम.ए. की तालीम और रिसर्च की निगरानी में उम्र गुज़री है। अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में बी.ए., बी.एस-सी., बी.कॉम. के स्तर पर उर्दू ज़रूरी विषय की हैसियत से पढ़ाई जाती है और यह ज़रूरी विषय बिल्कुल प्रारंभिक, प्रारंभिक और उच्च उर्दू के नाम से पढ़ाया जाता है, इसकी निगरानी ख़ासी मुद्दत तक मैंने की है और इसके लिए किताबें तैयार कराई हैं। इसके लिए हारून ख़ाँ शेरवानी, मसूद हसन रिज़वी, डॉक्टर अब्दुल सत्तार सिद्दीक़ी, सज्जाद मिर्ज़ा, 'इमला नामा' (संपादक गोपीचंद नारंग) और 'उर्दू इमला' (रशीद हसन ख़ाँ) भी मेरी नज़र से गुज़री हैं।
1957 ई. में अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू हिंद के जनरल सेक्रेटरी की हैसियत से मैंने उर्दू रस्म-ए-ख़त के सिलसिले में एक प्रश्नावली (सवाल-नामा) जारी की थी और जो जवाब मिले थे, उन पर ग़ौर करने के लिए एक कमेटी बनाई थी मगर उस कमेटी की सिफ़ारिशों पर अंजुमन की 1958 की कॉन्फ़्रेंस में ख़ासी नाराज़गी ज़ाहिर की गई और यह मामला जहाँ का तहाँ रह गया। ये मसले कॉन्फ़्रेंसों से तय नहीं होते। विशेषज्ञ मिल-बैठकर विचार-विमर्श करें और शैक्षिक दृष्टिकोण से हर पहलू को जाँचें और उसके बाद ठोस सुझाव उर्दू दोस्तों के सामने आएँ तो इस बात की गुंजाइश है कि इस अहम मामले में कोई सार्थक प्रगति हो सके। यह भी देखना चाहिए कि हालात और वक़्त ने कुछ सुधार कर भी दिए हैं और एक ख़ासा बड़ा वर्ग उन पर अमल भी करता है।
डॉक्टर अब्दुल सत्तार सिद्दीक़ी की राय की रोशनी में अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू हिंद ने नागपुर के अधिवेशन में कुछ प्रस्ताव मंज़ूर भी किए थे और अंजुमन के प्रकाशनों में 1947 तक उन पर बड़ी हद तक अमल भी हुआ था मगर आज़ादी और मुल्क के बँटवारे के बाद सुधार का जज़्बा धीमा पड़ गया। क्योंकि उर्दू के अस्तित्व (बक़ा) का मसला सामने आ गया था। इसलिए मनोवैज्ञानिक तौर पर लोग किसी क़िस्म के बदलाव के लिए तैयार न थे। पिछले साल बंबई यूनिवर्सिटी ने इस विषय पर एक सेमिनार किया था जिसमें कुछ महत्वपूर्ण शोध-पत्र पढ़े गए थे। मैं उस सेमिनार में शरीक न हो सका मगर मालूम हुआ कि सुधार के प्रस्तावों का विरोध ख़ासा कड़ा था, इसलिए मैं इस केंद्र की तरफ़ से रस्म-ए-ख़त पर सेमिनार का स्वागत करता हूँ।
मैं शुरू में ही कह दूँ कि मैं उर्दू रस्म-ए-ख़त को छोड़कर देवनागरी या रोमन रस्म-ए-ख़त अपनाने के हक़ में नहीं हूँ। सांस्कृतिक, साहित्यिक और सौंदर्यशास्त्रीय दृष्टिकोण से यह रस्म-ए-ख़त अब हमारी ज़बान के इतिहास, इसके साहित्य, इसकी व्यापकता, इसके सौंदर्य से जुड़ा है। यह हमारी ज़बान की पहचान (Identity) और इसकी विशिष्टता का प्रतीक है। हमारे संविधान में जहाँ भाषाई अल्पसंख्यकों को अस्तित्व और तरक़्क़ी की गारंटी दी गई है, वहाँ इसके रस्म-ए-ख़त की हिफ़ाज़त की भी। अब इसका समर्थन हमारा भाषाई कर्तव्य ही नहीं, लोकतांत्रिक कर्तव्य भी है। मगर रस्म-ए-ख़त को बाक़ी रखने और इसमें आधुनिक युग की ज़रूरतों के मुताबिक़ सुधार करने, शैक्षिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए एकरूपता, सुविधा, इंजिज़ाब (Assimilation) की ख़ातिर कुछ सुधार प्रस्तावित करने में जो बुद्धिमानी है, उसको किसी तरह नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। इस बिंदु को ज़ेहन में रखना ज़रूरी है। आइए अब चंद स्पष्ट और बुनियादी बातों का ज़िक्र हो जाए।
उर्दू एक आधुनिक हिंद-आर्य भाषा है जिसकी बुनियाद खड़ी बोली पर है। इसमें अरबी, फ़ारसी, तुर्की के शब्द एक चौथाई से ज़्यादा नहीं हैं और तीन चौथाई या तो देसी शब्द हैं या देसी शब्दों से मिलकर वजूद में आए हैं। इधर अंग्रेज़ी और हिंदी के शब्द भी ख़ासी तादाद में ज़बान में दाख़िल हो गए हैं और यह स्वाभाविक था। अरबी, फ़ारसी या किसी और ज़बान के जो शब्द उर्दू में प्रचलित हो गए हैं, वे अब उर्दू के शब्द हैं। इंशा की 'दरिया-ए-लताफ़त' में इस हक़ीक़त का ऐलान उन्नीसवीं सदी के शुरू में कर दिया गया था, मगर एक वर्ग में इसके निहितार्थों पर वह तवज्जो नहीं दी गई जो दी जानी चाहिए थी।
