उर्दू ग़ज़ल की टेक्निक
कला कोई भी हो, उसमें तकनीक या निर्माण के नियम या भेद, सांचा-ढांचा या बनावट का गुर या बेल-बूटे के नक़्शे, उसकी नोक-पलक के भेद, उसकी गढ़न, उसका रूप-रंग या रचाव और निखार की परत-दर-परत मंज़िलें ज़रूर होती हैं, लेकिन ग़ज़ल के ट्रेड सीक्रेट (व्यापारिक रहस्य) पर बातें करने में, इसके विस्तार और व्याख्या में बहस के नीरस हो जाने का या गुत्थी के सुलझाने में गुत्थी के और उलझ जाने का डर भी है।
जहां तक उर्दू का ताल्लुक़ है, इसके जन्म के दिन से ही इसमें बदलाव, कभी-कभी तरक़्क़ी और कभी-कभी गिरावट अलग-अलग दौरों में नज़र आते हैं। ग़ज़ल की तकनीक या स्थापित और बुनियादी नियमों में यह बदलाव, तरक़्क़ी और गिरावट नहीं मिलेगी, बल्कि ग़ज़ल की आत्मा और अर्थ में, उसकी अनुभूति और सौंदर्य संबंधी कल्पनाओं में बदलाव, तरक़्क़ी और गिरावट के सिलसिले नज़र आते हैं। ग़ज़ल का हर बड़ा शायर अपनी शायरी से एक ऐसी दुनिया की रचना करता है जिसे अंग्रेज़ी में यूनीक (Unique) कहते हैं, यानी बेजोड़ या जिसे आप अपनी मिसाल आप कह सकते हैं। नक़ल करने वाले शायरों के यहां किसी बड़े शायर की रची गई दुनिया की धुंधली और कमज़ोर परछाइयां नज़र आती हैं। उनकी कोई अपनी दुनिया नहीं होती।
तो तकनीक के भी दो हिस्से हुए, एक बाहरी और एक भीतरी। ग़ज़ल की ठठरी (स्केलेटन) तो बस इतनी है कि किसी भी बहर या छंद (मीटर) में पहला शेर एक क़ाफ़िए में हो, बाद के शेरों का पहला मिसरा क़ाफ़िए से आज़ाद हो, दूसरा मिसरा उसी क़ाफ़िए में हो जिसमें पहले शेर के दोनों मिसरे हैं और आमतौर पर आख़िरी शेर में शायर का तख़ल्लुस भी आ जाए।
अब तकनीक-दर-तकनीक कुछ और बातें हैं। यानी कुछ स्थापित इशारे या सिंबल्स जैसे सहरा, वादी, कारवां, मंज़िल, शाम-ए-ग़रीबां, सुब्ह-ए-वतन, गुलिस्तां, ख़ार-ओ-गुल, बहार, ख़िज़ां, आशियां, क़फ़स, सय्याद, आसमां, क़यामत, फ़स्ल, साक़ी, मयख़ाना, पैमाना, मय, ज़ुल्फ़-ओ-रुख़, निगाह, गोर-ए-ग़रीबां, ज़िंदां, कूचा, महबूब, दर-ए-जानां, बुतख़ाना, हरम, बज़्म, ह्रीम, हस्ती, नीस्ती, दामन, गरेबां, होश-ओ-बेख़ुदी और इश्क़-ए-मजाज़ी व हक़ीक़ी की वारदातों और मुक़ामों से जुड़ी बातें। ग़ज़ल के हर शेर में व्यापकता (यूनिवर्सलिटी) होनी चाहिए और उसकी अपील आम होनी चाहिए। ज़िंदगी के तजुर्बे व्यापक और मुकम्मल बयान की शक्ल में ग़ज़ल के शेरों में पेश किए जाते हैं।
ग़ज़ल का हर शेर मानो एक मुकम्मल नज़्म है। बाहरी निरंतरता तो बहर, क़ाफ़िया और रदीफ़ से क़ायम रहती है। फिर शैली (स्टाइल) की एकरूपता और कैफ़ियत या मूड या भावनात्मक प्रतिक्रिया की एकरूपता ग़ज़ल में तालमेल पैदा करके उसे एक इकाई बना देती है। कुछ ग़ज़लें अर्थ के लिहाज़ से मुसलसल (निरंतर) होती हैं, कुछ रदीफ़ें भी। मसलन 'आज कल', 'आज की रात', 'इन दिनों', 'हनूज़', 'अभी तक' या ऐसे ही और बेशुमार जुमले और टुकड़े ग़ज़ल में एक सहज निरंतरता पैदा कर देते हैं।
