मर्द अपनी उलझनों को औरत की एआनत के बगैर नहीं सुलझा सकता क्योंकि रुपये के चाहे दो रुख़ हों, रुपया हमेशा एक होता है, यह जब भी बे-हैसियत होता है तो इसके दोनों रुख़ एक वक़्त में बे-हैसियत हो जाते हैं।
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औरत की बरतरी से ख़ौफ़ज़दा मर्द अपने ज़ख़्मों की ज़बान से लिखता है।
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