मैं कहना यह चाहता हूँ कि उर्दू, उर्दू-ए-मुअल्ला और उर्दू-ए-मुसफ़्फ़ा में फ़र्क़ करना चाहिए। यानी जब हम उर्दू में अजम (फ़ारस) के हुस्न-ए-तबीयत और अरब के सोज़-ए-दरूँ (आंतरिक पीड़ा) पर ज़ोर देते हैं, तो इसके साथ बल्कि इससे पहले हमें उर्दू की हिंदुस्तानी बुनियाद पर ज़ोर देना चाहिए और ज़बान के व्याकरण और क्रियाओं, हुरूफ़-ए-जार (संबंधबोधक) और सर्वनामों की प्रकृति को भूलना नहीं चाहिए। मेरे नज़दीक ख़ुसरो से लेकर आज तक की सारी भाषाई पूँजी हमारी है। मतरूकात (त्यागे गए शब्दों) और भाषा सुधार के पीछे जो दृष्टिकोण था, वह ज़बान की जीनियस का कम और अभिजात्यवाद (ख़वास-परस्ती) का ज़्यादा आईना-दार था।
उर्दू ज़बान अपने विकास के दौरान विभिन्न चरणों से गुज़री है। बाज़ार का चलन, सूफ़ियों का प्रेम संदेश और दरबार की रंगीनी और मस्ती, सबने मिलकर इसका रंग बनाया है। वजही की 'सब रस', क़ुली क़ुतुब शाह की शायरी, वली का तग़ज़्ज़ुल, मीर और सौदा की ताज़ा-कारी और लाला-कारी, नज़ीर का अपनी तहज़ीब से इश्क़, ग़ालिब का गंजीना-ए-मानी (अर्थों के ख़ज़ाने) का तिलिस्म, हाली की सादगी, जोश और असलियत, सर सैयद का सोज़, अबुल कलाम आज़ाद का 'ग़ुबार-ए-ख़ातिर', इक़बाल का सहीफ़ा-ए-कायनात (ब्रह्मांड का ग्रंथ), प्रेमचंद की आदर्शी हक़ीक़त-निगारी (आदर्शवादी यथार्थवाद), शौक़ क़िदवई का आलम-ए-ख़याल (कल्पना लोक) और आरज़ू लखनवी की सुरीली बाँसुरी, सब मिलकर उर्दू का इंद्रधनुष (क़ौस-ए-क़ुज़ह) बनाते हैं।
ग़ालिब की ग़ज़ल के ये अशआर,
नक़्श फ़रियादी है किसकी शोख़ी-ए-तहरीर का
काग़ज़ी है पैरहन हर पैकर-ए-तस्वीर का
काव-काव-ए-सख़्त-जानी हा-ए-तन्हाई न पूछ
सुब्ह करना शाम का लाना है जू-ए-शीर का
और आरज़ू लखनवी के ये अशआर,
रन में घोड़ा जो उड़ाते हुए आए अब्बास
चौकियाँ घाट पे बैठी थीं रुका था पानी
वो लचकती हुई डाँडें वो चमकते हुए फल
धूप में और भी खौला हुआ उनका पानी
दोनों मानक उर्दू के विस्तार को ज़ाहिर करते हैं मगर इसके साथ यह बात भी याद रखनी चाहिए कि ज़बान जितनी तरक़्क़ी करती जाती है, कुल मिलाकर वह सादा और प्रभावशाली होती जाती है। गद्य में तो स्पष्ट रूप से विकास रंगीनी से सादगी की तरफ़ होता है मगर शायरी नयापन लाने के लिए, अरस्तू के अनुसार, रूपकात्मक (इस्तिआराती) होते हुए भी ज़्यादातर आम ज़बान पर आधारित होती है। इंग्लैंड में सत्रहवीं सदी तक गद्य की ज़बान ख़ासी सजावटी थी। अठारहवीं सदी में बात को सादे तौर से कहने का सलीक़ा आया। आज अंग्रेज़ी गद्य का मानक इलियट, बर्ट्रेंड रसेल, बर्नार्ड शॉ, चर्चिल का गद्य है। अमेरिका के प्रोफ़ेसरों का गद्य नहीं। इस तरह आधुनिक उर्दू गद्य में 'फ़साना-ए-अजायब' के गद्य से बेहतर सर सैयद का गद्य, अबुल कलाम आज़ाद के गद्य से बेहतर अब्दुल हक़ का गद्य और नियाज़ फ़तेहपुरी के गद्य से बेहतर आबिद हुसैन का गद्य है।
आधुनिक उर्दू गद्य पर स्वाभाविक रूप से हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों का असर होगा मगर वह अरबी और फ़ारसी के उन शब्दों से शर्माएगी नहीं जो इसके भाषाई खज़ाने का क़ीमती हिस्सा हैं। उन्हें ज़रूरत के अनुसार इस्तेमाल करेगी। अपनी विद्वत्ता का रोब जमाने या डेढ़ ईंट की अलग मस्जिद बनाने के लिए नहीं।
उर्दू ज़बान एक आज़ाद और स्वतंत्र ज़बान है। यह खड़ी बोली से निकली है और इसका शुरुआती रूप हिंदी, हिंदवी में देखा जा सकता है। हिंदी, हिंदवी की निरंतरता दरअसल उर्दू में नज़र आती है। आधुनिक हिंदी तो दरअसल उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से शुरू हुई।
