उर्दू का जन्म
हिंदुस्तान के अलग-अलग हिस्सों में विद्वानों की ज़बान संस्कृत थी। आम लोगों की ज़बान प्राकृत थी जिसे उस ज़माने की हिंदुस्तानी या उर्दू या हिंदी कह सकते हैं। जब महात्मा गौतम बुद्ध ने अपना उपदेश देना शुरू किया तो प्राकृत बदल कर पाली ज़बान का रूप ले चुकी थी और अपने वक़्त के आम लोगों की ज़बान यानी पाली में महात्मा बुद्ध ने धर्म प्रचार शुरू किया। सबसे पहले महात्मा बुद्ध के हाथों आम लोगों की ज़बान ने इल्मी और अदबी (साहित्यिक) ज़बान का दर्जा हासिल किया और बौद्ध ज्ञान और साहित्य का बहुत बड़ा हिस्सा पाली ज़बान में मिलता है। ज़माना गुज़रता गया और लगभग एक हज़ार बरस तक पाली ज़बान और पाली साहित्य का बोलबाला रहा। फिर हिंदुस्तान के अलग-अलग हिस्सों में प्राकृत और पाली बदल कर, कुछ संस्कृत शब्दों को भी ज़बान में शामिल करते हुए, कई ज़बानें बन गईं जैसे बंगाली, मराठी, गुजराती, सिंधी, हिंदी, पंजाबी वग़ैरह। दकन की ज़बानें जैसे तमिल, तेलुगु, कन्नड़ वग़ैरह को भी दक्खिनी हिंद की प्राकृत और पाली का बदला हुआ रूप समझना चाहिए। यह बात है अब से लगभग एक हज़ार बरस की। अभी तक आम लोगों की ये अलग-अलग ज़बानें बोलियों के रूप में तो बनती जा रही थीं लेकिन मुसलमानों के आने से पहले इतनी तरक़्क़ी नहीं कर सकी थीं कि इल्मी और अदबी ज़बान का दर्जा हासिल कर सकें। बल्कि पाली के पतन के बाद हिंदुस्तान के अलग-अलग हिस्सों में ज्ञान और साहित्य की परंपराएं नए सिरे से संस्कृत में ज़िंदा हो गई थीं।
अब मुहम्मद बिन क़ासिम की फ़ौज के पाँव जम जाते हैं तो मुसलमान उत्तरी हिंद की तरफ़ बढ़ते हैं और रास्ते में महाराष्ट्र और गुजरात होते हुए और उन्हें अपने क़ब्ज़े में करते हुए पंजाब पहुँच जाते हैं। फिर दिल्ली पहुँच कर गंगा-जमुना के दोआबे की तरफ़ मुड़ते हैं, फिर सूबा बिहार और उसके बाद सूबा बंगाल तक फैल जाते हैं। उत्तरी हिंद पर छा कर यह घटा फिर दकन की तरफ़ मुड़ जाती है। यह जानने के लिए कि हिंदुस्तान की अलग-अलग ज़बानों पर इसका क्या असर पड़ा, इस बात का जान लेना ज़रूरी है कि जो मुस्लिम आबादी उस वक़्त हिंदुस्तान में नज़र आती थी उसमें अब सिर्फ़ एक या दो फ़ीसदी ऐसे लोग थे जो अरब या ईरान से आए थे, बाक़ी हिंदुस्तान के ही वो हिंदू थे जो अब मुसलमान हो गए थे। इसका मतलब यह हुआ कि जैसे-जैसे इस्लाम या इस्लामी आबादी फैलती गई, बजाय अरबी, अफ़ग़ानी, तुर्की और फ़ारसी के 99 फ़ीसदी मुसलमानों की ज़बानें सिंधी, गुजराती, मराठी, पंजाबी, हिंदी और बंगाली होती गईं। मज़हब मिटाया जा सकता है, ज़बान