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इश्क़ पर शेर

इश्क़ पर ये शायरी आपके

लिए एक सबक़ की तरह है, आप इस से इश्क़ में जीने के आदाब भी सीखेंगे और हिज्र-ओ-विसाल को गुज़ारने के तरीक़े भी. ये पहला ऐसा ख़ूबसूरत काव्य-संग्रह है जिसमें इश्क़ के हर रंग, हर भाव और हर एहसास को अभिव्यक्त करने वाले शेरों को जमा किया गया है.आप इन्हें पढ़िए और इश्क़ करने वालों के बीच साझा कीजिए.

हुस्न इक दिलरुबा हुकूमत है

इश्क़ इक क़ुदरती ग़ुलामी है

अब्दुल हमीद अदम

इक रोज़ खेल खेल में हम उस के हो गए

और फिर तमाम उम्र किसी के नहीं हुए

विपुल कुमार

उन का ग़म उन का तसव्वुर उन के शिकवे अब कहाँ

अब तो ये बातें भी दिल हो गईं आई गई

साहिर लुधियानवी

जज़्बा-ए-इश्क़ सलामत है तो इंशा-अल्लाह

कच्चे धागे से चले आएँगे सरकार बंधे

इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
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माँग लूँ तुझ से तुझी को कि सभी कुछ मिल जाए

सौ सवालों से यही एक सवाल अच्छा है

अमीर मीनाई

इश्क़ में क्या नुक़सान नफ़अ है हम को क्या समझाते हो

हम ने सारी उम्र ही यारो दिल का कारोबार किया

जाँ निसार अख़्तर

बुलबुल के कारोबार पे हैं ख़ंदा-हा-ए-गुल

कहते हैं जिस को इश्क़ ख़लल है दिमाग़ का

मिर्ज़ा ग़ालिब

उस के बारे में बहुत सोचता हूँ

मुझ से बिछड़ा तो किधर जाएगा

फ़रहत अब्बास शाह
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अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए

अब इस क़दर भी चाहो कि दम निकल जाए

उबैदुल्लाह अलीम

क्या मिला तुम को मिरे इश्क़ का चर्चा कर के

तुम भी रुस्वा हुए आख़िर मुझे रुस्वा कर के

अज्ञात

ये मोहब्बत भी एक नेकी है

इस को दरिया में डाल आते हैं

इनाम नदीम

मुझे तो क़ैद-ए-मोहब्बत अज़ीज़ थी लेकिन

किसी ने मुझ को गिरफ़्तार कर के छोड़ दिया

शकील बदायुनी
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बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी

लोग बे-वज्ह उदासी का सबब पूछेंगे

कफ़ील आज़र अमरोहवी

'सहर' अब होगा मेरा ज़िक्र भी रौशन-दिमाग़ों में

मोहब्बत नाम की इक रस्म-ए-बेजा छोड़ दी मैं ने

अबु मोहम्मद सहर

हमारे इश्क़ में रुस्वा हुए तुम

मगर हम तो तमाशा हो गए हैं

अतहर नफ़ीस

मोहब्बत की तो कोई हद, कोई सरहद नहीं होती

हमारे दरमियाँ ये फ़ासले, कैसे निकल आए

ख़ालिद मोईन
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जुर्म-ए-उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं

कैसे नादान हैं शो'लों को हवा देते हैं

साहिर लुधियानवी

तुम नहीं पास कोई पास नहीं

अब मुझे ज़िंदगी की आस नहीं

जिगर बरेलवी

इक शक्ल हमें फिर भाई है इक सूरत दिल में समाई है

हम आज बहुत सरशार सही पर अगला मोड़ जुदाई है

अतहर नफ़ीस

चर्चा हमारा इश्क़ ने क्यूँ जा-ब-जा किया

दिल उस को दे दिया तो भला क्या बुरा किया

हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा
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तुझ से मिरा मुआमला होता ब-राह-ए-रास्त

