उर्दू-ए-मोअल्ला
उर्दू अदब के इतिहास में जिन पत्रिकाओं के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, उनमें दिलगुदाज़, मख़्ज़न, उर्दू-ए-मुअल्ला, ज़माना, निगार और उर्दू प्रमुख हैं। इनमें उर्दू-ए-मुअल्ला कई मायनों में सबसे ऊपर है। यह पत्रिका मौलाना हसरत ने उस वक़्त निकाली जब वह बी.ए. की परीक्षा देकर फ़ारिग़ (मुक्त) ही हुए थे और नतीजा तक नहीं निकला था।
इस पत्रिका का सबसे बड़ा मक़सद 'दुरुस्ती-ए-मज़ाक़' (साहित्यिक रुचि का सुधार) तय किया गया था। इसमें उर्दू के सैकड़ों मशहूर और गुमनाम उस्तादों के कलाम का संकलन प्रकाशित किया गया। बहुत से मशहूर शायरों के हालात हस्तलिखित तज़किरों (जीवन-वृत्तांतों) और दूसरे स्रोतों से जमा करके प्रकाशित किए गए। यह महज़ साहित्यिक पत्रिका नहीं थी। शुरू से इसमें देशी और विदेशी राजनीति और वर्तमान हालात पर टिप्पणियां होती थीं। हालांकि इसमें अच्छे-अच्छे अदीबों और शायरों ने लेख, नज़्में और ग़ज़लें भेजीं, मगर इसकी बहार ज़्यादातर हसरत के ख़ून-ए-जिगर की ही आभारी है। वह एक व्यस्त राजनीतिक जीवन के बावजूद इसे बहुत अरसे तक निकालते रहे। शुरू में यह अड़तालीस पन्नों की एक मासिक पत्रिका थी, मगर जब हसरत को हुकूमत का ज़बरदस्त मेहमान होना पड़ा (यानी जेल जाना पड़ा) तो पन्ने भी कम हो गए और प्रकाशन भी नियमित नहीं रहा, मगर पर्चे का छपना बंद नहीं हुआ। पहले पर्चे में कुछ ऊंचे साहित्यिक उद्देश्यों के अलावा लेखकों को पारिश्रमिक देने का ज़िक्र भी किया गया था। मालूम नहीं इस वादे को पूरा भी किया गया या नहीं, मगर इसका ज़िक्र ही हसरत के हौसले और सूझ-बूझ का प्रमाण है। हसरत ने जब स्वदेशी आंदोलन शुरू किया तो मौलाना शिबली ने लिखा था,
तुम आदमी हो या जिन्न। पहले शायर थे, फिर पॉलिटिशियन बने और अब बनिए हो गए।
ज्ञान और कर्म, तथा दृढ़ संकल्प और स्थिरता के इस प्रतीक पर, जिसे हसरत कहा जाता है, यह बड़ी अर्थपूर्ण टिप्पणी है।
उर्दू-ए-मुअल्ला के साहित्यिक कारनामों को तो स्वीकार भी किया गया, मगर इसने राजनीति के मैदान में जो सेवाएं दी हैं, उनकी अभी तक यथोचित क़द्र नहीं हुई। हसरत एक पक्के राष्ट्रवादी थे। वह कॉलेज की शिक्षा के दौरान ही राजनीतिक बहसों में शरीक होते थे और कांग्रेस के गरम दल के दिल-ओ-जान से समर्थक थे। उन्होंने 1904 ई. के बंबई के कांग्रेस अधिवेशन में शिरकत के बाद इसका विस्तृत विवरण अपनी पत्रिका में छापा और मुसलमानों की कांग्रेस में शामिल होने पर ज़ोर दिया। जनवरी 1905 ई. के उर्दू-ए-मुअल्ला में लिखते हैं,
सच तो यह है कि अगर कांग्रेस से कोई और फ़ायदा हासिल न हो, तो सिर्फ़ इस पवित्र जोश और शरीफ़ाना ग़ैरत व ख़ुद्दारी की प्रकट स्थिति को सामने रखकर हम कह सकते हैं कि जो जलसा देश के नौजवानों के दिलों में ऐसी जायज़ हौसला-अफ़ज़ाई और आज़ाद जोश पैदा करे, और देश के बुज़ुर्गों के ध्यान और विचारों को देश के मामलों की तरफ़ लगाए रखने और नौजवानों के सामने अपनी बुलंद-हिम्मती और दृढ़ संकल्प का नमूना पेश करने का मौक़ा दे, वह किसी हालत में बेकार नहीं हो सकता।
बीसवीं सदी की शुरुआत में हालांकि हिंदुस्तानी राष्ट्रीयता का आंदोलन ज़्यादातर अधिकारों की जंग थी, मगर वह पश्चिमी साम्राज्यवाद के शोषण को समझ चुकी थी। इकराम के अनुसार, उन्नीसवीं सदी में एक तरफ़ अंग्रेज़ों का राजनीतिक प्रभुत्व पूरा हो गया और दूसरी तरफ़ इसी सदी में इसके ख़िलाफ़ हिंदुस्तानी राष्ट्रीयता की चेतना पैदा हुई और इसने धार्मिक और सांस्कृतिक मतभेदों को मिटाकर एकजुटता और एकता का पाठ पढ़ाना शुरू किया। सर सैयद ने मुसलमानों के बहुत बड़े हिस्से को कांग्रेस में शामिल होने से रोके रखा था और इसकी सबसे बड़ी वजह यह बताई थी कि उनका शैक्षिक पिछड़ापन और अज्ञानता व लापरवाही इस बात की मांग करती है कि पश्चिमी शिक्षा और संस्कृति की उन बरकतों से, जो नया ज़माना अपने साथ लाया है, पूरी तरह फ़ायदा उठाने के लिए पश्चिमी हुकूमत से सहयोग किया जाए। इसी आधार पर उन्होंने कांग्रेस का विरोध किया।
शिबली ने जब रोम, मिस्र और शाम (सीरिया) की यात्रा से वापस आकर तुर्कों की हमदर्दी में भाषण दिया तो उन्हें अच्छी नज़र से नहीं देखा गया, और कांग्रेस के जवाब में ऑल इंडिया मोहम्मडन एजुकेशनल कॉन्फ्रेंस की शुरुआत की गई, जिसके सालाना जलसे कांग्रेस के सालाना जलसों की तरह राष्ट्रीय मेले होते थे और जिनमें शैक्षिक, सांस्कृतिक और सामाजिक तरक़्क़ी के उपाय पेश किए जाते थे। बीसवीं सदी की शुरुआत में सर सैयद के विचारों के प्रभाव, अंग्रेज़ों की राजनीतिक रणनीति और कांग्रेस में हिंदू संस्कृति के पुनरुत्थान की भावना के इज़हार ने मुसलमानों की एक बड़ी तादाद को एक अलग राजनीतिक पार्टी बनाने पर मजबूर कर दिया। मगर कांग्रेस में शुरू से बंगाल, बंबई और मद्रास के काफ़ी प्रमुख मुसलमान और यूपी के भी कुछ प्रतिष्ठित लोग शामिल थे। शिबली और मुंशी सज्जाद हुसैन के अलावा हसरत की आवाज़ ने इस कमज़ोर समूह को ख़ासी मज़बूती पहुंचाई। उस ज़माने में सर सैयद के तथाकथित अनुयायी अंग्रेज़ प्रिंसिपलों के इशारे पर सर सैयद के नाम से मुसलमानों को राष्ट्रीय राजनीति में हिस्सा लेने से रोकते थे।