मिटाई नहीं जा सकती। कम से कम मज़हब या हुकूमत के हाथों तो नहीं। हाँ, मज़हब और हुकूमत का यह असर हिंदुस्तान की ज़बानों पर ज़रूर हुआ कि हर ज़बान के शब्दकोश में बहुत से फ़ारसी-अरबी और कुछ तुर्की या अन्य शब्दों का इज़ाफ़ा हो गया। सिंधी की लिपि भी अरबी या अरबी जैसी हो गई और सिंधी ज़बान में बहुत बड़ी तादाद में अरबी-फ़ारसी शब्द शामिल होकर ज़बान का हिस्सा बन गए। गुजराती और मराठी में इतनी ज़्यादा तादाद में तो नहीं, लेकिन फिर भी बहुत बड़ी संख्या में अरबी-फ़ारसी शब्द इस तरह शामिल हो गए कि वहाँ के हिंदू-मुसलमानों को आम तौर से अब इसकी पहचान तक नहीं रही कि इन शब्दों की जन्मभूमि ईरान है या अरब। लेकिन गुजराती और मराठी की लिपि फ़ारसी या अरबी लिपि नहीं बन सकी, बल्कि वही पुरानी देवनागरी लिपि मामूली फेरबदल के साथ जैसी पहले से थी, ज्यों की त्यों क़ायम रह गई और न ज़बान का नाम बदला। पंजाबी की लिपि गुरुमुखी भी, जो देवनागरी का बदला हुआ रूप है, क़ायम रह गई, ज़बान का नाम भी पंजाबी क़ायम रहा। मगर फ़ारसी-अरबी शब्द बड़ी तादाद में पंजाबी ज़बान का हिस्सा बन गए। अब रही हिंदी ज़बान जो आधे हिंदुस्तान बल्कि उससे भी ज़्यादा हिस्से में फैली हुई थी। इसकी देवनागरी लिपि क़ायम रही। लेकिन इसके शब्दकोश में हज़ारों फ़ारसी-अरबी शब्द शामिल हो गए। बंगाली लिपि क़ायम रही। लेकिन बांग्ला ज़बान में बहुत बड़ी तादाद में अरबी-फ़ारसी शब्द शामिल हो गए। दक्खिनी हिंद से तो इस्लाम से पहले भी अरबों का संबंध रहा और दकनी ज़बानों की लिपि न बदली, लेकिन अरबी शब्द खुले या छुपे तरीक़े से वहाँ की बोलियों में मिलते हैं। इस सिलसिले में दो-एक बातें बड़ी दिलचस्प हैं। सिंधी, गुजराती, मराठी, पंजाबी, हिंदी, बंगाली और दकनी ज़बानों में, बल्कि इन ज़बानों की अलग-अलग स्थानीय बोलियों (Dialects) में भी अलग-अलग अरबी-फ़ारसी शब्द जज़्ब हो गए (घुल-मिल गए), यानी अगर सिंधी ने कुछ अरबी-फ़ारसी शब्द लिए तो यही हिंदी में हुआ। मराठी में भी हुआ और बंगाली में भी। फड़नवीस मराठी ज़बान का शब्द माना जाता है। कुछ मराठी नामों का हिस्सा यह शब्द है। जैसे नाना फड़नवीस। हक़ीक़त में यह शब्द फ़र्द-नवीस था। बंगाली तकिया को बेतकल्लुफ़ 'बालिश' कहते हैं। जो दिल्ली या लखनऊ का बड़े से बड़ा उर्दू अदीब (साहित्यकार) या फ़ारसी-अरबी का विद्वान कभी नहीं बोलता और बिना इज़ाफ़त (संबंध कारक) के कभी नहीं लिखता। बंगाली क़ब्र को 'गोर' कहते हैं यानी जहाँ क़ब्र देखी बेतकल्लुफ़ कहेंगे कि वो देखो गोर। इस तरह यह शब्द उर्दू वाले कभी नहीं