अगर उर्दू वाले कबीर, मीर, सूर, तुलसी और नानक के खज़ाने को पुरानी उर्दू का एक रूप समझ कर बरतते जिस तरह दकनी को वे पुरानी उर्दू कह कर बरतते हैं, तो अमृत राय जैसे नासमझों को यह कहने की हिम्मत न होती कि उर्दू को जानबूझकर अलगाववाद की भावना के तहत हिंदी, हिंदवी के राजमार्ग से हटा कर अरबी-फ़ारसी के पहाड़ी इलाके की तरफ़ मोड़ दिया गया है। वह सारा शब्द भंडार चाहे वह संस्कृत के तद्भव शब्दों से आया हो या अरबी-फ़ारसी के उन शब्दों से जिन्हें भारतीयकृत कर लिया गया है, अब उर्दू की संपत्ति है। जिस तरह आधुनिक हिंदी में तत्सम शब्द बहुतायत से लाने की प्रवृत्ति उल्टी गंगा बहाने के समान है, उसी तरह उर्दू में अरबी-फ़ारसी के उन शब्दों को इस तरह लिखना और बोलना जिस तरह वे अरबी या फ़ारसी में बोले और लिखे जाते हैं, काबा को तुर्किस्तान होकर जाने के समान है। एक दफ़ा इसी लखनऊ में मैंने महाराजा महमूद आबाद (मरहूम) के सामने ग़ालिब का यह शेर पढ़ा,
इज्ज़-ओ-नियाज़ से तो न आया वह राह पर
दामन को आज उसके हरीफ़ाना खींचिए
तो महाराजा साहब ने फ़रमाया, हज़रत 'इज्ज़' नहीं 'अज्ज़' पढ़िए। मैंने अर्ज़ किया, मैं उर्दू का शेर पढ़ रहा हूँ। इसी तरह जो लोग मुमलिकत को ममलकत, सिम्त को सम्त, फ़िज़ा को फ़ज़ा लिखने लगे हैं या जो मशकूर को मुतशक्किर या कलमे को कलमा लिखने पर फ़ख़्र करते हैं, वे ज़बान की प्रकृति (जीनियस) के साथ ज़्यादती करते हैं। और उर्दू ज़बान की आज़ादी और स्वतंत्रता को आहत करते हैं। पारिभाषिक शब्दावली बनाने (वज़ा-ए-इस्तिलाहात) में वहीदुद्दीन सलीम ने दर्जनों ऐसी मिसालें दी हैं जिनमें हिंदी और फ़ारसी शब्दों का मिश्रण मिलता है। जिस तरह 'फ़ौक़-उल-भड़क' सही है उसी तरह 'लब-ए-सड़क' भी सही है। उर्दू के क़ायदे से बहुवचन बनाना किसी तरह फ़ारसी-अरबी के क़ायदे के मुताबिक़ बहुवचन बनाने से कमतर नहीं है। हम दोनों का इस्तेमाल ज़रूरत के अनुसार कर सकते हैं।
इसके साथ यह बात भी खंडन करने योग्य है कि हालाँकि हमारी लिपि (रस्म-ए-ख़त) अरबी और फ़ारसी से ली गई है, मगर इसमें जिन हिंदी आवाज़ों की वृद्धि हुई है और जिस तरह इसमें शुरुआत से ही ज़बान का खज़ाना मिलता है, उसके कारण अब यह उर्दू लिपि है। कई सदियों के चलन और द्राविड़ी, आर्य और सामी (सेमिटिक) भाषाओं की ज़्यादातर आवाज़ों की वजह से यह अब अरबी या फ़ारसी लिपि से विशिष्ट हो गई है। इसके दो रूप हैं—नस्ख़ और नस्तालीक़। यह तथ्य है कि छपाई में नस्ख़ का इस्तेमाल बहुत पहले हुआ। फ़ोर्ट विलियम कॉलेज के प्रकाशनों, सर सैयद की साइंटिफ़िक सोसाइटी की किताबों, गज़ट और 'तहज़ीब-उल-अख़लाक़' में नस्ख़ ही बरता गया। उर्दू टाइप नस्ख़ ही में है जिसमें नस्तालीक़ के कुछ हिस्सों को जोड़ लिया गया है।
बीसवीं सदी में नस्ख़ में बहुत सी किताबें छापी गई हैं मगर कुल मिलाकर उर्दू में छपाई ज़्यादातर नस्तालीक़ में हुई है और यही लिपि बच्चों को सिखाई जाती है और ख़ास-ओ-आम, बच्चों और बूढ़ों सब की लिखावट में यही नस्तालीक़ प्रचलित है। इसकी वजह से हमारी छपाई अब तक ख़ासी पिछड़ी हुई थी मगर अब फ़ोटो ऑफ़सेट की वजह से छपाई में शुद्धता, सफ़ाई और फुर्ती आ गई है। हाल ही में नूरी नस्तालीक़ टाइप कंप्यूटर की मदद से तैयार किया गया है और अख़बार 'जंग' पाकिस्तान के कुछ हिस्से इस टाइप में छपते हैं।
हिंदुस्तान में भी एक कंपनी कंप्यूटर की मदद से नस्तालीक़ टाइप तैयार कर चुकी है। इसलिए अब नस्ख़ के बजाय नस्तालीक़ टाइप के इस्तेमाल का औचित्य है। नस्तालीक़ का सौंदर्य सर्वमान्य है। सुलेख (ख़त्ताती) को इसने ललित कला बना दिया। सुलेख की ज़रूरतों की वजह से ही अक्षर की शक्लें शुरू, बीच और आख़िर में अलग-अलग हुईं। कुर्सी (अक्षरों के आधार) का मसला भी था मगर दायरों के सौंदर्य को लकीरों और रेखाओं के सौंदर्य पर प्राथमिकता देने की कोई वजह नहीं। दोनों में सौंदर्य है। सर्व के पेड़ में भी और ताज महल के गुंबद में भी। सौंदर्य तो संतुलन का दूसरा नाम है मगर सौंदर्य को उपयोगिता पर प्राथमिकता देने वाले यह भूल जाते हैं कि किसी के कथनानुसार, उपयोगिता में ही सौंदर्य है।
