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उबैदुल्लाह अलीम

1939 - 1998 | कराची, पाकिस्तान

पाकिस्तान के अग्रणी आधुनिक शायरों में शामिल।

पाकिस्तान के अग्रणी आधुनिक शायरों में शामिल।

ग़ज़ल 48

नज़्म 15

शेर 47

अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए

अब इस क़दर भी चाहो कि दम निकल जाए

काश देखो कभी टूटे हुए आईनों को

दिल शिकस्ता हो तो फिर अपना पराया क्या है

आँख से दूर सही दिल से कहाँ जाएगा

जाने वाले तू हमें याद बहुत आएगा

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ई-पुस्तक 3

Chand Chehra Sitara Aankhain

 

1985

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Tez Hawa Aur Tanha Phool

 

1981

 

चित्र शायरी 21

वीडियो 36

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए

उबैदुल्लाह अलीम

अब तो फ़िराक़-ए-सुब्ह में बुझने लगी हयात

उबैदुल्लाह अलीम

कुछ इश्क़ था कुछ मजबूरी थी सो मैं ने जीवन वार दिया

उबैदुल्लाह अलीम

कोई धुन हो मैं तिरे गीत ही गाए जाऊँ

उबैदुल्लाह अलीम

चाँद-चेहरा सितारा-आँखें

मिरे ख़ुदाया मैं ज़िंदगी के अज़ाब लिक्खूँ कि ख़्वाब लिक्खूँ उबैदुल्लाह अलीम

जो उस ने किया उसे सिला दे

उबैदुल्लाह अलीम

तू अपनी आवाज़ में गुम है मैं अपनी आवाज़ में चुप

उबैदुल्लाह अलीम

तेरे प्यार में रुस्वा हो कर जाएँ कहाँ दीवाने लोग

उबैदुल्लाह अलीम

दुआ दुआ चेहरा

दुआ दुआ वो चेहरा उबैदुल्लाह अलीम

दिल ही थे हम दुखे हुए तुम ने दुखा लिया तो क्या

उबैदुल्लाह अलीम

बना गुलाब तो काँटे चुभा गया इक शख़्स

उबैदुल्लाह अलीम

बाहर का धन आता जाता असल ख़ज़ाना घर में है

उबैदुल्लाह अलीम

मैं कैसे जियूँ गर ये दुनिया हर आन नई तस्वीर न हो

उबैदुल्लाह अलीम

मैं ये किस के नाम लिक्खूँ जो अलम गुज़र रहे हैं

उबैदुल्लाह अलीम

मिट्टी था मैं ख़मीर तिरे नाज़ से उठा

उबैदुल्लाह अलीम

मिरे ख़ुदा मुझे वो ताब-ए-नय-नवाई दे

उबैदुल्लाह अलीम

वहशतें कैसी हैं ख़्वाबों से उलझता क्या है

उबैदुल्लाह अलीम

वो रात बे-पनाह थी और मैं ग़रीब था

उबैदुल्लाह अलीम

सुख़न में सहल नहीं जाँ निकाल कर रखना

उबैदुल्लाह अलीम

सुख़न में सहल नहीं जाँ निकाल कर रखना

उबैदुल्लाह अलीम

हँसो तो रंग हूँ चेहरे का रोओ तो चश्म-ए-नम में हूँ

उबैदुल्लाह अलीम

हिज्र करते या कोई वस्ल गुज़ारा करते

उबैदुल्लाह अलीम

ख़याल-ओ-ख़्वाब हुई हैं मोहब्बतें कैसी

उबैदुल्लाह अलीम

ऑडियो 11

अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए

कुछ तो बताओ शाइर-ए-बेदार क्या हुआ

दुखे हुए हैं हमें और अब दुखाओ मत

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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