बोलेंगे। पूरब में एक गाँव का नाम करावल है जो 'क़ुर्रा-ए-अव्वल' का बदला हुआ रूप है। इसी तरह 'मजूरी' इस सूबे की गँवारी बोली का शब्द है। असल में यह 'मज़दूरी' था। लेकिन मज़दूरी या मजूरी हिंदुस्तान की किसी और ज़बान में न मिलेंगे। पूरब के देहातों में दो शब्द और बोले जाते हैं, मसलन कहते हैं कि फ़लाँ खेत बहुत 'दार' है (दार यानी रखने वाला) यानी बड़ा उपजाऊ या ज़रख़ेज़ है। उर्दू में या फ़ारसी तक में ख़ाली 'दार' न बोला जाएगा न लिखा जाएगा। दूसरा शब्द है 'सियार'। कहते हैं कि फ़लाँ चीज़ या काम सियार पड़ेगा। यानी इसमें बरकत होगी। यह शब्द असल में 'बिस्यार' था। ग़रज़ कि दकनी ज़बानों में, सिंधी, गुजराती, मराठी, बांग्ला में, हिंदुस्तान के लाखों गाँवों की बोलियों में, अलग-अलग तबक़ों और पेशा वालों की बोलियों में अरबी और फ़ारसी के ऐसे शब्द रोज़मर्रा और मुहावरों में शामिल हो गए हैं जो कठिन से कठिन अरबी-युक्त उर्दू में भी नहीं लाए जाते। पूरब के एक देहाती ने एक साँड़ को देख कर कहा कि बड़ा 'जय्यद' साँड़ है। जय्यद उस्ताद तो सब ने सुना है लेकिन जय्यद साँड़? ग़रज़ कि हर जगह लोगों ने उन फ़ारसी और अरबी शब्दों को अपना लिया जिन्हें अपनी पसंद, अपने मिज़ाज या अपनी बोली के अनुकूल पाया। अगर हिंदुस्तान की सैकड़ों बोलियों का मुकम्मल शब्दकोश बने तो ऐसे-ऐसे अरबी और फ़ारसी शब्द मिलेंगे जिनकी ख़बर नदवा और देवबंद के उलेमा को भी नहीं है।
हालांकि भारतीय उपमहाद्वीप में एक हज़ार से ज़्यादा बोलियां हैं और लगभग दो दर्जन ऐसी स्थापित ज़बानें हैं जिनका साहित्य मौजूद है। लेकिन आधे से ज़्यादा हिंदुस्तान की ज़बान हिंदी है। यह हिंदी ज़बान मुसलमानों के आने से पहले भी हिंदुस्तान भर में कमोबेश समझी और टूटी-फूटी शक्ल में बोल भी ली जाती थी। क्यों? इसलिए कि हिंदुओं की तमाम धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का पालना गंगा का दोआबा रहा है। हिंदुओं की तमाम तीर्थगाहें (तीर्थगाह की बनावट भी ध्यान देने योग्य है) उत्तरी भारत में हैं और दक्षिणी भारत में हैं। वे भी राम और कृष्ण से संबंधित हैं। हिंदुओं में नहान और स्नान के त्योहार वही अहमियत रखते हैं जो मुसलमानों में हज-ए-काबा को हासिल है। हज़ारों बरस से हर साल प्रयाग के संगम पर, हरिद्वार में और बनारस में, गया में और जगन्नाथ पुरी में नहान के मेले होते हैं। अयोध्या में भी स्नान का मेला होता है और मथुरा-वृंदावन की ज़ियारत (दर्शन) भी देश भर के हिंदू करते हैं। पुराने ज़माने में उत्तरी भारत के इन स्थानों का सफ़र करोड़ों हिंदू