मैं अक्षरों के मौजूदा रूपगत क्रम (सूरी तरतीब) को बदलने के पक्ष में नहीं हूँ। ध्वन्यात्मक दृष्टिकोण की अहमियत सर्वमान्य है मगर 'इमला-नामा' में सही कहा गया है कि ज़बान का ध्वनिविज्ञान उसके समाजशास्त्र से हट कर कोई मायने नहीं रखता। रूपगत क्रम को ग़ौर से देखा जाए तो 'ब' (ب) की शक्ल से परिचित होने की वजह से 'प' (پ) से 'से' (ث) तक, 'जीम' (ج) की शक्ल से परिचित होने के बाद 'ख़े' (خ) तक और इस तरह एक समूह के एक अक्षर के ज़रिए इस शृंखला के दूसरे अक्षरों या रूपों से परिचित होना आसान है। इस तरह उन अक्षरों की संख्या जिनकी शक्ल से परिचित होना चाहिए, ख़ासी कम हो जाती है। मुश्किल उस वक़्त पेश आती है जब अक्षरों की शक्लें बदल जाती हैं और उर्दू सीखने वाले की मुश्किलें बढ़ जाती हैं।
मुझे व्यक्तिगत रूप से इसका इल्म है कि बहुत से लोगों ने ग़ज़ल की चाशनी या फ़िल्मों के चटख़ारे की वजह से उर्दू सीखना चाही मगर इमला (वर्तनी) की कठिन मंज़िलों (हफ़्त-ख़्वां) से गुज़र न सके। भला बसेरा, बहस, बराती, बुक़रात, नागुफ़्ता-ब, अस्प की इतनी शक्लें क्यों। सज्जाद मिर्ज़ा ने अपने बुनियादी टाइप में इसका हल यह सुझाया था कि हर अक्षर जो दूसरे अक्षर से मिलता है उसकी दो से ज़्यादा शक्लें न हों। एक पूरी। एक आधी। और आधी शक्ल पूरी शक्ल का एक हिस्सा हो, मसलन 'अमीक़' में 'ऐन' (ع) की जो शक्ल है वह 'बाद' में नहीं। बुनियादी टाइप में पूरी 'ऐन' और आधी 'ऐन' की सिफ़ारिश की गई है यानी उसके ऊपर के आधे हिस्से की। इसके मुताबिक़ 'ब' (ب) की भी दो शक्लें होंगी—पूरी 'ब' और 'बदी' वाली 'ब'। अगर अक्षरों की शक्लों में तब्दीली न हो तो उर्दू लिपि का सीखना स्वाभाविक रूप से आसान हो जाएगा। हमें यह नहीं देखना चाहिए कि हम किस तरह इन अक्षरों को अलग-अलग जोड़ों में लिखने के आदी हैं, बल्कि यह देखना चाहिए कि जो हमसे उर्दू सीख रहा है या जो अनपढ़ उर्दू पढ़ना चाहता है या जो कोई देशी भाषा जानने वाला या विदेशी उर्दू सीखना चाहता है, उसे किस तरह आसानी से, जल्द और आधुनिक तरीक़े के मुताबिक़ उर्दू सिखाई जा सकेगी।
कुछ लोगों का कहना है कि सीन (س), से (ث), स्वाद (ص) के बजाय सिर्फ़ सीन (س); ज़े (ز), ज़ाल (ذ), ज़्वाद (ض) के बजाय सिर्फ़ ज़े (ز); ते (ت), तोए (ط) के बजाय सिर्फ़ ते (ت); बड़ी हे (ح), छोटी हे (ہ) के बजाय सिर्फ़ छोटी हे (ہ) काफ़ी है। मगर बाद (بعد) और बाद (باد), मालूफ़ और मालूम, हज़रत और हज़ार दास्तान की आवाज़ों में फ़र्क़ ज़रूर है। जाफ़र हसन अपना नाम जाफ़र (ج ا ف ر) लिखते थे और हसन को छोटी 'हे' (ہ) से। मेरे नज़दीक तो वह ज़ेहन को इधर-उधर भटकने का मौक़ा देते थे। अरबी और फ़ारसी शब्दों का तलफ़्फ़ुज़ (उच्चारण) सदियों तक हिंदुस्तान में बोले जाने के बाद बदला है, यह एक दिन की बात नहीं।
एक अमेरिकन अमीर ऑक्सफ़ोर्ड गया। वहाँ की पुरानी इमारतें उसे बिल्कुल पसंद न आईं मगर वहाँ के सब्ज़ाज़ारों (हरे-भरे लॉन) पर फ़िदा हो गया। पूछा यह लॉन कैसे और कितने में तैयार होगा। माली बुलाया गया। उसने कहा घास लगाने में ख़र्चा तो बहुत कम आएगा मगर पाँच सौ साल तक रोलर चलाना पड़ेगा। पाँच सौ साल बाद जाफ़र (جعفر) जाफ़र (جافر) हो जाए तो मुझे कोई एतराज़ नहीं मगर एकदम से मैं इस तब्दीली (बदलाव) के लिए क़तई तैयार नहीं हूँ। आजकल देहातों की तरफ़ रुझान का बड़ा चर्चा है मगर यह सब नेताओं का ढकोसला है। तहज़ीब देहात से शहर की तरफ़ जा रही है। उर्दू शहरी तहज़ीब की पली-बढ़ी है (इसके यह मायने न समझे जाएँ कि यह धरती का रस और देहात का रस नहीं रखती) इसकी शहरियत और तहज़ीब को बरक़रार रखना ज़रूरी है। यह ख़्वास-परस्ती (अभिजात्यवाद) से बिल्कुल अलग चीज़ है। उर्दू सीखने वालों को सबसे ज़्यादा मुश्किल उन अरबी शब्दों के लिखने में पेश आती है जो उर्दू ज़बान में आ जाने और उर्दू के लफ़्ज़ हो जाने के बावजूद अरबी क़ायदे से लिखे जाते हैं।