ज़रूरी था कि सर सैयद की सेवाओं को स्वीकार करने के बावजूद और उनके कारनामों को ऐतिहासिक दृष्टि से अहम समझते हुए उनकी तात्कालिक राजनीतिक गतिविधियों का अनुसरण न किया जाए। जनवरी 1905 ई. के उर्दू-ए-मुअल्ला में नेशनल कांग्रेस और मुसलमान के शीर्षक से मौलवी बरकतउल्लाह का एक ख़त छपा था। यह हज़रत उन प्रवासियों में से थे जिन पर उनके राजनीतिक विचारों की वजह से वतन की ज़मीन तंग हो गई थी और जो अमेरिका में रह रहे थे। उन्होंने हसरत के नाम एक फ़ारसी ख़त में सर सैयद के सांस्कृतिक, शैक्षिक व साहित्यिक कारनामों और उनकी राजनीतिक नीतियों में फ़र्क़ किया है। फ़रमाते हैं,
अब बीस साल हो गए हैं कि इंडियन नेशनल कांग्रेस वजूद में आई, और मरहूम सर सैयद ने इस राष्ट्रीय आंदोलन के शुरुआती दिनों में असहमति का रास्ता चुना, क्योंकि हालात की मांग यही थी और उनके पास कोई दूसरा चारा नहीं था। और उनका यह विरोध मुसलमानों और कांग्रेस, दोनों के लिए फ़ायदेमंद साबित हुआ। मुसलमान शिक्षा हासिल करने में लग गए और कांग्रेस को उनके विरोध से मज़बूती मिली, और चीज़ें अपने विपरीत से ही पहचानी जाती हैं।
सर सैयद को कुछ लोगों ने हिंदुस्तान में सांप्रदायिकता का संस्थापक कहा है। हालांकि गंभीर राष्ट्रवादियों यानी जवाहरलाल नेहरू और आचार्य नरेंद्र देव ने सर सैयद के इन विचारों का समर्थन किया है और मौलाना फ़ुज़ैल अहमद ने मुसलमानों का रौशन मुस्तक़बिल में दिखाया है कि किस तरह अंग्रेज़ों ने सर सैयद की प्रगतिशीलता और क्रांतिकारी संघर्ष को धीरे-धीरे अपने स्वार्थों का साधन बना लिया, मगर इसकी वजह से सर सैयद को दोषी ठहराना ग़लत है। हसरत ने मौलवी बरकतउल्लाह की राय से सहमति जताई है। यह उनकी राजनीतिक चेतना का बहुत अच्छा प्रमाण है।
हसरत ने बंबई, बनारस, कलकत्ता, कांग्रेस की रिपोर्टें लगातार छापीं। 'उर्दू-ए-मुअल्ला' में काज़ी तलम्मुज़ हुसैन, मौलवी बरकतउल्लाह, हाजी मूसा खां और हसरत के लेख, कांग्रेस के समर्थन में बराबर छपते रहे। उन्होंने 'इज़ाला-ए-औहाम' के नाम से मौलवी अब्दुल क़य्यूम हैदराबादी की पत्रिका 'उर्दू-ए-मुअल्ला' के परिशिष्ट (सप्लीमेंट) के तौर पर प्रकाशित की थी, जिसमें धार्मिक और तार्किक रूप से मुसलमानों को कांग्रेस में शामिल होने और देशवासियों के कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होने की प्रेरणा दी गई थी। मिस्टर गोखले, श्री अरबिंदो घोष, मिस्टर मालवीय और मिस्टर तिलक के अहम भाषणों के अंश बराबर दिए जाते थे। हसरत ने एक लेख में क़ुरान की वो तमाम आयतें एक जगह जमा कर दी थीं जो काफ़िरों और मुशरिकों से मेल-जोल या असहयोग के विषय से संबंधित थीं और उनसे यह नतीजा निकाला था कि दुनियावी मामलों में उनके साथ सहयोग करने की क़ुरान में इजाज़त मौजूद है। अक्टूबर 1906 ई. में हिंदुस्तानी मुसलमानों का जो प्रतिनिधिमंडल आग़ा खां के नेतृत्व में लॉर्ड मिंटो से मिला था और जिसकी मांगों में इधर का भी इशारा था, उसका आम मुसलमानों ने बड़ा जोशीला स्वागत किया था। शिबली ने इसकी असल हक़ीक़त पर अपनी नज़्मों में सावधान किया। मौलाना ने 'उर्दू-ए-मुअल्ला' के सातवें खंड में लिखा,
लॉर्ड साहब ने सिर्फ़ उन बातों का जवाब दिया है जो उनके ख़्याल में अंग्रेज़ों के लिए फ़ायदेमंद हैं और एड्रेस (संबोधन) के बाक़ी हिस्से को इस तरह नज़रअंदाज़ कर दिया है जैसे उन्होंने कुछ सुना ही नहीं।
ऑल इंडिया मोहम्मडन एजुकेशनल कॉन्फ्रेंस के जलसों पर उनकी आलोचनाएं गंभीर और रचनात्मक होती थीं। 1907 ई. में छात्रों की आम हड़ताल के सिलसिले में अंग्रेज़ प्रिंसिपल के रवैये और मोहसिन-उल-मुल्क की कमज़ोरी पर आम मुसलमानों में जो बेचैनी और चिंता थी, मौलाना ने उसका बहुत अच्छा चित्रण किया है। उन्होंने अंग्रेज़ अफ़सरों की राजनीतिक रणनीति का पर्दा बराबर फ़ाश किया। चूंकि वह साफ़ बोलने वाले थे और लगी-लिपटी रखने के आदी नहीं थे, इसलिए उन्होंने सख़्त लहज़े में अंग्रेज़ अधिकारियों की निंदा की और उन मुसलमानों को भी बुरा-भला कहा जो अंग्रेज़ों की ख़ुशी के लिए राष्ट्रीय हित को क़ुर्बान करने पर तैयार थे।
उस ज़माने में अलीगढ़ कॉलेज को यूनिवर्सिटी बनाने का आंदोलन शुरू हो चुका था। हसरत और कुछ दूसरे आज़ादी पसंद लोगों का आग्रह था कि यूनिवर्सिटी को संबद्धता (affiliation) का हक़ ज़रूर मिले। मौलाना की यह राय किसी भावुकता के आधार पर नहीं थी। उनका यह दृढ़ विश्वास था कि माध्यमिक विद्यालयों में मुसलमानों को कृषि, उद्योग और शिल्प, विज्ञान और दूसरे उपयोगी ज्ञान और व्यवसायों की शिक्षा दी जाए ताकि वे समाज में अपनी आर्थिक स्थिति मज़बूत कर सकें। इसलिए वह कॉलेजों की शिक्षा के मुक़ाबले में स्कूलों की शिक्षा पर ज़्यादा ज़ोर देते थे और मुसलमानों की ऐसी संबद्ध (affiliating) यूनिवर्सिटी चाहते थे जो औद्योगिक संस्थानों और उपयोगी ज्ञान का देश में एक जाल बिछा दे और मुसलमान सरकारी नौकरी के मोहताज न रहें।
