Qaisarul Jafri's Photo'

क़ैसर-उल जाफ़री

1926 - 2005 | मुंबई, भारत

अपनी ग़ज़ल "दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है" , के लिए प्रसिद्ध

अपनी ग़ज़ल "दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है" , के लिए प्रसिद्ध

ग़ज़ल 43

नज़्म 2

 

शेर 26

तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे

मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा लगे

घर लौट के रोएँगे माँ बाप अकेले में

मिट्टी के खिलौने भी सस्ते थे मेले में

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दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है

हम भी पागल हो जाएँगे ऐसा लगता है

पुस्तकें 3

Agar Dariya Mila Hota

 

2005

Chiragh-e-Hira

 

2012

Rang-e-Hina

 

1964

 

चित्र शायरी 7

बस्ती में है वो सन्नाटा जंगल मात लगे शाम ढले भी घर पहुँचूँ तो आधी रात लगे मुट्ठी बंद किए बैठा हूँ कोई देख न ले चाँद पकड़ने घर से निकला जुगनू हात लगे तुम से बिछड़े दिल को उजड़े बरसों बीत गए आँखों का ये हाल है अब तक कल की बात लगे तुम ने इतने तीर चलाए सब ख़ामोश रहे हम तड़पे तो दुनिया भर के इल्ज़ामात लगे ख़त में दिल की बातें लिखना अच्छी बात नहीं घर में इतने लोग हैं जाने किस के हात लगे सावन एक महीने 'क़ैसर' आँसू जीवन भर इन आँखों के आगे बादल बे-औक़ात लगे

तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे तुम्हारे बस में अगर हो तो भूल जाओ मुझे तुम्हें भुलाने में शायद मुझे ज़माना लगे जो डूबना है तो इतने सुकून से डूबो कि आस-पास की लहरों को भी पता न लगे वो फूल जो मिरे दामन से हो गए मंसूब ख़ुदा करे उन्हें बाज़ार की हवा न लगे न जाने क्या है किसी की उदास आँखों में वो मुँह छुपा के भी जाए तो बेवफ़ा न लगे तू इस तरह से मिरे साथ बेवफ़ाई कर कि तेरे बा'द मुझे कोई बेवफ़ा न लगे तुम आँख मूँद के पी जाओ ज़िंदगी 'क़ैसर' कि एक घूँट में मुमकिन है बद-मज़ा न लगे

 

वीडियो 11

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
Chandni tha ke ghazal tha ke saba tha kya tha

क़ैसर-उल जाफ़री

Chura loon agar bura na lage

क़ैसर-उल जाफ़री

Qaisar ul jafri at a mushaira

क़ैसर-उल जाफ़री

ऑडियो 9

घर बसा कर भी मुसाफ़िर के मुसाफ़िर ठहरे

ज़ेहन में कौन से आसेब का डर बाँध लिया

तिरी बेवफ़ाई के बाद भी मिरे दिल का प्यार नहीं गया

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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