मेरे नज़दीक इमला-नामा (वर्तनी के नियम-पत्र) की यह सिफ़ारिश कि ऐसे तमाम लफ़्ज़ जो अलिफ़ मक़सूरा (खड़े अलिफ़) से लिखे जाते हैं, उर्दू में मामूली अलिफ़ से लिखे जाएँ, ज़रूर मान लेनी चाहिए और आला, अदना, तक़वा, फ़तवा, मुसफ़्फ़ा, मुअल्ला, ईसा, मूसा सब अलिफ़ से लिखने चाहिए। जब हम रहमान, इब्राहीम, यासीन, इस्माईल अलिफ़ से लिखते हैं तो मुस्तफ़ा, मुर्तज़ा, मुजतबा अलिफ़ से लिखने में हिचकिचाहट क्यों। अरबी और तुर्की के कुछ लफ़्ज़ों के आख़िर में हालाँकि अलिफ़ है मगर ग़लती से उन्हें 'हे' (ہ) से लिखा जाता है। इमला-नामा में उन्हें भी अलिफ़ से लिखने की सिफ़ारिश की गई है। मसलन शोरबा, क़ोरमा, नाश्ता, मलग़ोबा। लेकिन यह सिफ़ारिश अजीब है कि अलल-ख़ुसूस, अलल-उमूम, अलल-हिसाब को अरबी के हिस्से मान कर अरबी के लिखने के तरीक़े के मुताबिक़ लिखा जाए, हालाँकि इनको अलल ख़ुसूस, अलल हिसाब, अलल उमूम आसानी से लिखा जा सकता है और इन्हें इस तरह लिखने के बावजूद सही तौर से पढ़ने में कोई दुश्वारी नहीं होती।
एक अजीब बात इमला-नामा में यह लिखी गई है कि 'लिहाज़ा' (لہٰذا) के प्रचलित रूप में तब्दीली की ज़रूरत नहीं क्योंकि यह लफ़्ज़ इसी वर्तनी के साथ चलन में आ गया है। इस तर्क के मुताबिक़ तो हमें लिपि में किसी सुधार का ख़याल भी नहीं करना चाहिए। क्योंकि चलन में ऐसी बहुत सी दुश्वारियाँ हैं जिनका पढ़े-लिखे लोगों को एहसास नहीं है क्योंकि वे इस पड़ाव से मुद्दतों पहले गुज़र चुके, मगर जो नौसिखिया है और जो उसे सिखाने वाला है, उसे तो इसका पूरा एहसास है। अगर ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को उर्दू सिखाना है और इस काम को ज़्यादा से ज़्यादा आसान और स्वीकार्य बनाना है तो चंद सुधार लाज़िमी हैं।
उर्दू को सिर्फ़ ग़ैरों की तरफ़ से नहीं, अपनों की तरफ़ से भी ख़तरा है। जो लोग एक हिंद-आर्याई ज़बान को अरबी या फ़ारसी का हिस्सा समझते हैं या जो किसी ख़ौफ़ या हीन भावना की वजह से नए नियमों से डरते और पुराने तौर-तरीक़ों पर अड़ते हैं, या वे उर्दू के बढ़ने, फैलने और मक़बूल होने से रोकते हैं, वे उर्दू के शुभचिंतक नहीं। ज़बान की कोई शरीयत (कठोर नियम) नहीं होती। यह बराबर बदलती है। देखना यह है कि बदलाव के बावजूद इसमें निरंतरता भी रहे।
'बिल्कुल' को 'बिल कुल' और 'बल्कि' को 'बल कि' तो कुछ लोग लिखने लगे हैं मगर 'फ़िलहाल' और 'फ़िलफ़ौर' इस तरह यानी 'फ़िल हाल' और 'फ़िल फ़ौर' लिखने से परहेज़ क्यों। इमला-नामा में कहा गया है कि 'फ़ौरन' (فوراً) को 'फ़ौरन' (فورن - नून के साथ) लिखने की सिफ़ारिश नहीं की जा सकती क्योंकि तनवीन (दो ज़बर) उर्दू वर्तनी का हिस्सा बन चुकी है। मेरे नज़दीक तनवीन को बिल्कुल उड़ा देना चाहिए। हम बशीरन्, नज़ीरन्, वहीदन् से वाक़िफ़ हैं। अकबर की उन नसीबन् से भी (जो हर फिर कर आया ही रहीं, हालाँकि स्कूल में बरसों पढ़ा कीं) तो निस्बतन और आदतन को भी हर्फ़ 'नून' (ن) से क्यों नहीं लिख सकते। इमला-नामा की यह सिफ़ारिश मुनासिब है कि जो हर्फ़ तोए (ط) और ते (ت) दोनों से लिखे जाते हैं वे हर्फ़ ते (ت) से लिखे जाएँ। तोता को लोग ग़लती से तोए (ط) से लिखते हैं जबकि यह लफ़्ज़ तूती (طوطی) से अलग है और इसे ते (ت) से लिखना चाहिए।