'उर्दू-ए-मुअल्ला' में स्वदेशी आंदोलन, विदेशी माल के बायकॉट, यूनिवर्सिटी की संबद्धता और दूसरे मुद्दों पर स्वतंत्र रूप से विचार व्यक्त किए जाते थे। इसी तरह वह इस्लामी देशों के राजनीतिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक जीवन पर भी जानकारी मुहैया कराते थे। त्रिपोली, मिस्र, बाल्कन, हिजाज़ के मुद्दों पर 'उर्दू-ए-मुअल्ला' में अच्छे-अच्छे लेख निकले। उन्होंने एक 'मुस्तफ़ा कमाल विशेषांक' (1908 ई.) भी निकाला था। उन पर पहली बार मुक़दमा 'उर्दू-ए-मुअल्ला' के एक लेख मिस्र में ब्रिटेन की पॉलिसी पर चलाया गया था और हालांकि यह एक छात्र के नाम से छपा था और निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि यह हसरत का ही था, मगर मौलाना ने बड़ी हिम्मत के साथ इसकी पूरी ज़िम्मेदारी ली। चुनांचे 1908 ई. में उनको अंग्रेज़ी हुकूमत ने दो साल की सज़ा दी और जुर्माना न चुकाने की स्थिति में छह महीने की अतिरिक्त सज़ा तय की। चूंकि मौलाना जुर्माने की रक़म अदा करने में असमर्थ थे, इसलिए उनका अत्यंत दुर्लभ पुस्तकालय, जिसमें सैकड़ों नायाब पांडुलिपियां और दुर्लभ मुद्रित दीवान और तज़किरे थे, और जिन्हें हसरत ने बड़ी तलाश, खोज और ख़र्च से जमा किया था, कबाड़ की तरह बेचकर बर्बाद कर दिए गए। बेगम हसरत का बयान है कि,
यह पुस्तकालय साढ़े चार हज़ार की क़ीमत का था और हुकूमत ने इसे सिर्फ़ साठ रुपये में बेच दिया।
फिर जेल में हसरत के साथ जो व्यवहार किया गया, वह अंग्रेज़ी शासन प्रणाली पर एक बहुत बदनुमा धब्बा है। उन्होंने दस महीने तक चक्की पीसी और तक़रीबन एक मन गेहूं रोज़ाना उनसे पिसवाया जाता था। इस कठिन दौर में उन्होंने जिस तरह बर्बरता के हर प्रदर्शन का मुक़ाबला किया और अपने उसूलों पर क़ायम रहे, इसकी मिसालें इतिहास में कम ही मिलती हैं। इसी ज़माने में उन्होंने अपनी कुछ बेहतरीन ग़ज़लें लिखीं और एक पूरा दीवान संकलित किया। उनका यह मशहूर शेर इसी ज़माने का है,
है मश्क़-ए-सुख़न जारी चक्की की मशक़्क़त भी
इक तुर्फ़ा तमाशा है हसरत की तबीअत भी
जेल के इतने सख़्त कष्टों के बावजूद हसरत की आन-बान में फ़र्क़ नहीं आया और रिहाई के बाद जब कुछ दोस्तों ने उनसे अपनी पॉलिसी में नर्मी लाने की गुज़ारिश की तो उन्होंने 'उर्दू-ए-मुअल्ला' में लिखा,
'उर्दू-ए-मुअल्ला' के दोबारा प्रकाशन पर कुछ दोस्तों ने मोहब्बत और हमदर्दी के नाते यह सलाह दी है कि हमको अब पॉलिटिक्स से बिल्कुल अलग हो जाना चाहिए। कुछ का मशवरा यह था कि अगर राजनीतिक लेख हों भी तो मुस्लिम लीग की तयशुदा पॉलिसी के अनुकूल हों। कुछ दोस्तों ने जो यक़ीनन ज़्यादा आज़ाद ख़्याल हैं, यहां तक इजाज़त दी कि अगर आम भारतवासियों के साथ ही चलना मंज़ूर हो तो कांग्रेस के नरम दल का रास्ता अपनाया जाए। हम पर इन तमाम नेक-नीयत मशवरों और समझौतावादी सलाहों का शुक्रिया अदा करना फ़र्ज़ है, लेकिन मुश्किल यह है कि हमारे ख़्याल में यक़ीन या अक़ीदा, चाहे वह धार्मिक हो या राजनीतिक, एक ऐसी चीज़ है जिसको किसी डर या समझौते के ख़्याल से छोड़ देना या बदल देना नैतिक गुनाहों में से एक सबसे बुरा गुनाह है, जिसे करने का किसी आज़ादी-पसंद या आज़ाद ख़्याल पत्रकार के दिल में इरादा भी पैदा नहीं हो सकता।
पॉलिटिक्स में हम देशभक्तों के नेता मिस्टर तिलक और प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी बाबू अरबिंदो घोष के अनुसरण को अपने ऊपर ज़रूरी समझते हैं। चुनांचे इस हैसियत से फ़िरोज़ शाही कांग्रेस से हमको उतनी ही नाराज़गी है जितनी अमीरी मुस्लिम लीग या नवजात लाल चंदी कॉन्फ्रेंस से... फ़िरंगी हुकूमत का अस्वाभाविक निज़ाम हमेशा के लिए हिंदुस्तान में बाक़ी नहीं रह सकता और अपनी मौजूदा सूरत में तो इसका कुछ साल क़ायम रहना भी मुश्किल नज़र आता है। गरम दल के नेता आमतौर पर और अरबिंदो घोष विशेष रूप से, तमाम पॉलिटिकल कोशिशों में उपरोक्त उसूल को ध्यान में रखते हैं, इस वास्ते हमारी नज़र में वे हक़ पर हैं। ग़ुलाम मुल्कों और क़ौमों के लिए इसके सिवा और कोई पॉलिसी नहीं हो सकती कि वे अपनी पूरी मेहनत के साथ पूर्ण स्वतंत्रता को दोबारा हासिल करने की कोशिश में लग जाएं। (1910 ई.)
इसी जज़्बे ने हसरत को कांग्रेस के गरम दल की तरफ़दारी में लगाये रखा। इसी ने सूरत कांग्रेस के अधिवेशन में आम राय के ख़िलाफ़ पूर्ण स्वतंत्रता के ऐलान पर उन्हें प्रेरित किया। इसी वजह से उन्होंने महात्मा गांधी का उस वक़्त विरोध किया जब वह असहयोग के जन आंदोलन को ख़ुद ही ख़त्म करने पर आमादा हो गए। इसी बुनियाद पर उन्होंने नेहरू रिपोर्ट का विरोध किया और लखनऊ के ऑल पार्टीज़ कन्वेंशन में पूर्ण स्वतंत्रता के लिए अकेले ही नारा बुलंद किया।
हसरत के सियासी ख्यालात को समझने के लिए सिर्फ मुकम्मल आज़ादी की हिमायत का इल्म काफी नहीं। 1926 ई. में ऑल इंडिया कम्युनिस्ट कॉन्फ्रेंस कानपुर में हसरत ने जो स्वागत भाषण पढ़ा था, वह 'उर्दू-ए-मुअल्ला' जिल्द 18, नंबर 4, 5, 6 (मई-जून 1926) में छपा है। इसमें वह फरमाते हैं,
कम्युनिज़्म की तहरीक किसानों और मज़दूरों की तहरीक है, यानी लोग यह समझते हैं कि कम्युनिज़्म और खून-खराबा व फसाद एक-दूसरे से लाज़िमी तौर पर जुड़े हैं, हालाँकि इसकी हकीकत इसके सिवा और कुछ नहीं कि हम लोग अहिंसा को सिर्फ ज़रूरत और मसलहत (व्यावहारिकता) की बिना पर जायज़ समझते हैं और महात्मा गांधी की तरह इसको हर हालत में उसूल के तौर पर ज़रूरी करार नहीं देते।
ज़ाती और शख़्सी यानी पर्सनल और प्राइवेट जायदाद का फर्क उन्होंने इस तरह वाज़ेह किया है, ज़ाती चीज़ों में घड़ी, छतरी, लोटा, मकान, कपड़े आते हैं। शख़्सी में ज़मीन, कारखाने वगैरह और कम्युनिस्ट उसूल का अमल ज़ाती जायदाद पर नहीं होता, सिर्फ शख़्सी पर होता है।