हर साल करते थे और इस यात्रा में साल-दो साल लग जाते थे। यानी मद्रासी, गुजराती, मराठी, बंगाली करोड़ों हिंदुओं को उत्तरी भारत की लंबी यात्रा का मौक़ा मिलता था। इस तरह हिंदी ज़बान या उत्तरी भारत की ज़बान मुसलमानों के आने से पहले ही राष्ट्रीय या देशी ज़बान या साझा ज़बान की हैसियत हासिल कर चुकी थी। धर्म इसका प्रेरक और कारण था।
उर्दू तुर्की ज़बान का लफ़्ज़ है। डेढ़ सौ बरस पहले तक हिंदुस्तान की किसी ज़बान का नाम उर्दू नहीं था। मुग़ल लश्कर का नाम अलबत्ता उर्दू-ए-मुअल्ला था। लश्कर और लश्कर के बाज़ार के लिए उर्दू लफ़्ज़ इस्तेमाल होता था। बाद में लश्कर और लश्कर के बाज़ार की मिली-जुली बोली या ज़बान का नाम उर्दू पड़ गया। यह बोली थी तो दिल्ली के आसपास की हिंदी जिसे पछाहीं (पश्चिमी) हिंदी या खड़ी बोली कहते हैं और इस बोली में ग़ैर-हिंदी यानी फ़ारसी-अरबी अल्फ़ाज़ जो शामिल हुए, उनसे मिलकर उर्दू ज़बान बनी। लेकिन यह फ़ारसी-अरबी मिश्रित हिंदी बोली महज़ बाज़ारी और कारोबारी बोलचाल तक सीमित थी। यह बोली लिखी नहीं जाती थी और अगर लिखी जाती थी तो मुसलमान इसे फ़ारसी लिपि में लिखते थे और हिंदुओं की ज़्यादातर आबादी नागरी लिपि में लिखती थी। साहित्य या शायरी इस ज़बान में बहुत दिनों तक नहीं की गई। अमीर ख़ुसरो ने मनोरंजन या प्रयोग के लिए कुछ हल्की-फुल्की चीज़ें ज़रूर अवाम की दिलचस्पी के लिए कहीं, जिनकी ऐतिहासिक अहमियत सर्वमान्य है लेकिन जिनकी कोई ख़ास साहित्यिक अहमियत नहीं है। हां, महात्मा कबीर का सब कलाम तो नहीं, लेकिन उनके कलाम का एक हिस्सा ऐसा ज़रूर है जिसमें खड़ी बोली या पश्चिमी हिंदी में साहित्य की रचना हुई। लेकिन जहां तक शब्दावली का ताल्लुक़ है, कबीर की इन रचनाओं में फ़ारसी-अरबी अल्फ़ाज़ नहीं हैं या न होने के बराबर हैं। लेकिन ब्रजभाषा या अवधी या हिंदी ज़बान की अन्य शक्लों से इन रचनाओं की शक्ल अलग है। यह अंतर क्रियाओं (Verbs) के इस्तेमाल में नज़र आता है, यानी ब्रजभाषा या हिंदी की और शक्लों की क्रियाओं के बदले दिल्ली के आसपास जो क्रियाओं की शक्लें प्रचलित थीं, वही कबीर ने भी अपनी कुछ रचनाओं में इस्तेमाल कीं।
मसलन,
करे सिंगार नार अलबेली साजन के घर जाना होगा।
या
मिट्टी ओढ़ना मिट्टी बिछौना मिट्टी का सिरहाना होगा।