बाहरी तकनीक ही शायर की व्यक्तिगत अनुभूति के प्रभाव से भीतरी तकनीक बन जाती है। मसलन रिंद का शेर था जिस पर उन्हें बड़ा नाज़ था,
अगरई का है गुमां शक है मलाईगिरी का
रंग लाया है दुपट्टा तेरा मैला होकर
लेकिन सबा के इस शेर में जो मैं अब सुनाऊंगा, जज़्बात की तकनीक ऐसी बदली हुई है कि उसी ज़मीन और उसी क़ाफ़िए में दुनिया बदल गई है। सबा का शेर यह है,
बाग़बां, बुलबुल-ए-कुश्ता को कफ़न क्या देता
पैराहन गुल का यह बदला कभी मैला होकर
शेर में कितनी नई परतें पड़ गईं, आवाज़ में कितने भंवर और कितनी लहरें पड़ गईं। वज़ीर का शेर है,
तिरछी नज़रों से न देखो आशिक़-ए-दिलगीर को
कैसे तीरंदाज़ हो सीधा तो कर लो तीर को
ग़ालिब का शेर जो मैं अब सुनाऊंगा, इसी बहर में है, सिर्फ़ क़ाफ़िया और रदीफ़ बदले हुए हैं, लेकिन वज़ीर के शेर में लकड़ी बजने की खटखटाहट से तरन्नुम का जो ख़ून हुआ है, ग़ालिब में उसकी ऐसी भरपाई हुई है कि ग़ालिब का शेर संगीत की देवी की आवाज़ मालूम होता है। शेर यह है,
सब कहां कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायां हो गईं
ख़ाक में क्या सूरतें होंगी कि पिन्हां हो गईं
बात यह है कि बाहरी तकनीक को भी भीतरी तकनीक ही पैदा करती है। जैसा साज़ वैसा राग। नतीजा यह निकला कि ग़ज़ल के रूप-रंग या बाहरी तकनीक में नई झलक और नई झंकार यानी बदलाव और तरक़्क़ी भीतरी तकनीक या टेक्नीक ऑफ़ फ़ीलिंग से पैदा हो जाती है। एक ही ख़याल, एक ही अर्थ तक की दो तकनीकें हो जाती हैं। मसलन अमीर मीनाई का यह शेर सुनिए,
जब तलक थे तुम कशीदा, दिल था शिकवों से भरा
तुम गले से मिल गए सारा गिला जाता रहा
और फ़ानी का यह शेर सुनिए जिसका बिल्कुल यही मतलब है, लेकिन ख़याल और मतलब वही होते हुए जज़्बात की दुनिया बदल गई है,
दिल उनके न आने तक लबरेज़-ए-शिकायत था
वह आए तो अपनी ही तक़्सीर नज़र आई
और हाली ने तो इसी विषय और अर्थ को वह शराफ़त-ए-नफ़्स (आंतरिक सज्जनता) बख़्शी है, जिसे हम भावनाओं की अभिव्यक्ति की आख़िरी मंज़िल कह सकते हैं। हाली का शेर है,
मिलते ही तुम से भूल गईं कुल्फ़तें तमाम
गोया हमारे सर पे कभी आसमां न था
'सारा गिला जाता रहा', 'अपनी ही तक़्सीर नज़र आई' और 'भूल गईं कुल्फ़तें तमाम' के टुकड़ों पर ग़ौर कीजिए। फ़ानी और हाली ने मिट्टी को पारस बना दिया है या नहीं, पर यह भीतरी तकनीक की कीमिया (जादू) है। एक ही घटना, एक ही ख़याल ग़म का ख़याल हो जाता है और ख़ुशी का भी ख़याल हो जाता है। मसलन,
सिरहाने मीर के आहिस्ता बोलो
अभी टुक रोते-रोते सो गया है
सौदा के सिरहाने जो हुआ शोर-ए-क़यामत
ख़ुद्दाम-ए-अदब बोले अभी आंख लगी है
होगा किसू दीवार के साये के तले मीर
क्या काम मोहब्बत से इस आराम-तलब को
उसकी दीवार का सर से मेरे सामां न गया
मैं तो कमबख़्त यहीं था कहीं आया न गया
मीर के इन दोनों ग़म-आलूद (ग़म में डूबे) शेरों के बाद आतिश की हौसला-अंगेज़ आवाज़ सुनिए,
धूप में साया-ए-दीवार ने सोने न दिया
ख़ाक पर संग-ए-दर-ए-यार ने सोने न दिया