पार्टी के मक़ासिद (उद्देश्यों) का मुख्तसर तौर पर इस तरह ज़िक्र किया है,
(1) मुकम्मल आज़ादी को तमाम जायज़ ज़रियों से कायम करना, (2) स्वराज की शक्ल सोवियत रिपब्लिक की हो जहाँ कम्युनिज़्म के उसूलों पर अमल किया जाए, (3) स्वराज के कायम होने तक किसानों और मज़दूरों की भलाई और आज़ादी की हर मुमकिन कोशिश करना और इस सिलसिले में हिंदुस्तान की हर सियासी जमात के साथ इस हद तक मिलकर काम करने को जायज़ रखना जिस हद तक वह जमात हमारे ऊपर बताए गए मक़ासिद की हिमायत करे, (4) कम्युनिज़्म के उसूलों को फैलाने का इंतज़ाम करना और अवाम को अपना हम-ख्याल बनाना ताकि स्वराज के कायम होने के साथ ही फौरन उन पर अमल शुरू हो सके।
मौलाना ने यह भी साफ़ किया है कि हमारी जमात सिर्फ हिंदुस्तान की जमात है। कम्युनिज़्म और मज़हब के मुताल्लिक मौलाना ने यह भी वाज़ेह किया है कि हम हर मज़हब के वजूद को तस्लीम करते हैं (मानते हैं)। हमारे नज़दीक ला-मज़हबी (धर्म को न मानना) भी एक मज़हब है। कम्युनिज़्म और इस्लाम के सिलसिले में उनकी राय यह थी कि कुछ मुसलमान लीडर बिला-वजह कम्युनिज़्म को इस्लाम के ख़िलाफ़ बताते हैं, हालाँकि हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। मसलन, कम-अज़-कम सरमायादारी (पूंजीवाद) के ख़िलाफ़ इस्लाम का फैसला शायद कम्युनिस्ट अक़ीदे से भी ज़्यादा सख़्त है। आख़िर में उन्होंने कहा कि कम्युनिज़्म पॉलिटिक्स की बेहतरीन आख़िरी शक्ल है।
मौलाना के इन ख्यालात में अगरचे गहरी साइंटिफिक नज़र नहीं है, मगर इसमें शक नहीं कि उनकी बारीकियों को समझने वाली और पुख़्ता नज़र रखने वाली तबीयत ने कम्युनिज़्म की अहम सच्चाइयों को समझ लिया था। और इसीलिए, बावजूद इसके कि वह कांग्रेस के सरमायादाराना (पूंजीवादी) और मुस्लिम-विरोधी रवैये से तंग आकर मुस्लिम लीग में शामिल हो गए थे, मगर वह हमेशा अवाम के दोस्त रहे और अपने कम्युनिस्ट अक़ीदे पर भी कायम रहे। इसीलिए उन्होंने अपना सियासी फॉर्मूला 'विफ़ाक़िया इत्तेहादिया' (Confederation of State) पेश किया था। अगर हमारे सियासी रहनुमा मौलाना के इस फॉर्मूले पर ज़्यादा तवज्जो देते, तो हिंदुस्तान के बँटवारे के खौफ़नाक नतीजों का सामना न करना पड़ता और अक़ल्लियतों (अल्पसंख्यकों) के हुक़ूक़ की हिफ़ाज़त का भी इंतज़ाम हो जाता।
मौलाना के सियासी ख्यालात चूँकि उनकी शख़्सियत और 'उर्दू-ए-मुअल्ला' के मख़सूस कैरेक्टर का एक हिस्सा हैं, इसलिए उनका थोड़ी तफ़सील से ज़िक्र किया गया। 1910 ई. में जब मौलाना ने 'उर्दू-ए-मुअल्ला' की पॉलिसी में यह तरमीम (बदलाव) की कि हर किस्म के मज़ामीन (लेख) शामिल न किए जाएँ, तब भी पॉलिटिक्स और अदब का दामन नहीं छोड़ा। इसलिए न सिर्फ हसरत के सियासी शऊर (चेतना) के मुताले के लिए, बल्कि हिंदुस्तानी मुसलमानों के क़ौमी शऊर को समझने के लिए 'उर्दू-ए-मुअल्ला' की फाइलों का मुताला ज़रूरी है।
'उर्दू-ए-मुअल्ला' का सबसे बड़ा कारनामा यह है कि इसके सफ़हों (पृष्ठों) में हमें उर्दू के बहुत से असातज़ा (उस्ताद शायरों) के हालात और उनके कलाम का इंतेख़ाब (संकलन) मिलता है। इसी इंतेख़ाब को उन्होंने इंतेख़ाब-ए-सुख़न के नाम से छापा, जो अपनी किस्म का सबसे बड़ा इंतेख़ाब है। इसमें मशहूर उस्ताद शायरों के अलावा उनके शागिर्दों और दूसरे दर्जे के बहुत से अहम शायरों का कलाम मिल जाता है और हसरत की वजह से कितने ही अहम शायर गुमनामी के परदे में दफ़न होने से बच गए हैं। हसरत ख़ुद एक बड़े शायर थे। उन्हें सोज़-ओ-गुदाज़, दर्दमंदी और असर-पज़ीरी (प्रभावशीलता) फ़ितरत से मिली थी। उनकी तबीयत में फरिश्तों की मासूमियत के साथ मज़बूत इरादा रखने वालों की ज़िद और सलाबत (मज़बूती) भी थी। उन्होंने हमारी क्लासिकल शायरी का जितना गहरा मुताला किया था, फ़न और सोज़-ए-फ़न के बारीक से बारीक नुक्ते को जिस तरह देखा था, अल्फ़ाज़ को जिस तरह परखा और तौला था और लफ़्ज़ों के पीछे ख़याल की सच्चाई, मानवीयता (अर्थवत्ता) और शेरियत का जिस तरह एहसास किया था, उस तरह कम ही मुहक़्क़िक़ों (शोधकर्ताओं) और नक़्क़ादों (आलोचकों) ने किया होगा।
यही वजह है कि उस्ताद शायरों के मुताल्लिक उनके ख्यालात बड़ा वज़न रखते हैं और अगरचे कहीं-कहीं उनसे इख़्तिलाफ़ (असहमति) लाज़िमी है, मगर फिर भी उनकी अहमियत से इनकार करना हठधर्मी के बराबर होगा। 'उर्दू-ए-मुअल्ला' में जहाँ उनकी और उस ज़माने के तमाम मशहूर उस्ताद शायरों की ग़ज़लें और नज़्में होती थीं, वहीं उनके अलावा कुछ मशहूर लिखने वालों के मज़ामीन भी होते थे। 'उर्दू-ए-मुअल्ला' का सबसे अच्छा दौर 1912 ई. तक का है। उस ज़माने में रिसाला (पत्रिका) पहले 48 और फिर 24 सफ़हे का छपता था और मज़ामीन, नज़्मों और ग़ज़लों में भी काफी तनव्वु (विविधता) होता था। 1912 ई. के बाद से 'उर्दू-ए-मुअल्ला' में इंतेख़ाब ज़्यादा होने लगे और इसके ज़मीमे (सप्लीमेंट) के तौर पर 'नुकात-ए-सुख़न' के हिस्से निकलने शुरू हो गए। आख़िर-आख़िर में तो यह रिसाला बादामी पतंगी कागज़ पर चंद तबर्रुकात (निशानियों) का मजमूआ रह गया था। हकीकत यह है कि कोई रिसाला एक अकेले इंसान की पूरी तवज्जो से नहीं चल सकता और एक इंसान जो मुमकिन कोशिश कर सकता है, वह हसरत ने बराबर की। फिर भी 'उर्दू-ए-मुअल्ला' के काम को चलाने वाले हसरत को न मिले। दूसरे, उनकी सियासी मसरूफ़ियात (व्यस्तताओं) ने और उनके क़ैद-ओ-बंद (जेल जाने) के सिलसिले ने भी 'उर्दू-ए-मुअल्ला' पर अपना नक़्श छोड़ा। अदब हसरत की ज़िंदगी में था, मगर सारी ज़िंदगी न बन सका, वरना 'उर्दू-ए-मुअल्ला' का कारनामा बेमिसाल और लाजवाब होता।
