फ़ैसल अज़ीम के शेर
जिसे कल रात भर पूजा गया था
वो बुत क्यूँ सुब्ह को टूटा हुआ था
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यही तो ए'तिबार-ए-शब-कदा है
मिरा हासिल है ये कार-ए-ज़ियाँ इश्क़
अभी तक सिर्फ़ आवाज़ें सुनी हैं
अभी तक लिख रही हैं उँगलियाँ इश्क़
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टैग : आवाज़
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