कितनी निशात-काराना (आनंददायक) है आतिश की आवाज़ और बात वही है जो मीर ने कही थी।
ग़ज़ल की बाहरी तकनीक में कोई अहम बदलाव या अहम इज़ाफ़ा न होगा, न होने की ज़रूरत है। जैसे अंग्रेज़ी सॉनेट में या अंग्रेज़ी ब्लैंक वर्स में गोरबोडक (Gorboduc) और सर फ़िलिप सिडनी के बाद मार्लो, शेक्सपियर, मिल्टन, वर्ड्सवर्थ, शेली, कीट्स और टेनिसन ने अपने-अपने मिज़ाज और अनुभूति की नई थरथराहटें पैदा कर दीं, उसी तरह वली दकनी, मीर, ग़ालिब, आतिश, अमीर और दाग़ और बीसवीं सदी के ग़ज़लगोयों ने ग़ज़ल की भीतरी तकनीक बदल दी। ग़ज़ल की भीतरी तकनीक में जो बदलाव इक़बाल के हाथों सामने आए, वे इंक़लाब की हैसियत रखते हैं।
इस सिलसिले में कुछ हक़ीक़तों को समझ लेना चाहिए। उर्दू ग़ज़ल सामंती दौर (फ़्यूडल एज) के पतन के ज़माने में पैदा हुई। इसकी तमाम लताफ़तें (कोमलताएं) निष्क्रियता की ख़ूबियां लिए हुए थीं, हालांकि कभी-कभी जैसे आतिश के यहां कर्म के जोश की आब-ओ-ताब (चमक-दमक) भी ग़ज़ल के चेहरे पर नुमायां हो जाती है। फिर उर्दू ग़ज़ल अपनी व्यापकता और सार्वभौमिकता के बावजूद एक तबक़े की शायरी थी।
एक और बात उर्दू ग़ज़ल में ऐसी थी जो हिंदुस्तान के मिज़ाज और ज़मीर को खटकती थी और वह थी ज़िंदगी और दुनिया (हयात-ओ-कायनात) से असंगति। उर्दू ग़ज़ल की अमूमन यह बदकिस्मती रही है कि ज़िंदगी को वह इस तरह क़ुबूल नहीं करती थी जिसकी मिसालें हिंदुस्तान के प्राचीन साहित्य के बेहतरीन कारनामों और परंपराओं में मिलती हैं। मैंने इसके ख़िलाफ़ चौथाई सदी पहले आवाज़ उठाई थी। मुझे आज यह कहते हुए इत्मीनान महसूस होता है कि मेरी आवाज़ बेकार नहीं गई और इधर कुछ बरसों से उर्दू ग़ज़ल ज़िंदगी और दुनिया को सीने से लगाती हुई नज़र आती है। इस भौतिक दुनिया (दुन्या-ए-उन्सरी) की पाकीज़गी का एहसास नए ग़ज़ल कहने वालों को हो चला है। ग़ज़ल के मिज़ाज, इसके दिल की धड़कन, इसके ईमान में यह बड़ी अहम तब्दीली पैदा हुई है। ग़ज़ल की दाख़िली (आंतरिक) तकनीक में यह तब्दीली एक कायापलट या Reverse Process का मर्तबा रखती है।
मैंने अभी बताया था कि ग़ज़ल के मैदान में इक़बाल का काम इंक़लाब का दर्जा रखता है। निष्क्रियता (मझूलियत) की परंपराओं को इक़बाल ने जड़ से उखाड़ कर फेंक दिया। लेकिन इक़बाल की कर्मठता (अमलियत) या प्रगतिशीलता Idealistic है और वह Revivalistic है। दुनिया की सर्वहारा (प्रोलतारी) ताक़तों का उभार मौजूदा इतिहास का सबसे अहम अध्याय है। यह इतना अहम अध्याय है कि महज़ राजनीति और अर्थव्यवस्था नहीं बल्कि कला और साहित्य, दर्शन और विज्ञान, तमाम विद्याओं और पूरी ज़िंदगी की बुनियादी धारणाओं को सिरे से बदल दे। इक़बाल इस इंक़लाब की आहट नहीं पा सकते थे। यह वाक़या यानी दुनिया भर के सर्वहारा वर्ग की उठान (Rise of world of Proletariat) सभ्यता, संस्कृति और साहित्य सबको बदल देगा। उर्दू गद्य की तमाम विधाओं (असनाफ़) पर इस इंक़लाब का असर ज़ाहिर हो चला है और उर्दू पद्य की तमाम विधाओं पर भी, जिनमें ग़ज़ल भी एक विधा है।