हसरत ने हालाँकि क्लासिकल अदब का गहरा मुताला किया था, मगर उन्होंने क़दीम और जदीद (पुराने और नए) के ख़ानों में महसूर होना (सीमित रहना) कभी गवारा नहीं किया। 'उर्दू-ए-मुअल्ला' के आग़ाज़ में लिखते हैं, तर्ज़-ए-क़दीम और जदीद की क़ैद को नापसंद करता हूँ, कोई रंग हो, अच्छा हो, 'उर्दू-ए-मुअल्ला' दोनों किस्मों का गरवीदा (प्रशंसक) है।
ग़ज़लों में वह इनफ़िरादियत (विशिष्टता) और नज़्मों में मानवीयता (अर्थवत्ता) और तसल्सुल-ए-बयान (बयान की निरंतरता) के दिलदादा थे। शुरू से उनके अंदर शेर-ओ-सुख़न का एक सुथरा ज़ौक़ (रुचि) मौजूद था। वह फ़िक्र और फ़न के रुमूज़ (बारीकियों) को जानते थे, इसीलिए वह जदीद-क़दीम की सख़्त हदबंदियों के ख़िलाफ़ थे। इक़बाल ने गोया हसरत के दिल की बात कही है,
ज़माना एक, हयात एक, कायनात भी एक
दलील-ए-कम-नज़री क़िस्सा-ए-जदीद-ओ-क़दीम
एक गहरे और रचे-बसे साहित्यिक बोध के बावजूद हसरत का नई ज़रूरतों को मानना और ताज़गी, नयापन और प्रयोगों की क़द्र करना ज़ाहिर करता है कि उनकी आलोचनात्मक समझ कितनी बढ़ी हुई थी। पश्चिमी विद्वानों ने आलोचकों की व्यापकता, परंपराओं से वाक़फ़ियत और प्रयोगों से हमदर्दी पर जो ज़ोर दिया है, वह हसरत के यहाँ पूरी तरह दिखाई देता है। इसके साथ उनकी आज़ाद और बेलाग राय और उनके शोध ने मिलकर उनके साहित्यिक और आलोचनात्मक लेखों को एक अनमोल धरोहर बना दिया है। उर्दू जानने वाला वर्ग ज़्यादातर एक ही आँख रखता है। उसने हसरत की शायरी की ख़ासी क़द्र की मगर उनकी शोध और आलोचनात्मक सेवाओं को वह दर्जा नहीं दिया जिसकी वे हक़दार थीं। ज़रूरत है कि 'उर्दू-ए-मुअल्ला' के अच्छे लेखों का एक संकलन कई खंडों में प्रकाशित किया जाए। इसमें हसरत के अलावा इमदाद इमाम असर, शाद अज़ीमाबादी, चकबस्त, शरर, प्रेमचंद, नज़्म तबातबाई, महबूबुर्रहमान कलीम, अमीर अहमद अलवी, अहसन मारहरवी के लेख भी शामिल होने चाहिए।
शाह हातिम, मज़हर जान-ए-जानाँ, क़ायम, सौदा, रंगीन, मुसहफ़ी, मजरूह, अमीर उल्लाह तस्लीम, असग़र अली ख़ाँ नसीम, मोमिन, ग़ालिब, शाह ज़फ़र, शाह नसीर, नवा बदायूनी, ज़हीर देहलवी, गुस्ताख़, वफ़ा रामपुरी पर हसरत के लेख बहुत महत्वपूर्ण हैं। क़ायम और मुसहफ़ी को तो लोगों ने भुला दिया था। हसरत ने उन्हें दोबारा खोजा और उनकी मौजूदा लोकप्रियता में हसरत का बड़ा हाथ है। 'आब-ए-हयात' की गद्य शैली और जादूगरी की वजह से कुछ विद्वानों की महानता आम निगाहों से ओझल हो गई थी। हसरत ने उन्हें उनका हक़ दिलवाया। असंतुलन की वजह से जो अतिवाद पैदा हो गया था, हसरत ने उसे कम करके एक संतुलन प्रदान किया और ग़ज़ल, क़सीदा, मसनवी, मर्सिए के कुछ मानक लोगों के सामने रखे। मजरूह की चर्चा में 'उर्दू-ए-मुअल्ला' (अगस्त 1905 ई.) में लिखते हैं,
शायरी और उस्तादी का सिर्फ़ यही कमाल नहीं है कि विषय बुलंद हो और ज़बान सही या रदीफ़ खुलती हो और क़ाफ़िया ताज़ा हो, बल्कि इन सब बातों के अलावा सबसे बड़ी ख़ूबी जो सबसे बढ़कर मुश्किल लेकिन सबसे ज़्यादा ध्यान देने योग्य है, वह शब्दों के चयन से संबंधित है।
शब्दों के चयन का यह मसला मामूली नहीं है और आज जब यह ख़याल आम होता जा रहा है कि शब्दों की समझ को अर्थवत्ता से अलग करके नहीं देखना चाहिए, यानी शिल्प (हैयत) और विषय-वस्तु (मवाद) को बिल्कुल एक दूसरे से जुदा नहीं किया जा सकता, तो हसरत का शब्दों के चयन का यह मानक दरअसल विषय के चयन की तरफ़ भी इशारा करता है। हसरत 'आमद' (स्वाभाविक रचना) और 'आवुर्द' (प्रयासपूर्ण रचना) में फ़र्क़ करते थे। उम्र के आख़िरी हिस्से में उन्होंने उर्दू शायरी का विभाजन जिन शीर्षकों के तहत किया था, उनमें 'आमद' और 'आवुर्द' के फ़र्क़ को सबसे पहले लिया था। इसीलिए लखनऊ की ज़बान का क़ायल होने के बावजूद, वे लखनऊ की शब्द-पूजा के दीवाने नहीं थे और न ही दिल्ली स्कूल के अंधे अनुयायी थे। वे ग़ज़ल के हुस्न को पहचानते थे और उसके ख़ास रंगों की परख रखते थे। उनका ग़ज़ल गोई का विचार अमीर और दाग़ की तुलना में बहुत अच्छी तरह ज़ाहिर होता है। फ़रवरी 1911 ई. के 'उर्दू-ए-मुअल्ला' में लिखते हैं,
आशिक़ाना शायरी की दो क़िस्में हैं। पहली वह जिसमें प्रेम की भावनाओं की सही निगाह, सत्य को पहचानने वाले के सामने इश्क़ को ईश्वर के प्रकटीकरण की उस शान में पेश करती है जिसके बारे में निज़ामी ने 'हू अल्लाह' फ़रमाया और जिसे मौलाना रूम ने अपनी तमाम बीमारियों की दवा माना। ऐसी शायरी की एक सरहद तसव्वुफ़ (सूफ़ीवाद) और इश्क़-ए-हक़ीक़ी (ईश्वरीय प्रेम) के क़रीब और इश्क़-ए-मजाज़ी (सांसारिक प्रेम) और पाक मुहब्बत से जुड़ी हुआ करती है। उर्दू ज़बान में तसव्वुफ़ और इश्क़ का रुझान दुर्लभ है, अलबत्ता मुहब्बत की भावनाएँ मीर और मुसहफ़ी या दर्द, क़ायम के कलाम में अक्सर पाई जाती हैं।