मुझे अब तक याद है कि बचपन में जब मैंने नवल किशोर की छपी हुई 'फ़साना-ए-अजायब' पढ़ी तो उसमें लिखा था, जाना जान-ए-आलम का बाज़ार और लाना वहाँ से एक तोता। लेकिन उर्दू के बहुत से क़ायदों में मैंने तोए (ط) से तोता लिखा हुआ देखा है। इस पर एक लतीफ़ा याद आ गया। हमारे एक मेहरबान की सगाई बचपन में ही उनके ख़ानदान की एक लड़की से हो गई थी। हज़रत पढ़-लिख कर एक अच्छी नौकरी पर लग गए। हर तरफ़ से ऊँचे-ऊँचे ख़ानदानों के रिश्ते आने लगे। शरीफ़ आदमी थे, वादे का लिहाज़ था, उन्होंने सिर्फ़ यह शर्त रखी कि लड़की को जो अनपढ़ थी, मामूली उर्दू पढ़ा दी जाए। चुनाँचे यह हो गया और शादी भी हो गई। मैं इस शादी में शरीक था। बाद में शौहर ने बीवी का इम्तिहान लिया और तोता लिखवाया तो उसने ते (ت) से लिखा। बस इस पर यह हज़रत इतने नाराज़ हुए कि बीवी को तलाक़ दे दी। उन्हें ख़याल हुआ कि उन्हें धोखा दिया गया और माँ-बाप ने लड़की को पढ़ाने की ज़हमत गवारा नहीं की। हालाँकि बेचारी ने तो ते (ت) से सही लिखा था।
इसी तरह गुड़ की गजक को कुछ लोग गज़क लिखते हैं जो शराब का मज़ा बदलने के लिए नमकीन के तौर पर खाई जाती है। जीम (ج) के बजाय ज़े (ز) का इस्तेमाल या हिंदी शब्दों के बजाय फ़ारसी बघारना एक अभिजात्यवादी मानसिकता का सूचक है जिसने एडिटर के बजाय 'मुदीर-ए-मसऊल' और 'रईस-उल-तहरीर' जैसे भारी-भरकम अल्फ़ाज़ लिखने में अपनी शान समझी। अल-हिलाल, निगार और ज़मींदार की तहरीरों ने और उनके एडिटरों की शैली ने उर्दू को मालामाल किया है तो इस दृष्टिकोण से इसकी आम मक़बूलियत को कम भी किया है।
आपको यह याद दिलाने की इजाज़त चाहता हूँ जब 1898 ई. में बिहार में उर्दू के अलावा हिंदी को भी देवनागरी लिपि में सरकारी तौर पर मान्यता दी गई तो दलील यह दी गई कि उर्दू लिपि के पढ़ने में अवाम को इतनी दुश्वारी हुई है कि देवनागरी लिपि की इजाज़त देना ज़रूरी हो गया है। एंटनी मैकडोनेल ने कहीं यह लिखा है कि उन्हें बिहार में जो मानपत्र पेश किया गया था उसकी ज़बान मुश्किल थी और वह बावजूद उर्दू जानने के उसे समझने में असमर्थ थे।
मेरे नज़दीक दुश्वारी मूल रूप से अरबी-फ़ारसी शब्दों की वजह से इतनी नहीं थी जितनी उन्हें अरबी क़ायदे से लिखने की वजह से थी। उर्दू का रिश्ता अब भी रोज़ी-रोटी से जुड़ा हुआ नहीं है। हाँ, तहज़ीब से जुड़ा हुआ ज़रूर है। अरबी, फ़ारसी शब्दों का भंडार जो उर्दू में आना था आ चुका है, अब इसमें बढ़ोतरी की संभावना नहीं। हाँ, हिंदी और अंग्रेज़ी और क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों का भंडार ज़रूर बढ़ेगा। इससे भयभीत या आग-बबूला होने के बजाय इसका स्वागत करना चाहिए। यह बात मैं किसी ख़ौफ़ या स्वार्थ की वजह से नहीं कह रहा हूँ। सिकुड़ने और सिमटने में मौत है। बढ़ने और फैलने, असर क़ुबूल करने और असर डालने में ज़िंदगी। उर्दू ज़बान का इतिहास तो यही कहता है।
नून और नून ग़ुन्ना के बारे में इमला-नामा (वर्तनी के नियमों) की सिफ़ारिश यह है कि डॉक्टर अब्दुल सत्तार सिद्दीक़ी के निर्देश के अनुसार अरबी-फ़ारसी शब्दों की वर्तनी में मूल रूप का पालन किया जाए, मगर देसी शब्दों में 'मीम' (म) लिखा जाए। यानी 'गुंबद' तो 'न' से लिखा जाए मगर 'अंबा' (आम) 'म' से लिखा जाए। यहाँ भी एकरूपता की ज़रूरत महसूस होती है। अगर 'मीम' की आवाज़ निकलती है तो शब्द 'मीम' से ज़रूर लिखना चाहिए और अरबी या हिंदी शब्द में फ़र्क़ नहीं करना चाहिए। यहाँ यह उचित है कि नून ग़ुन्ना को शब्द के बीच में उल्टे ब्रैकेट (قوس) की तरह ज़ाहिर किया जाए।
उर्दू में वाव (و) की मिली-जुली आवाज़ के लिए 'वाव-ए-मादूला' (साइलेंट वाव) इस्तेमाल होता है। उर्दू सीखने वालों को इस वजह से बहुत परेशानी होती है। ग़ालिब 'ख़ुर्शीद' को 'ख़ुरशीद' (बिना वाव के) लिखते थे। इस उसूल के आधार पर 'ख़ुद', 'ख़ुश' वग़ैरह को वाव के बिना लिखना हर तरह से मुनासिब है। हाँ, अफ़साना-ख़्वाँ, ख़्वार, ख़्वाह में चूँकि वाव की आवाज़ साफ़ है, इसलिए इन्हें वाव से लिखना चाहिए।