जाना होगा, सिरहाना होगा। यह वे टुकड़े हैं जिन्हें मलिक मुहम्मद जायसी, तुलसीदास, सूरदास वग़ैरह हरगिज़ न लिखते। कहने का मतलब यह है कि कबीर की ये रचनाएं उस उर्दू में हैं जिसमें इंशा ने रानी केतकी की कहानी लिखी या जिसे हज़रत आरज़ू ख़ालिस उर्दू कहते हैं। कबीर के बाद जो हिंदी साहित्य आया, उसमें खड़ी बोली या दिल्ली की बोली बिल्कुल छोड़ दी गई, और जहां तक उत्तरी भारत का ताल्लुक़ है, साहित्य और शायरी की ज़बान या तो फ़ारसी थी या फिर ब्रजभाषा या वह ज़बान जिसे मलिक मुहम्मद जायसी और तुलसीदास ने इस्तेमाल किया। यानी अवधी। रहीम ख़ानख़ानां जितने कामयाब फ़ारसी के शायर हैं, हिंदी के भी उतने ही कामयाब शायर हैं। उनका हिंदी और फ़ारसी कलाम ऊंचे से ऊंचे वर्गों में लोकप्रियता का दर्ज़ा हासिल कर चुका है। ग़रज़ उत्तरी भारत, विशेषकर दिल्ली में हालांकि निरंतर साहित्यिक रचनाएं उर्दू ज़बान में तैयार नहीं की गईं, लेकिन दिल्ली के आसपास की हिंदी में फ़ारसी-अरबी के जो टुकड़े शामिल हो गए थे, उनसे मिलकर जो ज़बान बनी थी (जिसे हम फ़ारसी-आमेज़ देहलवी कह सकते हैं), उस पर निखार आता गया। वह सभ्य वर्गों में, बल्कि दिल्ली की जनता के वर्गों में भी एक बोली के रूप में व्यवस्थित होती गई, चमकती गई, बनती और संवरती गई। उस ज़माने में हालांकि सिंधी, मराठी, गुजराती और बंगाली ज़बानों में फ़ारसी-अरबी अल्फ़ाज़ समेत गद्य और पद्य की रचनाएं होती रहीं, लेकिन उनमें और दिल्ली की ज़बान की इस नई शक्ल में एक फ़र्क़ था। दिल्ली का शहर मुग़ल सल्तनत का केंद्र था। इसलिए हालांकि अभी दिल्ली की बोली में साहित्य की रचना नहीं हो रही थी, फिर भी दिल्ली की बोली में जो रचाव पैदा होता जा रहा था, उससे सिंधी, मराठी, गुजराती और बंगाली ज़बानें वंचित थीं। फ़ारसी-अरबी इन ज़बानों में भी आ गई थीं। लेकिन उस सलीक़े और उस अंदाज़ से नहीं जिस तरह दिल्ली की हिंदी में आई थीं। फिर इन ज़बानों के जो अपने अल्फ़ाज़ और वाक्य थे, उन्हें भी ख़राद पर चढ़ने (तराशे जाने), सान और लचक, लोच और नज़ाकत, चमक, रंगीनी और कोमलता, फ़साहत और बलाग़त (भाषा की शुद्धता और प्रभावशीलता) हासिल करने के वे मौक़े और सहूलियतें हासिल नहीं थीं जो दिल्ली की बोली को हासिल थीं। इन ज़बानों की फ़साहत-ओ-बलाग़त और कथन के प्रभाव की बुनियाद नब्बे फ़ीसदी संस्कृत अल्फ़ाज़ और संस्कृत के टुकड़ों पर थी। ठेठ हिस्सा इन ज़बानों का काफ़ी हद तक खुरदरा रह गया था और अब तक है। ख़ुद हिंदी के साहित्य में, विशेषकर ठेठ ज़बान की और ठेठ रचे हुए वाक्यों की वे व्यापकताएं, वे फ़साहतें और बलाग़तें नहीं हैं जो दिल्ली की बोली में पैदा होती जा रही थीं। अब दिल्ली की बोली को साहित्य की ज़बान और उच्चतम शायरी की ज़बान बन जाने का इंतज़ार था। लेकिन फ़ारसी साहित्य और अरबी की ज्ञानवर्धक किताबों का रोब और असर इतना ज़बरदस्त था कि दिल्ली के साहित्यकार या तो चुप थे या फ़ारसी ही में गद्य और पद्य कहकर अपनी साहित्यिक प्यास बुझा लेते थे। वे इस हक़ीक़त को पहचान नहीं सकते थे कि मलिका-ए-फ़ारसी (फ़ारसी की महारानी) के रोब और शान के बावजूद दिल्ली की घरेलू बोली का उठान कुछ इस अंदाज़ से हो रहा था कि एक न एक दिन उस पर नज़र पड़ ही जाएगी।