आशिक़ाना शायरी की दूसरी क़िस्म वह है जिसमें पाक और निस्वार्थ इश्क़ के बजाय वासना की भावनाओं की सही तस्वीर खींची गई है, जिसके नमूने जुरअत, मियाँ नज़ीर और इंशा के कलाम में बहुतायत से मिलते हैं। दाग़ और अमीर की काव्य रचना को हम न पहली क़िस्म में शामिल कर सकते हैं न दूसरी क़िस्म में। जुरअत और इंशा की तरह न दाग़ की शायरी अय्याशाना है, न मीर और दर्द जैसी। अमूमन दोनों का कलाम आरिफ़ाना सोज़-व-गुदाज़ (सूफ़ियाना दर्द और तड़प) की दौलत से महरूम है और आशिक़ाना शायरी की परिभाषा इन दोनों में से किसी की शायरी पर लागू नहीं हो सकती।
अमीर के अशआर में विषय की बुलंदी, ख़याल की नज़ाकत, बयान की गंभीरता और ज़बान की शुद्धता, ग़रज़ यह कि कलाम की परिपक्वता के तमाम ज़रूरी तत्व मौजूद होते हैं, लेकिन शायरी की जान यानी तासीर (प्रभाव) की अनुपस्थिति के कारण उनकी हैसियत एक हसीन मगर बेजान शरीर से ज़्यादा नहीं मानी जा सकती। ('मिरात-उल-ग़ैब' और नातिया कलाम इसका सुबूत है) दाग़ के अशआर में ज़बान की सफ़ाई, उर्दू मुहावरों की बेतकल्लुफ़ी, बयान की शोख़ी और शब्दों का मनपसंद दोहराव या उलट-फेर, ग़रज़ कि शेर की ज़ाहिरी ख़ूबी का तमाम सामान उपलब्ध होता है, लेकिन वह बात जिसे हम इश्क़ की उच्च भावनाओं के लिए ख़ुशी की पूँजी कह सकें, उसका यहाँ निशान भी नहीं मिलता। आध्यात्मिक भावनाएँ तो दरकिनार, दाग़ ने शारीरिक इच्छाओं की भी सही तस्वीर बहुत कम खींची है। प्रेम-प्रसंगों के वर्णन (मुआमला-बंदी) और अय्याशाना चोंचलों को भी बनावट का ऐब इतना घटिया और भद्दा बना देता है कि सही साहित्यिक रुचि उनसे किसी तरह आनंदित नहीं हो सकती.... भाषा पर अधिकार (क़ादिर-उल-कलाम) होने की हैसियत से अमीर को दाग़ पर और एक ख़ास काव्य शैली के मालिक होने की हैसियत से दाग़ को अमीर से श्रेष्ठ क़रार दे सकते हैं। कुल मिलाकर दोनों बराबर हैं।
दिल्ली और लखनऊ की शायरी के दो सरताजों, ज़फ़र और अख़्तर के बारे में भी उनकी राय दिलचस्प है। 'उर्दू-ए-मुअल्ला' (जनवरी 1911 ई.) में लिखते हैं, ज़फ़र का कलाम दर्द और तड़प की ख़ूबियों से मालामाल है, इसके विपरीत अख़्तर की शायरी में बनावट और 'आवुर्द' के सिवा कुछ भी नहीं पाया जाता।
इसी तरह उन्होंने सबसे पहले आज़ाद के इस ख़याल का खंडन किया कि ज़फ़र का कलाम जो कुछ भी है, वह ज़ौक़ का है। उन्होंने ज़फ़र और शाह नसीर की साझा विशेषताओं पर ज़ोर दिया है और यह स्वीकार किया है कि ज़फ़र के यहाँ शाह नसीर के तमाम गुणों के साथ-साथ तासीर (प्रभाव) भी अतिरिक्त रूप से मौजूद है। दोनों की असली कमज़ोरी पर भी उनकी नज़र गई, यानी लंबी रदीफ़ें जिनमें दूसरा मिसरा तो क़रीब-क़रीब बना-बनाया होता है, सिर्फ़ पहले मिसरे के लिए फ़िक्र करनी पड़ती है। देहलवी और लखनवी शायरी के बारे में हसरत ने क़लक़ की समीक्षा के सिलसिले में भी अपने विचार व्यक्त किए हैं और यहाँ उन्होंने कुछ ज़्यादा सख़्त ज़बान इस्तेमाल की है। 'उर्दू-ए-मुअल्ला' (1906 ई.) में लिखते हैं, क़लक़ की निपुणता और उस्तादी में कोई संदेह नहीं, लेकिन लखनऊ के अन्य उस्तादों की तरह उनके कलाम से भी, सिवाय इसके कि ज़रूरत के वक़्त प्रमाण के तौर पर इस्तेमाल किया जाए, दिल या रूह को कोई आनंद नहीं मिल सकता।
उन्होंने क़लक़ का एक 'शहर-आशोब' भी दर्ज किया है जिसमें वाजिद अली शाह के कलकत्ता सफ़र का हाल तुलनात्मक रूप से सादा और प्रभावशाली ज़बान में लिखा गया है, मगर उसमें भी व्यक्तिगत दुख-दर्द का हाल ज़्यादा है, क़ौमी नुक़सान की भावना कम।
हसरत ग़ज़ल के उस्तादों मुसहफ़ी, मोमिन और क़ायम को ज़्यादा मानते थे। उन्होंने मुसहफ़ी की विविधता और ख़ारिजियत (बहिर्मुखता) के नए एहसास पर ज़ोर दिया है और उनकी कला में ताज़ा और लंबे क़ाफ़ियों की तलाश और फिर रदीफ़ को अलग-अलग तरह से निबाहने की विशेषता पर ज़ोर दिया है। मोमिन के सिलसिले में उनकी राय और भी ध्यान देने योग्य है, उनकी राय यह है कि, उर्दू शायरी के लिहाज़ से (यहाँ उर्दू शायरी से उनका मतलब शायरी की कला से मालूम होता है) ज़ौक़ का दर्जा ग़ालिब से और ग़ालिब का दर्जा मोमिन से ऊँचा है लेकिन दर्द और प्रभाव के लिहाज़ से मोमिन का कलाम ग़ालिब से बेहतर और ज़ौक़ से कहीं ज़्यादा बेहतर है।
उनके ख़याल में फ़ारसीपन, सहल-ए-मुमतने (देखने में आसान पर रचने में मुश्किल), सुंदर शब्द-संयोजन, बयान के मुक़ाबले में विषय का ध्यान, ग़ालिब और मोमिन के यहाँ समान है। मोमिन ख़ाँ की उस्तादी के वह दो कारणों से क़ायल हैं। पहला तो उनके अंदाज़ की ख़ासियत, दूसरे फ़ारसी स्वभाव और तरकीबों की मिलावट, जिसकी वजह से उनके कलाम में एक ख़ास अहमियत पैदा हो गई है जिसकी मिसाल सिवाय ग़ालिब के और किसी के कलाम में नहीं मिलती।
हसरत की बारीकबीनी का यहाँ क़ायल होना पड़ता है। फ़ारसी स्वभाव और तरकीबों की वजह से उर्दू शायरी को एक नई अर्थवत्ता और प्रतीकात्मकता, एक नई वाक्पटुता और सौंदर्य-सृजन मिला जिससे उर्दू शायरों ने बहुत फ़ायदा उठाया। यही शैली रोज़मर्रा और मुहावरे के बजाय दार्शनिक विषयों की अभिव्यक्ति पर ज़्यादा सक्षम है और हालाँकि हसरत ने इसका साफ़-साफ़ ज़िक्र नहीं किया लेकिन इसका एहसास भी उनके यहाँ बड़ा अर्थपूर्ण और अहम है।