हमज़ा के सिलसिले में यह मुनासिब है कि जिस शब्द में दो स्वर (हर्फ़-ए-इल्लत या मात्राएँ) साथ-साथ आएँ और अपनी-अपनी पूरी आवाज़ें दें, तो हमज़ा लिखा जाए। मसलन कोई, लखनऊ। अगर अरबी के शब्दों के आख़िर में मूल रूप से हमज़ा है मगर उर्दू में अलिफ़ से बोले जाते हैं, तो उनके आख़िर में हमज़ा क्यों हो। तलबा (छात्र), शोअरा (कवि), उलमा (विद्वान) को अब बिना हमज़ा के तलबा, शोअरा, उलमा लिखा भी जाने लगा है। मगर इमला-नामा में यह जो कहा गया है कि तरकीब (यौगिक शब्दों) में हमज़ा लिखा जाए, उसकी मेरी नज़र में ज़रूरत नहीं। हमज़ा या 'ये' (ے) के इस्तेमाल के सिलसिले में अगर अलिफ़ की आवाज़ निकलती हो तो हमज़ा इस्तेमाल करना चाहिए, वरना नहीं। चुनाँचे आज़माइश, नुमाइश, सताइश, आइंदा, नुमाइंदा में आवाज़ 'ये' की नहीं, अलिफ़ की निकलती है। इसलिए इन्हें हमज़ा से लिखने में क्या हर्ज़ है। मुज़ाफ़ (इज़ाफ़त वाले पहले शब्द) के आख़िर में अगर 'हा-ए-मुख़्तफ़ी' (साइलेंट 'ह') है तो हमज़ा इस्तेमाल करना चाहिए जैसे ख़ाना-ए-ख़ुदा, लेकिन अगर मुज़ाफ़ के आख़िर में अलिफ़ या वाव है तो इज़ाफ़त 'ये' (ے) से ज़ाहिर की जाए। मक़सद यह है कि ज़बान से ज़्यादा ध्वनि संबंधी (सौआति) पहलू का ध्यान रखा जाए।
अब मैं एक ऐसी बात की तरफ़ आता हूँ जिसका एहसास सबसे ज़्यादा डॉक्टर अब्दुल सत्तार सिद्दीक़ी को था। हाल में यह चलन तो देखा गया है कि मुरक्कब (यौगिक) शब्दों के, चाहे फ़ारसी के हों चाहे हिंदी के, हिस्से अलग-अलग लिखे जाएँ। चुनाँचे एहसानमंद में 'एहसान' और 'मंद' अलग लिखा जाए। सेमिनार, 'से मी नार' लिखा जाने लगा है और यूनिवर्सिटी को भी इसी तरह, लेकिन दस्तख़त, तनख़्वाह, बाग़बाँ, गुलज़ार को अब भी मिलाकर लिखा जाता है। डॉक्टर सिद्दीक़ी तो इसके भी समर्थक थे कि अंग्रेज़ी की तरह हर हर्फ़ (अक्षर) अलग-अलग लिखा जाए। मेरी नज़र में इसकी ज़रूरत नहीं। हाँ, यह होना चाहिए कि हर रुक्न (Syllable) को अलग-अलग लिखा जाए। मसलन इम्तिहान को 'इम तिहान', उस्ताद को 'उस ताद', कनखजूरे को 'कन खजूरा'। आख़िर तक़्तीअ (शेर का वज़न नापने) में हम शब्दों को वज़न के मुताबिक़ काटते हैं। इस तरह आम तौर पर लिखने में भी कर सकते हैं।
मील-मैल की वजह से यानी या-ए-मारूफ़ (ई की मात्रा), या-ए-मजहूल (ए की मात्रा), और या-ए-माक़ब्ल मफ़्तूह (ऐ की मात्रा) के लिए इमला-नामे में सिफ़ारिश है कि या-ए-मारूफ़ को शब्दों के नीचे एक खड़ी लकीर से ज़ाहिर किया जाए। या-ए-मजहूल में किसी निशान की ज़रूरत नहीं। या-ए-माक़ब्ल मफ़्तूह में ऊपर ज़बर हो। लेकिन ग़ालिब और शिबली और दूसरे लोगों ने आधी 'य' यहाँ इस्तेमाल की है और यह शक्ल मेरी नज़र में 'से', 'है', 'के' ज़ाहिर करने के लिए ज़्यादा मुनासिब है। तश्दीद (द्वित्व व्यंजन का चिह्न) में किफ़ायत (बचत) है और इसे सीखने में कोई दिक़्क़त नहीं। इसलिए इसे बाक़ी रखना चाहिए।
नंबरों (आदाद) के सिलसिले में यह अर्ज़ करना है कि अगर हम मौजूदा नंबरों के बजाय अरबी या अंतर्राष्ट्रीय नंबर अपनाएँ तो ज़्यादा मुनासिब होगा। इस तरह हम सिफ़र (शून्य) के लिए बिंदु (नुक़्ते) से बच जाएँगे जो छपाई में ग़ायब हो जाता है। संविधान (दस्तूर) में हिंदी के लिए भी तो अंतर्राष्ट्रीय नंबरों का ही निर्देश है।
विराम चिह्नों (औक़ाफ़) के सिलसिले में अर्ज़ यह है कि उर्दू में कॉमा (सकता) के लिए उल्टे कॉमा का रिवाज़ हो गया है। सेमीकोलन का इस्तेमाल बहुत कम देखा गया है लेकिन ज़रूरत के वक़्त इनका इस्तेमाल ज़रूर होता है। प्रश्नवाचक (सवालिया) और विस्मयादिबोधक (निदाइया या फ़ुजाइया) भी। ब्रैकेट में सिर्फ़ एक ब्रैकेट ही काम में लाया जाता है। उद्धरण चिह्न (वावैन) का इस्तेमाल आम है। अब इबारत (वाक्य) पर ज़ोर देने के लिए उसके ऊपर नहीं बल्कि नीचे लकीर होती है, और यह मुनासिब होती है। इतने विराम चिह्नों से उर्दू में काम चल जाता है, और यही कुछ सीखना चाहिए। उर्दू आबादी की सबसे बड़ी तादाद हिंदी राज्यों में है और इन्हीं राज्यों में उर्दू के अधिकारों की रक्षा और संविधान के निर्देशों का लिहाज़ सबसे कम मिलता है। ग़ैर-हिंदी राज्यों में उर्दू पढ़ने और लिखने में दफ़्तरी रुकावटें हों तो हों, सरकार की तरफ़ से कोई साफ़ लापरवाही या नाइंसाफ़ी नहीं है।