ये इश्क़ दरमियान होता तो ठीक था

अमजद शहज़ाद

रहेगा साथ तिरा प्यार ज़िंदगी बन कर

ये और बात मिरी ज़िंदगी वफ़ा करे

क़तील शिफ़ाई

तुम्हारा नाम लिखने की इजाज़त छिन गई जब से

कोई भी लफ़्ज़ लिखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

वसी शाह

तुम से मिल कर इमली मीठी लगती है

तुम से बिछड़ कर शहद भी खारा लगता है

कैफ़ भोपाली
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मोहब्बत एक दम दुख का मुदावा कर नहीं देती

ये तितली बैठती है ज़ख़्म पर आहिस्ता आहिस्ता

अब्बास ताबिश

इस तअल्लुक़ में नहीं मुमकिन तलाक़

ये मोहब्बत है कोई शादी नहीं

अनवर शऊर

इस मरज़ से कोई बचा भी है

चारागर इश्क़ की दवा भी है

अज्ञात

इक खिलौना टूट जाएगा नया मिल जाएगा

मैं नहीं तो कोई तुझ को दूसरा मिल जाएगा

अदीम हाशमी
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एक चेहरा है जो आँखों में बसा रहता है

इक तसव्वुर है जो तन्हा नहीं होने देता

जावेद नसीमी

जब कभी हम ने किया इश्क़ पशेमान हुए

ज़िंदगी है तो अभी और पशेमाँ होंगे

हफ़ीज़ होशियारपुरी

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के

वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

वो शख़्स जिस को दिल जाँ से बढ़ के चाहा था

बिछड़ गया तो ब-ज़ाहिर कोई मलाल नहीं

बशीर बद्र
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ये मेरे इश्क़ की मजबूरियाँ मआज़-अल्लाह

तुम्हारा राज़ तुम्हीं से छुपा रहा हूँ मैं

असरार-उल-हक़ मजाज़

वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा

मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा

परवीन शाकिर

मोहब्बत में कठिन रस्ते बहुत आसान लगते थे

पहाड़ों पर सुहुलत से चढ़ा करते थे हम दोनों

हसन अब्बासी

तमाशा देख रहे थे जो डूबने का मिरे

मिरी तलाश में निकले हैं कश्तियाँ ले कर

अज्ञात

वो कहीं भी गया लौटा तो मिरे पास आया

बस यही बात है अच्छी मिरे हरजाई की

परवीन शाकिर

उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ

अब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ

अहमद फ़राज़

क्यूँ हिज्र के शिकवे करता है क्यूँ दर्द के रोने रोता है

अब इश्क़ किया तो सब्र भी कर इस में तो यही कुछ होता है

हफ़ीज़ जालंधरी

जो हो सका मिरा उस को भूल जाऊँ मैं

पराई आग में क्यूँ उँगलियाँ जलाऊँ मैं

अनवर महमूद खालिद

इश्क़ है इश्क़ करने वालों को

कैसा कैसा बहम क्या है इश्क़

मीर तक़ी मीर

हाँ कुछ भी तो देरीना मोहब्बत का भरम रख

दिल से दुनिया को दिखाने के लिए

कलीम आजिज़

मैं चाहता हूँ कि तुम ही मुझे इजाज़त दो

तुम्हारी तरह से कोई गले लगाए मुझे

बशीर बद्र

जाने कैसा समुंदर है इश्क़ का जिस में

किसी को देखा नहीं डूब के उभरते हुए

फ़राग़ रोहवी

मोहब्बत का उन को यक़ीं चला है

हक़ीक़त बने जा रहे हैं फ़साने

महेश चंद्र नक़्श

सब्र बिन और कुछ लो हमराह

कूचा-ए-इश्क़ तंग है यारो

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

कितनी लम्बी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ

उन से कितना कुछ कहने की कोशिश की

गुलज़ार

जो दिल रखते हैं सीने में वो काफ़िर हो नहीं सकते

मोहब्बत दीन होती है वफ़ा ईमान होती है

आरज़ू लखनवी

इश्क़ के मराहिल में वो भी वक़्त आता है

आफ़तें बरसती हैं दिल सुकून पाता है

आमिर उस्मानी

ज़मीं से उट्ठी है या चर्ख़ पर से उतरी है

ये आग इश्क़ की या-रब किधर से उतरी है

इंशा अल्लाह ख़ान इंशा