निष्क्रियता की जगह उर्दू ग़ज़ल की दाख़िली तकनीक में जो सामूहिक और व्यक्तिगत कर्मठता अब आने वाली है, वह इक़बाल की कर्मठता से बिल्कुल अलग चीज़ होगी। इस कर्मठता में इंसानी भलाई, कल्याण, तरक़्क़ी और इंसानी एकता के जो तत्व होंगे, उनके मुक़ाबले में इक़बाल की कर्मठता बड़ी ग़लत चीज़ मालूम होगी। बहुत कम लोगों ने इसका अंदाज़ा लगाया है कि समाजवादी कर्मठता ग़ज़ल में कितना बड़ा इंक़लाब पैदा कर देगी, इसमें किस क़दर बेशुमार संभावनाएं पैदा कर देगी, इसमें कितना ज़बरदस्त Challenge पैदा कर देगी। नई नर्मियां, नई गर्मियां, नई सख़्तियां, नया ज़ोर, नई ज़िंदगी सब कुछ यह इंक़लाबी विचार ग़ज़ल में पैदा कर देगा। ग़ज़ल हो या नज़्म, सबका विषय इंसान है और इंसानी ज़िंदगी। जब इंसानियत और इंसानी ज़िंदगी का नक़्शा और तसव्वुर बदल जाएगा तो ग़ज़ल की रूपरेखा भी बदल जाएगी। पुराने इशारे और किनाए (प्रतीक), पुराने अल्फ़ाज़ नए मायने देने लगेंगे। नए इशारे Symbols मसलन मज़दूर, हंसिया, हथौड़ा, ट्रैक्टर, इंजन और तरह-तरह की मशीनें और ईजादें (आविष्कार) और व्यावहारिक ज़िंदगी के हज़ारों पहलू नई झलक देने लगेंगे। क़ुदरत पर फ़तह हासिल करती हुई, आगे बढ़ती हुई इंसानियत ग़ज़ल की दाख़िली तकनीक में कायापलट कर देगी। वर्ग-भेद वाले जीवन (तबक़ाती ज़िंदगी) से जैसे सभ्यता और संस्कृति आज़ाद हो जाएंगे, उसी तरह ग़ज़ल भी पूरी इंसानी ज़िंदगी की, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा मज़दूरों का है, तर्जुमानी (प्रतिनिधित्व) करेगी।
एक और बात की तरफ़ इशारा करके मैं विदा लेना चाहूंगा। इंक़लाबी ग़ज़ल में एकरसता (इकसरापन) हरगिज़ नहीं होगी। शायरी की निजता (इन्फ़िरादियत) को उजागर होने का जैसा मौक़ा इंक़लाबी ग़ज़ल देगी, वह अब तक की ग़ज़ल-गोई उसे नहीं दे सकी है। ग़ज़ल चूंकि बक़ौल प्रोफ़ेसर मजनूं बहुत कट्टर काव्य विधा (सिन्फ़-ए-सुख़न) है, इसलिए जिस इंक़लाबी तब्दीली की तरफ़ मैंने इशारा किया है, वह ग़ज़ल में अभी बहुत रुक-रुक कर आती है, लेकिन उर्दू नज़्म में यह तब्दीली साफ़ देखी जा सकती है। आज की उर्दू नज़्म यानी इंक़लाबी उर्दू नज़्म में शायरी की निजता जितनी उज्ज्वल (दरख़्शां) है, किसी और दौर की उर्दू नज़्म में निजता की ऐसी विविधता (तनाव्वु) नज़र नहीं आती। आगे चलकर ठीक यही विविधता, यही रंगारंगी, उर्दू ग़ज़ल में भी नज़र आएगी, उस उर्दू ग़ज़ल में जो प्रशिक्षित (तरबियत-याफ़्ता) मज़दूरों के लिए लिखी जाएगी न कि मुफ़्तख़ोरों और मुनाफ़ाख़ोरों के लिए। वाज़ेह (स्पष्ट) रहे कि बहुत बुलंद होगी वह ग़ज़ल। लेकिन नए दौर में भी हम हाफ़िज़ व सादी व कालिदास, मीर व ग़ालिब के नग़्मों में जो बड़ी क़द्रें (मूल्य) ज़िंदगी की हैं, उनको सराहेंगे और उनसे सबक़ लेंगे।
जो ख़ुद मुर्दा हैं वो मुर्दों के वारिस बन नहीं सकते
कि इस दुनिया में नामूस-ए-कुहन के पासबां हम हैं
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