हम उर्दू दुनिया को अब भी यूपी, बिहार और दिल्ली तक सीमित समझते हैं। लेकिन गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र, बंगाल, कर्नाटक, कश्मीर में उर्दू का ख़ासा चलन है और उर्दू की तालीम का काफ़ी हद तक संतोषजनक (तसल्ली-बख़्श) इंतज़ाम है। क्षेत्रीय भाषाओं की तरक़्क़ी के साथ इन राज्यों में उर्दू को भी बढ़ावा मिल रहा है और इन राज्यों में द्विभाषी (ज़ुल-लिसानी) शायर और अदीब उभर रहे हैं। मैं इस रुझान का स्वागत करता हूँ। यूपी और बिहार का बहुसंख्यक वर्ग यह समझता है कि जब तक उर्दू की तालीम और चलन पर पाबंदियाँ न हों, हिंदी तरक़्क़ी नहीं करेगी। सी. बी. राव ने तो मेरे एक मज़मून के जवाब में साफ़ कहा था कि एक सिंहासन पर दो राजा नहीं बैठ सकते। मैंने जवाब दिया था कि जब एवरेस्ट पर भी एक से ज़्यादा पर्वतारोही (कोह-पैमा) खड़ा हो सकता है और हिलेरी (Hillary) और तेनज़िंग की तैयारी थी, तो एक राज्य में एक से ज़्यादा ज़बान सरकारी मक़सदों के लिए क्यों नहीं इस्तेमाल की जा सकती।
उर्दू और हिंदी का इलाक़ा एक ही है। आज भी मेरठ और रुहेलखंड में अवाम की ज़बान कुछ आवाज़ों को छोड़कर उर्दू के रूप के मुताबिक़ है। मैंने इसका निजी विश्लेषण (तज्ज़िया) रुहेलखंड ज़िले के देहातों में किया है और वहाँ बारहमासे सुने हैं। लेकिन हिंदी तालीम और सरकारी हिंदी के प्रचार की वजह से एक बनावटी (मसनूई) हिंदी उभर रही है। रेडियो और टीवी की ख़बरों की ज़बान रोज़-ब-रोज़ हिंदी के आम-फ़हम (आसानी से समझ आने वाले) शब्दों को छोड़कर संस्कृत के भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल करती है। और इसका असर रफ़्ता-रफ़्ता सीरियल या फ़ीचर या फ़िल्म की ज़बान पर भी पड़ रहा है। नई शिक्षा नीति में बच्चों के अलावा अनपढ़ वयस्कों को पढ़ाने के लिए ख़ास इंतज़ाम किया गया है। पत्राचार (ख़त-ओ-किताबत) के ज़रिए भी इल्म सिखाने का प्रस्ताव है। उर्दू दोस्तों को इस मौक़े से फ़ायदा उठाना चाहिए। ख़ास तौर से पत्राचार के ज़रिए उर्दू सिखाने की मुहिम यूनिवर्सिटियों के उर्दू विभागों और उर्दू के इदारों को शुरू करनी चाहिए। लिपि (रस्म-ए-ख़त) में ज़रूरी सुधारों में देर नहीं करनी चाहिए। 'शाहा दो रुख़ बिदह व दिल आराम देह' (ऐ बादशाह, अपना चेहरा दिखा और दिल को सुकून दे)। यह कोई महँगा सौदा नहीं।
उर्दू सिर्फ़ ख़ास लोगों (ख़्वास) की ज़बान होकर या एक मज़हबी फ़िरक़े की ज़बान होकर फल-फूल न सकेगी, तरक़्क़ी न कर सकेगी, सिकुड़ कर, सिमट कर रह जाएगी। हमें ज़बान की हिंदुस्तानी पहचान और अदब की हिंदुस्तानी पहचान को और उभारने की ज़रूरत है। बोलचाल की ज़बान में ज़्यादा आज़ादी दी जा सकती है। मगर लिखाई की ज़बान में मयार (स्तर) पर ज़ोर देना होगा, हाँ यह मयार पूरी तारीख़ और आधुनिक हालात और ज़रूरतों के मुताबिक़ होगा। मैं न तो डरा हुआ (मरऊब) हूँ और न मायूस हूँ, दुखी (मलूल) ज़रूर हूँ। हम वक़्त के तक़ाज़े और हालात के चैलेंज को समझ रहे हैं। इक़बाल ने ज़माने की तर्जुमानी करने में ग़लत नहीं कहा है।
न था अगर तू शरीक-ए-महफ़िल क़ुसूर तेरा था या कि मेरा
मिरा तरीक़ा नहीं कि रख लूँ किसी की ख़ातिर मय-ए-शबाना
इन बातों पर ग़ौर कीजिए। शायद आपके सोच-विचार से हमारी ज़बान के मुस्तक़बिल के लिए कुछ काम की बातें निकलें।
- रचनाकार :आल-ए-अहमद सुरूर
- प्रकाशन : एजुकेशनल बुक हाउस, अलीगढ़
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