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उर्दू के प्रसिद्ध पत्रकार और शायर

उर्दू के प्रसिद्ध पत्रकार और शायर

फ़ाज़िल जमीली

ग़ज़ल 20

नज़्म 2

 

अशआर 19

पुराने यार भी आपस में अब नहीं मिलते

जाने कौन कहाँ दिल लगा के बैठ गया

ज़िंदगी हो तो कई काम निकल आते हैं

याद आऊँगा कभी मैं भी ज़रूरत में उसे

मिरे लिए रुक सके तो क्या हुआ

जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो

मुद्दत के ब'अद आज मैं ऑफ़िस नहीं गया

ख़ुद अपने साथ बैठ के दिन भर शराब पी

मिसाल-ए-शम्अ जला हूँ धुआँ सा बिखरा हूँ

मैं इंतिज़ार की हर कैफ़ियत से गुज़रा हूँ

पुस्तकें 1

 

वीडियो 7

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ऑडियो 5

कहीं से नीले कहीं से काले पड़े हुए हैं

ख़िज़ाँ का रंग दरख़्तों पे आ के बैठ गया

सुख़न जो उस ने कहे थे गिरह से बाँध लिए

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