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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

1911 - 1984 | लाहौर, पाकिस्तान

सबसे प्रख्यात एवं प्रसिद्ध शायर. अपने क्रांतिकारी विचारों के कारण कई साल कारावास में रहे।

सबसे प्रख्यात एवं प्रसिद्ध शायर. अपने क्रांतिकारी विचारों के कारण कई साल कारावास में रहे।

ग़ज़ल 88

नज़्म 157

शेर 81

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

sorrows other than love's longing does this life provide

comforts other than a lover's union too abide

कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब

आज तुम याद बे-हिसाब आए

दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है

लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है

क़ितआ 36

लतीफ़े 3

 

लेख 1

 

पुस्तकें 174

Bachon Ke Faiz Ahmad Faiz

 

2011

Bad-e-Nau Bahar

Dayar-e-Hindi Mein Faiz

2011

बयाद-ए-ग़ालिब-ओ-फ़ैज़

 

1987

दामन-ए-यूसुफ़

 

1989

Dast-e-Saba

 

1953

Dast-e-Saba

 

1973

Dast-e-Saba

 

1960

Dast-e-Saba

 

1978

Dast-e-Saba

 

1982

Dast-e-Tah-e-Sang

 

 

चित्र शायरी 52

दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्ज़ां हैं तेरी आवाज़ के साए तिरे होंटों के सराब दश्त-ए-तन्हाई में दूरी के ख़स ओ ख़ाक तले खिल रहे हैं तिरे पहलू के समन और गुलाब उठ रही है कहीं क़ुर्बत से तिरी साँस की आँच अपनी ख़ुशबू में सुलगती हुई मद्धम मद्धम दूर उफ़ुक़ पार चमकती हुई क़तरा क़तरा गिर रही है तिरी दिलदार नज़र की शबनम इस क़दर प्यार से ऐ जान-ए-जहाँ रक्खा है दिल के रुख़्सार पे इस वक़्त तिरी याद ने हात यूँ गुमाँ होता है गरचे है अभी सुब्ह-ए-फ़िराक़ ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात

नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही न तन में ख़ून फ़राहम न अश्क आँखों में नमाज़-ए-शौक़ तो वाजिब है बे-वज़ू ही सही किसी तरह तो जमे बज़्म मय-कदे वालो नहीं जो बादा-ओ-साग़र तो हाव-हू ही सही गर इंतिज़ार कठिन है तो जब तलक ऐ दिल किसी के वादा-ए-फ़र्दा की गुफ़्तुगू ही सही दयार-ए-ग़ैर में महरम अगर नहीं कोई तो 'फ़ैज़' ज़िक्र-ए-वतन अपने रू-ब-रू ही सही

नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं क़रीब उन के आने के दिन आ रहे हैं जो दिल से कहा है जो दिल से सुना है सब उन को सुनाने के दिन आ रहे हैं अभी से दिल ओ जाँ सर-ए-राह रख दो कि लुटने लुटाने के दिन आ रहे हैं टपकने लगी उन निगाहों से मस्ती निगाहें चुराने के दिन आ रहे हैं सबा फिर हमें पूछती फिर रही है चमन को सजाने के दिन आ रहे हैं चलो 'फ़ैज़' फिर से कहीं दिल लगाएँ सुना है ठिकाने के दिन आ रहे हैं

वीडियो 295

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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

Is waqt to lagta hai kahin kuch bhi nahi hai - In Faiz's own voice

Is waqt to lagta hai kahin kuch bhi nahi hai - In Faiz's own voice फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

Taazaa hai abhi yaad mein ai gulfaam

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

jis roz qaza aaegi

किस तरह आएगी जिस रोज़ क़ज़ा आएगी फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

mere milne wale

वो दर खुला मेरे ग़म-कदे का फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

mulaqat

ये रात उस दर्द का शजर है फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

sar-e-wadi-e-sina

फिर बर्क़ फ़रोज़ाँ है सर-ए-वादी-ए-सीना फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

shishon ka masiha koi nahin

मोती हो कि शीशा जाम कि दुर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

tanhai

फिर कोई आया दिल-ए-ज़ार नहीं कोई नहीं फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आज इक हर्फ़ को फिर ढूँडता फिरता है ख़याल

आज इक हर्फ़ को फिर ढूँडता फिरता है ख़याल फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

इंतिसाब

आज के नाम फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

कहाँ जाओगे

और कुछ देर में लुट जाएगा हर बाम पे चाँद फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ख़ुशा ज़मानत-ए-ग़म

दयार-ए-यार तिरी जोशिश-ए-जुनूँ पे सलाम फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

गर्मी-ए-शौक़-ए-नज़ारा का असर तो देखो

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

चंद रोज़ और मिरी जान

चंद रोज़ और मिरी जान फ़क़त चंद ही रोज़ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ज़िंदाँ की एक शाम

शाम के पेच-ओ-ख़म सितारों से फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ज़िंदाँ की एक सुब्ह

रात बाक़ी थी अभी जब सर-ए-बालीं आ कर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तुम आए हो न शब-ए-इंतिज़ार गुज़री है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तुम ये कहते हो अब कोई चारा नहीं

तुम ये कहते हो वो जंग हो भी चुकी! फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तराना

दरबार-ए-वतन में जब इक दिन सब जाने वाले जाएँगे फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तिरे ग़म को जाँ की तलाश थी तिरे जाँ-निसार चले गए

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तौक़-ओ-दार का मौसम

रविश-रविश है वही इंतिज़ार का मौसम फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

दुआ

आइए हाथ उठाएँ हम भी फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

दर्द आएगा दबे पाँव

और कुछ देर में जब फिर मिरे तन्हा दिल को फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

न किसी पे ज़ख़्म अयाँ कोई न किसी को फ़िक्र रफ़ू की है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

निसार मैं तेरी गलियों के

निसार मैं तिरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

बुनियाद कुछ तो हो

कू-ए-सितम की ख़ामुशी आबाद कुछ तो हो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

बहार आई

बहार आई तो जैसे यक-बार फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

रफ़ीक़-ए-राह थी मंज़िल हर इक तलाश के ब'अद

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

लहू का सुराग़

कहीं नहीं है कहीं भी नहीं लहू का सुराग़ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

लौह-ओ-क़लम

हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

वहीं हैं दिल के क़राइन तमाम कहते हैं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

शफ़क़ की राख में जल बुझ गया सितारा-ए-शाम

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

शोर-ए-बरबत-ओ-नय

पहली आवाज़ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

सुब्ह-ए-आज़ादी (अगस्त-47)

ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हम ने सब शेर में सँवारे थे

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हम सादा ही ऐसे थे की यूँ ही पज़ीराई

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हम सादा ही ऐसे थे की यूँ ही पज़ीराई

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हमीं से अपनी नवा हम-कलाम होती रही

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ऑडियो 96

अब जो कोई पूछे भी तो उस से क्या शरह-ए-हालात करें

आए कुछ अब्र कुछ शराब आए

कब याद में तेरा साथ नहीं कब हात में तेरा हात नहीं

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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