लेकिन जो इस्लामी सल्तनत दक्कन में क़ायम हुई थी और जो उत्तरी हिंद से छिपी हुई हिंदी या उर्दू ज़बान अपने साथ दक्कन में ले गई थी, और जिसके नए बसे हुए सहायकों और लश्करों की बोली पर दक्कनी ज़बानों के शब्दों और लहज़े की परछाइयां भी पड़ रही थीं, वह सबसे पहले उर्दू गद्य और पद्य (नस्र और नज़्म) की रचनाओं की तरफ़ आकर्षित हुई। उर्दू ज़बान दक्कन में पैदा नहीं हुई, न पैदा हो सकती थी। लेकिन कुछ या बहुत कुछ दक्कनी की तरफ़ झुकाव रखने वाली उर्दू में साहित्यिक रचनाओं का आग़ाज़ (शुरुआत) उस ज़माने में यानी अब से लगभग तीन सौ बरस पहले दक्कन में हुआ। उत्तरी हिंद से जाकर दक्कन में बसी हुई आबादी दक्कनी ज़बानों और दक्कन वालों से घिरी हुई थी। 'दरमियान-ए-क़र-ए-दरिया तख़्ता बंदम करदा-ए' (बीच भंवर में तख़्ते से बांध दिया है) वाला और 'दामन तर मकुन होशियार बाश' (दामन न भीगे, होशियार रहना) वाला मामला था। वतन से बिछड़ कर दक्कन में जा बसने वाली नई आबादी को वतन की बोली की मुहब्बत सताने लगी, इस बोली की ख़ूबियां उन पर खुलने लगीं और पिंजरे में फंस कर उर्दू का बुलबुल ऐसे तेज़ सुरों में चहकने लगा, वतन से वियोग की ऐसी आग उसकी आवाज़ में थी कि बाज़ार की बोली गीतों में बदल गई। फ़ारसी शायरी की आवाज़ भी इस हिंदी आवाज़ में मिल गई और यूं उर्दू शायरी का आग़ाज़ हुआ। बादशाहों ने अपनी बेगमों और महबूबा औरतों की शान में ग़ज़लें और नज़्में कहीं। ये औरतें चूंकि भारतीय मूल की थीं और जब मुहर्रम में फ़ारसी के मर्सिए सुनती थीं तो समझ नहीं पाती थीं और रुला देने वाले बंदों (छंदों) पर मातम नहीं कर सकती थीं, इसलिए दक्कनी उर्दू में मर्सिए भी कहे जाने लगे। फिर ये औरतें चूंकि हिंदू भी रह चुकी थीं और हिंदू परंपराओं का असर धर्म बदलने के बाद भी दिलों में लिए हुए थीं, इसलिए रामायण और महाभारत की कथाओं को भी दक्कनी उर्दू के गीतों के सांचों में ढाला गया। क़ुली शाह और अन्य मुस्लिम रईसों और अदीबों (साहित्यकारों) ने, जिनमें सअदी दक्कनी, बहरी वग़ैरह बहुत मशहूर हैं, सौ बरस के अंदर गीतों का अंबार लगा दिया। फिर बड़ी हिंदू आबादी से घिर कर धर्म और तसव्वुफ़ (सूफ़ीवाद) की तालीम देने के लिए