कुल मिलाकर ग़ज़ल कहने वाले शायरों के बारे में हसरत की टिप्पणियाँ बड़ी अहम और मूल्यवान हैं। उनकी आलोचनाओं में देखने में कला पर ज़ोर मालूम होता है मगर असल में कला का एक ताज़ा और गहरा विचार मौजूद है। फिर उन्होंने बहुत आज़ादी और हिम्मत से विचार व्यक्त किया है और किसी के व्यक्तित्व और प्रसिद्धि से वह प्रभावित नहीं हैं। आज़ाद की उस्ताद-भक्ति को देखते हुए हसरत की अपने उस्ताद अमीर उल्लाह तस्लीम के बारे में यह राय बड़ी अहमियत के लायक़ है,
नसीम के दौर में ही बल्कि उसके दस साल बाद तक स्वर्गीय मसनवी लिखने वालों की तरह क़सीदा लिखने में भी वह अपने ज़माने में बेजोड़ थे। शायरी के पतन का सबसे ज़्यादा असर हज़रत तस्लीम की ग़ज़लों पर पड़ा। उनके बीच के दौर की ग़ज़लें उनकी गिरावट को और आख़िरी दौर की ग़ज़लें उनके पतन को ज़ाहिर करती हैं।
इसी तरह हसरत ने दूसरी विधाओं के बारे में जो राय ज़ाहिर की है वह भी उनकी गहरी आलोचनात्मक समझ और उनकी सही सोच को प्रमाणित करती है। चकबस्त ने जब 'गुलज़ार-ए-नसीम' का नया संस्करण प्रकाशित किया तो उस पर एक चर्चित भूमिका लिखी और इंसानी फितरत के तक़ाज़े के तहत नसीम की शायरी के कमाल को ख़ूब उजागर किया। यहाँ तक कि 'सहर-उल-बयान' और 'गुलज़ार-ए-नसीम' को बराबर का दर्जा दे दिया। मीर हसन शब्दों के रचयिता हैं, नसीम अर्थों के रचयिता हैं।
शरर ने इसके जवाब में इस मसनवी को आतिश की मसनवी क़रार दिया। इसकी ज़बान को लखनऊ की प्रामाणिक ज़बान मानने में संकोच किया। तीसरे इसकी कुछ ग़लतियों के सुबूत में कुछ प्रमाण पेश किए। चकबस्त ने एक विद्वतापूर्ण जवाब में नसीम का समर्थन किया और फिर एक बहुत गर्म बहस छिड़ गई। 'उर्दू-ए-मुअल्ला' में चकबस्त का लेख, शरर का जवाब, चकबस्त का जवाब का जवाब और शरर का एक और जवाब सब प्रकाशित हुए। हसरत की राय इस पर हमेशा की तरह संतुलित और मध्यम है। उन्होंने नसीम की उस्तादी को स्वीकार किया है और 'गुलज़ार-ए-नसीम' को लखनऊ के रंग की एक बेहतरीन मिसाल और अपने रंग में लाजवाब क़रार दिया है। उनके शब्द यह हैं, गुलज़ार-ए-नसीम की ज़बान निस्संदेह लखनऊ की ज़बान है, हालाँकि कुछ मौक़ों पर इसे लखनऊ की पुरानी ज़बान कहना ज़्यादा मुनासिब होगा।
हसरत ने इसकी वजह यह बताई है कि नसीम आतिश के माध्यम से मुसहफ़ी के असर से न बच सके। नासिख़ के सुधारों का उन पर असर कम हुआ। उन्होंने इस पर अमल ज़रूर किया मगर जगह-जगह इसकी पाबंदी न कर सके,
भड़काई जमाई मादर उसकी
मगर नसीम के रंग को मसनवी के लिए अनुपयुक्त क़रार दिया है। 'उर्दू-ए-मुअल्ला' अगस्त-सितंबर 1905 ई. में लिखते हैं, जिस तरह क़सीदे के लिए वाक्पटुता और शब्दों की भव्यता, क़ितों के लिए निरंतरता और विषय की ख़ूबी, रुबाइयों विशेषकर आख़िरी मिसरे के लिए विषय और शब्दों की स्वाभाविकता अनिवार्य हैं। इसी तरह अच्छी रुचि का तक़ाज़ा यह है कि बयानिया मसनवी की शैली, नज़्म में सादगी और रवानी के बजाय बनावट और छोड़े गए शब्दों का दख़ल न हो, क्योंकि इससे मसनवी का असल उद्देश्य यानी अर्थ व्यक्त करने या कहानी सुनाने का उद्देश्य ख़त्म हो जाता है और श्रोता या पाठक का मन असल क़िस्से से हट कर शाब्दिक बाज़ीगरी के फेर में पड़ जाता है।
ज़बान और साहित्य के अहम विषयों पर 'उर्दू-ए-मुअल्ला' में कई लेख मिलते हैं, उनमें 'अदब-उल-कातिब वश-शायर' के शीर्षक से नज़्म तबातबाई का एक चर्चित लेख कई क़िस्तों में निकला है। इसमें पुल्लिंग-स्त्रीलिंग, उर्दू लिपि के बारे में विचार, ग़लत शब्दों पर शोध, भाषा के जानकारों और मातृभाषियों की बहस, दिल्ली और लखनऊ स्कूल की ज़बान का फ़र्क़ उल्लेखनीय लेख हैं। 1912 ई. में उन्होंने 'ने' के इस्तेमाल पर बहस की है और दिखाया है कि न सिर्फ़ पंजाब में बल्कि पुराने शायरों के यहाँ भी 'ने' का इस्तेमाल इस तरह मिलता है। जैसे कि 'कुल्लियात-ए-ज़फ़र' से उन्होंने 'और देखा हुआ है' के प्रमाण पेश किए हैं,
हम ने है ख़ूब उसकी तर्ज़-ए-नाज़ पहचानी हुई
चाल पहचानी हुई, आवाज़ पहचानी हुई
हसरत ने कुछ दुर्लभ चीज़ों के प्रकाशन को अपना ख़ास कर्तव्य क़रार दिया था। जैसे कि 'उर्दू-ए-मुअल्ला' में मुल्ला मसीह की रामायण फ़ारसी, क़लक़ का शहर-आशोब, बनवारी लाल, शोला शागिर्द बे-सब्र सिकंदराबादी व तफ़्ता की मसनवी 'ब्रज छब', ऐशी शागिर्द मुसहफ़ी की मसनवी 'सोज़-ओ-साज़' उल्लेखनीय हैं। विशेषकर बनवारी लाल शोला की 'ब्रज छब' तो इस क़ाबिल है कि उसे दोबारा प्रकाशित किया जाए। उन्होंने उर्दू ज़बान के पुराने गुलदस्तों के संकलन भी प्रकाशित किए थे और आज उर्दू ज़बान और साहित्य के इतिहास के विद्यार्थी के लिए इन लेखों में बड़ी फ़ायदेमंद और उपयोगी सामग्री मिल सकती है। उन्होंने उन्नीसवीं सदी के आख़िर के निम्नलिखित गुलदस्तों का ज़िक्र किया है,
(1) गुलदस्ता शोअरा ज़मीमा अख़बार, अनवार-उल-अख़बार लखनऊ आग़ाज़ 1874 ई.
(2) गुल-कदा-ए-रियाज़ ख़ैराबादी 1879 ई.
(3) नतीजा-ए-सुख़न, लखनऊ 1880 ई.
(4) पयाम-ए-यार, लखनऊ 1883 ई.
(5) तोहफ़ा-ए-उश्शाक़ 1884 ई.
(6) करिश्मा-ए-दिलबर, ख़ैराबाद 1885 ई.
(7) रियाज़-ए-सुख़न, मुरादाबाद 1885 ई.
(8) दामन-ए-गुलचीं, लखनऊ 1885 ई.
(9) फ़ित्ना व अत्र-ए-फ़ित्ना 1885 ई.
(10) नग़्मा-ए-बहार, लखनऊ 1886 ई.
(11) गुलदस्ता-ए-कैफ़, उन्नाव 1889 ई.
(12) दामन-ए-बहार, आगरा 1892 ई.
(13) गुलचीं, लखनऊ 1892 ई.
(14) इंतख़ाब, लखनऊ 1893 ई.
(15) तस्वीर-ए-आलम 1896 ई.
(16) रियाज़-ए-सुख़न, मारहरा 1896 ई.
(17) ख़दंग-ए-नज़र 1897 ई.
