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दत्त भारती का परिचय
पहचान: लोकप्रिय जनप्रिय उपन्यासकार, कहानीकार और उर्दू पॉपुलर फ़िक्शन के प्रमुख रचनाकार
दत्त भारती का असली नाम देवदत्त लखन पाल था। वे पंजाबी हिंदुओं की उस पीढ़ी से संबंध रखते थे जिसने विभाजन के बाद भी उर्दू भाषा और तहज़ीब के दीये जलाए रखे।
उनका जन्म 26 मई 1925 को पूर्वी पंजाब के जालंधर ज़िले की तहसील फुल्लौर के पास कस्बा बसाड़ा में हुआ। उनके पिता अरबी-फ़ारसी के विद्वान, संस्कृत और गुरुमुखी के ज्ञाता तथा ज्योतिष में निपुण थे। प्रारंभिक शिक्षा अपने कस्बे में प्राप्त की और उर्दू उनकी बुनियादी भाषा रही। कम उम्र में ही उन्हें उपन्यास और कहानियाँ पढ़ने का शौक हो गया, जो आगे चलकर उनकी पहचान बना।
1933 में उनका परिवार दिल्ली आ बसा—पहले हैमिल्टन रोड और फिर सब्ज़ी मंडी क्षेत्र में। उनके पिता सरकारी कर्मचारी थे। दत्त भारती का झुकाव औपचारिक पढ़ाई से अधिक अध्ययन की ओर था। किशोरावस्था तक वे उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी के बड़े लेखकों को पढ़ चुके थे। माँ की मृत्यु ने उन पर गहरा प्रभाव डाला और उसी समय उनका विवाह भी हो गया। उनके आरंभिक उपन्यासों में स्वयंवर विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसमें माँ का चरित्र अत्यंत प्रभावशाली है।
1937 में हाई स्कूल के बाद वे लाहौर अपने मामा के पास गए, जहाँ के साहित्यिक माहौल ने उर्दू से उनका लगाव और गहरा किया। 1940 में पिता की सेवानिवृत्ति और बीमारी के दौरान रिश्तेदारों के व्यवहार ने उन्हें जीवन की कठोर सच्चाइयों से परिचित कराया। अपनी आत्मकथा 33 बरस में उन्होंने लिखा कि कठिनाइयों ने उन्हें समय से पहले परिपक्व बना दिया।
1942 में पिता के निधन के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी। पॉलिटेक्निक में दाख़िला लिया मगर मन नहीं लगा। उनका असली विद्यालय पढ़ना था। वे मानते थे कि अध्ययन मानसिक शांति और बौद्धिक स्वतंत्रता देता है। औपचारिक शिक्षा भले ही हाई स्कूल तक रही, पर व्यापक अध्ययन ने उन्हें असाधारण ज्ञान दिया।
1944 में पड़ोस की एक बच्ची “भारती” से प्रभावित होकर उन्होंने “दत्त भारती” तख़ल्लुस अपनाया और कहानी लेखन शुरू किया। उनका मानना था कि लेखक के लिए गहरी संवेदनशीलता ज़रूरी है।
उनकी पहली रचना रेडियो से प्रसारित हुई और 1944 में तेज वीकली में कहानी छपी। 1946 में शिमला में बैठकर लिखा गया उनका उपन्यास चोट पत्रिका शमा में धारावाहिक रूप में छपा और अत्यंत लोकप्रिय हुआ। पत्रिका के नए अंक के लिए भीड़ लगती थी और पुस्तक का पहला संस्करण तुरंत बिक गया।
1958 में फिल्म प्यासा से समानता पर उन्होंने मुकदमा भी किया। इसके बाद वे अग्रणी उपन्यासकार माने जाने लगे। थकन भी बेहद लोकप्रिय रही। तीन दशकों में उन्होंने चोट, स्वयंवर, सहारा, राही, जानवर, सूखे पत्ते, तड़प, राख, गुनाह, और ब्रांच लाइन जैसे उपन्यास लिखे। कहानी संग्रहों में प्यासी आँखें, गुनाह के धब्बे, और खूबसूरत औरतें बदसूरत मर्द शामिल हैं। उनकी किताबें हिंदी में भी खूब बिकीं।
उन्होंने “भारती बुक क्लब” नाम से प्रकाशन संस्था भी स्थापित की। मध्यमवर्गीय जीवन, प्रेम, अभाव और सामाजिक सच्चाइयों को आकर्षक ढंग से प्रस्तुत कर उन्होंने लाखों पाठकों को पढ़ने की आदत डाली और उर्दू पॉपुलर फ़िक्शन को नई पहचान दी।
निधन: 16 अक्टूबर 1992 को उनका देहांत हुआ।
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