शाह गेसू दराज़ वग़ैरह फ़क़ीरों ने गद्य में इल्मी और मज़हबी किताबें लिखीं और इस तरह बोलचाल की ज़बान लिखने-पढ़ने की ज़बान बन गई। गद्य और पद्य दोनों में यह ज़बान दिल्ली की ख़ास उर्दू नहीं रह गई थी। बल्कि दक्कनी उर्दू थी, मगर थी उर्दू ही। आज भी जब दक्कन में बसे हुए उर्दू बोलने वालों की ज़बान बहुत कुछ सुधर गई है, हैदराबाद के शाही ख़ानदान और हैदराबाद के उन हिंदू-मुसलमान जागीरदारों, रईसों और मध्यम व आम तबक़े के लोगों की ज़बान जो उत्तरी हिंदुस्तान से वहां जा बसे हैं, दक्कनी की तरफ़ झुकाव रखती है।
ग़रज़ (कुल मिलाकर), दिल्ली में अभी उर्दू होंठों ही पर निखर रही थी कि दक्कन में वह काग़ज़ के पन्नों पर अपना निखार दिखाने लगी। वक़्त गुज़रता गया, उर्दू बोली दिल्ली में हसीन से हसीन तर (अधिक सुंदर) होती गई और उर्दू साहित्य दक्कन में बनता गया। यहां तक कि शाह हातिम और मज़हर जान-ए-जानां के ज़माने में वली दक्कनी ने रदीफ़-दार अपना मोटा दीवान (काव्य-संग्रह) संकलित करके दक्कन से दिल्ली का रुख़ किया। यह समझ कर कि दक्कन वाले साहित्यकार सही, लेकिन भाषा के असली जानकार (अहल-ए-ज़बान) दिल्ली वाले ही हैं। दिल्ली के फ़ारसी पढ़े-लिखे और फ़ारसी में कहने वाले अदीब यह देख कर फड़क गए (हैरान रह गए) कि उनकी घरेलू और बाज़ारी बोली वली के दीवान में व्यवस्थित हो गई है और फ़ारसी ग़ज़लों के नक़्श-ए-क़दम पर चलती नज़र आ रही है। अलबत्ता कहीं-कहीं मुहावरों से, दिल्ली के रोज़मर्रा से, दिल्ली की टकसाली (मानक) ज़बान से कुछ दूर जा पड़ी है, उन्होंने वली का स्वागत किया। और कहीं-कहीं जो वली को इस्लाहें (सुधार) दीं, तो इसी बहाने फ़ारसी में शायरी करना छोड़कर उर्दू ग़ज़ल की तरफ़ आकर्षित हुए। इस तरह वे वली के उस्ताद बने और वली उनका उस्ताद बन गया, और यूं वली की प्रामाणिक, टकसाली और रची हुई उर्दू में शाह हातिम, मज़हर जान-ए-जानां और उनके साथियों और हमनवाओं ने शायरी शुरू की। फिर उनके बाद तो उर्दू साहित्य के चार स्तंभ उर्दू के महल को उठाए हुए नज़र आते हैं, यानी मीर, सौदा, सोज़ और दर्द।
इसके बाद से उर्दू ज़बान में कुछ और तत्व शामिल होते गए, मसलन 'ने' का लफ़्ज़ जो पंजाब से आया लेकिन उर्दू में इसे भूतकाल (सीग़ा-ए-माज़ी) के लिए कुछ हालतों में इस्तेमाल किया गया, और अन्य ज़बानों के कुछ अल्फ़ाज़ भी शामिल होते रहे और होते जा रहे हैं। लेकिन 'फ़रहंग-ए-आसफ़िया' के मुताबिक़ उर्दू शब्दकोश सात हज़ार अरबी अल्फ़ाज़, छह हज़ार के क़रीब फ़ारसी अल्फ़ाज़ और चालीस हज़ार अन्य अल्फ़ाज़, जिनमें उनतालीस