(18) मेयार, लखनऊ 1898 ई.
इसी तरह फ़रवरी 1952 ई. के 'उर्दू-ए-मुअल्ला' में उन्होंने अपने 208 समकालीनों का ज़िक्र किया है जिसमें उस्ताद, शौक़ीन, शायर, कम मशहूर और नए सीखने वाले सब आ गए हैं।
उर्दू-ए-मुअल्ला के इन लेखों में जगह-जगह बेशुमार अनमोल रत्न बिखरे पड़े हैं। इस सिलसिले में एक मिसाल बहुत दिलचस्प है जो अभी तक मेरी नज़र से नहीं गुज़री थी। 'मकतूबात-ए-आज़ाद' पर जालिब देहलवी ने एक भूमिका लिखी थी। इसमें आज़ाद की बेख़ुदी और दीवानगी का ज़िक्र करते हुए उन्होंने लिखा था कि कवियों के लिए यह बेख़ुदी कोई नई चीज़ नहीं है। हसरत ने इस भूमिका का वह हिस्सा पूरा दे दिया है जिसमें ज़ौक़, मोमिन और ग़ालिब की बेख़ुदी की मिसालें हैं। ज़ौक़ के बारे में लिखा है कि वह एक बार आधे नंगे, सिर्फ़ तहबंद पहने, शायरी की सोच में डूबे हुए शाही क़िले तक पहुँच गए थे और जब शाही पहरेदार ने टोका तो उन्हें होश आया। मगर इसी बीच बहादुर शाह ज़फ़र को ख़बर हो गई और उन्होंने इसी हाल में उन्हें बुला लिया। उनके शेर सुने और फिर उन्हें शाही लिबास से सम्मानित करके वापस भेजा। मोमिन ख़ाँ सड़क से गुज़रते थे तो कोई न कोई शागिर्द इस मक़सद से साथ हो लेता था कि बेख़ुदी की हालत में, हाथ एक ख़ास अंदाज़ से उठाए हुए और झूमते हुए, वह किसी गाड़ी से कुचल न जाएँ। ग़ालिब के बारे में सबसे दिलचस्प जानकारी मुहैया की है,
उनकी बैठक में मुहल्ले के बहुत से बेफ़िक्रे जमा होते थे और उनकी हुक़्क़ा-पानी और कभी-कभार मिठाई से ख़ातिरदारी की जाती थी। ग़ालिब ख़ुद ऊपर की मंज़िल पर रहते थे, मगर इन लोगों से कभी कुछ काम लेते थे तो बस यह कि जब कोई नया मज़मून (विषय) बाँधते थे और उसकी ख़ुशी के नशे में बेख़ुद हो जाते, तो नीचे तशरीफ़ ले आते थे और वह शेर लोगों को सुनाते थे और दाद लेकर फिर उल्टे पाँव वापस चले जाते थे। नीचे सन्नाटा होता तो ज़रूर कहते कि, आज मुहल्ले में ख़ैरियत तो है, कोई हादसा तो नहीं हो गया। कल्लू का बयान है कि कई बार ऐसा हुआ कि बैठक में कोई परिंदा भी नहीं है, लेकिन मिर्ज़ा साहब आए और दरवाज़े में खड़े होकर फ़रमाया, लो भई सुनो तो, क्या मज़मून हाथ आया है। फिर आपने शेर पढ़ा, उसकी ज़रूरी व्याख्या की और संतुष्ट होकर ऊपर चले गए।
मुहल्ले के बेफ़िक्रों को जमा करने का काम कल्लू और कल्यान के ज़िम्मे था और वे लोगों से कहते थे, आज फिर बुड्ढे को सनक का ज़ोर हुआ है। इसके बावजूद वे मिर्ज़ा पर जान छिड़कते थे और कल्लू तो अक्सर उन्हें याद करके और उनके क़िस्से बयान करके रोया करता था। मिर्ज़ा साहब अपनी तंगी के बावजूद अपने नौकरों से बहुत अच्छा बर्ताव करते और अपनी वज़ादारी (रखरखाव) को निभाते थे। जालिब ने लिखा है कि जब वह हाली से मिले तो उन्होंने ग़ालिब का एक क़िस्सा सुनाया जो शेफ़्ता ने उनसे बयान किया था। शेफ़्ता ने कहा था कि एक बार ग़ालिब ने उन्हें यह शेर सुनाया,
ख़ुशी जीने की क्या, मरने का ग़म क्या
हमारी ज़िंदगी क्या और हम क्या
शेफ़्ता ने जब इसकी बहुत तारीफ़ की तो मिर्ज़ा ने कहा कि यह शेर तो मैं यूसुफ़ अली ख़ाँ नाज़िम को दे चुका हूँ। नाज़िम की शायरी में ग़ालिब के रंग के बहुत से शेर मौजूद हैं। रामपुर के सरकारी पुस्तकालय में नाज़िम का दीवान ग़ालिब द्वारा संशोधित किया हुआ मौजूद है। इसमें जगह-जगह ग़ालिब के सुधार हैं और उनसे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि नाज़िम के यहाँ ग़ालिब की झलक इसी वजह से मिलती है।
हसरत ने अपने शोध और आलोचना में जिस आज़ादी और बेबाकी का सुबूत दिया है, उसकी मिसाल में इक़बाल की शुरुआती शायरी पर उनकी सख़्त आपत्तियाँ और हाली की राष्ट्रीय शायरी के कमज़ोर पहलुओं का जायज़ा क़ाबिल-ए-ज़िक्र है। इसी तरह 'इंदर सभा' पर उन्होंने (अगस्त 1903 ई. में) जो लेख लिखा है, उसमें नई साहित्यिक रुचि पर सख़्त नुक्ताचीनी की गई है और 'इंदर सभा' की साहित्यिक और नाटकीय ख़ूबियों पर अच्छी तरह रोशनी डाली गई है।
लखनऊ यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में 'उर्दू-ए-मुअल्ला' की 1934 ई. तक की फ़ाइल मौजूद है। यह पत्रिका शोध और आलोचना, राजनीतिक लेखों, चुनिंदा शायरी और समीक्षाओं के लिहाज़ से अपनी मिसाल आप है। अगर इसका ग़ौर से अध्ययन किया जाए तो हसरत को सिर्फ़ एक बड़ा शायर ही नहीं, बल्कि एक अच्छा शोधकर्ता और एक संजीदा और क़ाबिल-ए-क़द्र आलोचक मानने में किसी को संकोच नहीं होगा। फिर इस पत्रिका में समकालीनों की शायरी के जो नमूने प्रकाशित हुए हैं, वे भी हमारे लिए बड़ी दिलचस्पी का सामान रखते हैं। फ़ानी की कई अच्छी ग़ज़लें जो 'बाक़ियात' में नहीं हैं और सिर्फ़ नक़ीब प्रेस से छपे 'दीवान-ए-फ़ानी' में प्रकाशित हुई थीं, 'उर्दू-ए-मुअल्ला' में मिलती हैं।
इमदाद इमाम असर, शाद अज़ीमाबादी, गुस्ताख़ रामपुरी, वफ़ा रामपुरी, अमीर उल्लाह तस्लीम, सफ़ी लखनवी, अज़ीज़ लखनवी की कई उत्कृष्ट रचनाएँ इस पत्रिका में सुरक्षित हो गई हैं। नए अंदाज़ की मसनवियाँ भी हैं। इक़बाल और अकबर की शायरी भी है। ग़रज़, हसरत ने 'उर्दू-ए-मुअल्ला' के ज़रिए उर्दू भाषा और साहित्य की जो बहुमूल्य सेवा की है, वह हमारे इतिहास में सुनहरे अक्षरों से लिखे जाने के क़ाबिल है और उर्दू साहित्य का कोई भी विद्यार्थी इसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।
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