हज़ार के क़रीब ठेठ हिंदी या दिल्ली के आस-पास की ठेठ ज़बान के अल्फ़ाज़ हैं, यानी बावन-तिरेपन हज़ार अल्फ़ाज़ पर आधारित है। नज़ीर अकबराबादी ने अपनी रचनाओं में कई ऐसे अल्फ़ाज़ भी रखे जो या तो आगरे की तरफ़ के हैं या फिर नज़ीर के ख़ुद बनाए हुए अल्फ़ाज़ हैं। लखनऊ वालों ने कुछ अल्फ़ाज़ और बड़ी तादाद में मुहावरों और पारिभाषिक शब्दों (इस्तलाहों) का इज़ाफ़ा (वृद्धि) किया। सूबा बिहार के कुछ अदीबों जैसे नवाब नासिर ख़याल और शाद अज़ीमाबादी ने, और पंजाब के अदीबों ने कुछ या कई अपने यहां की स्थानीय विशेषताओं का इज़ाफ़ा भी उर्दू में किया। मैंने अपनी कुछ रचनाओं में संस्कृत के नए अल्फ़ाज़ उर्दू वाक्यों में इसी तरह जड़ने की कोशिश की है कि ज़बान को चार चांद लग जाएं। 'झलकियां' के नाम से मेरी यह रचना, जिनमें हुस्न-ओ-इश्क़ पर पौने चार सौ रुबाइयां हैं, छप रही है (ज़ेर-ए-तब्अ है)।
यूं मिलती और बनती जा रही है उर्दू ज़बान। इसे दरबार की ज़बान समझना बड़ी भारी ग़लती है। यह अवाम की ज़बान है। उर्दू साहित्य, विशेषकर उर्दू शायरी के सबसे ज़्यादा जगमगाते हुए और सुरीले व असरदार हिस्से देसी अल्फ़ाज़ और देसी बोली के टुकड़े हैं। इनको ऊंचे ख़याल अदा करने वाले बयान में खपाना उस्तादों ही का काम है। स्थानीय बोली को उर्दू ने वह तरक़्क़ी दी, उसमें इतना असर और लचक पैदा कर दी कि अदीब की शख़्सियत और फ़नकारी उर्दू गद्य और पद्य के तरह-तरह के और रंग-बिरंगे बयान के तरीक़ों (शैलियों) में झलकने लगी। उर्दू गद्य और पद्य की लगातार और रंग-बिरंगी तारीख़ (इतिहास) बन गई। रजब अली बेग सुरूर और फ़ोर्ट विलियम कॉलेज वालों की नस्र (गद्य) देखिए, ग़ालिब के ख़तों की नस्र देखिए, मुहम्मद हुसैन आज़ाद और अबुल कलाम आज़ाद की नस्रें देखिए, शिबली की नस्र, सरशार की नस्र, प्रेमचंद की नस्र, रशीद सिद्दीक़ी की नस्र, नियाज़ फ़तेहपुरी की नस्र, ग़रज़ यह कि कई विशिष्ट शैली वाले गद्यकारों (साहिब-ए-तर्ज़ नस्र-निगारों) की शैलियां इसी बोली से पैदा हुईं और यही शायरी में भी हुआ। ग़ालिब, दाग़, अनीस, हाली, अकबर, जोश, इक़बाल और बहुत से ऐसे विशिष्ट शैली वाले शायर पैदा हुए जिनमें हर एक ने क़ौम की ज़बान को अपनी आवाज़ के सांचे में ढाल दिया। यानी विभिन्न शैलियां (असालीब) उर्दू में मुमकिन हो गईं जो महज़ एक स्थानीय बोली में नहीं मिलतीं, जब तक वह पनप कर और परवान चढ़ कर स्थानीय से मुल्की (राष्ट्रीय) बोली न बन जाए और उसमें साहित्य रचने की सलाहियत (क्षमता) न आ जाए।
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