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अमीर मीनाई

1829 - 1900

दाग़ देहलवी के समकालीन। अपनी ग़ज़ल ' सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता ' के लिए प्रसिद्ध हैं।

दाग़ देहलवी के समकालीन। अपनी ग़ज़ल ' सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता ' के लिए प्रसिद्ध हैं।

ग़ज़ल 42

शेर 115

रास्ते और तवाज़ो' में है रब्त-ए-क़ल्बी

जिस तरह लाम अलिफ़ में है अलिफ़ लाम में है

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तरफ़-ए-काबा जा हज के लिए नादाँ है

ग़ौर कर देख कि है ख़ाना-ए-दिल मस्कन-ए-दोस्त

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मिसी छूटी हुई सूखे हुए होंट

ये सूरत और आप आते हैं घर से

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ई-पुस्तक 34

अमीर मीनाई

 

1941

Ameer-o-Dagh Ke Kalam Ka Intikhab

 

1943

Ameer-o-Dagh Ki Nazuk Khayaliyan

 

 

Ameer-ul-Lughat

Part-001

1891

Ameer-ul-Lughat

ٖPart-002

1892

दबदबा-ए-अमीरी

 

1937

Dabdaba-e-Amiri

 

 

Dabistan-e-Ameer Minai

 

1985

Deewan-e-Ameer

 

1893

Deewan-e-Ameer

 

1988

चित्र शायरी 14

वीडियो 9

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Na shauq e wasal ka da_wa

मोहम्मद रफ़ी

उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ

विविध

ऐ ज़ब्त देख इश्क़ की उन को ख़बर न हो

अज्ञात

सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता

जगजीत सिंह

ऑडियो 7

जब से बाँधा है तसव्वुर उस रुख़-ए-पुर-नूर का

हँस के फ़रमाते हैं वो देख के हालत मेरी

अच्छे ईसा हो मरीज़ों का ख़याल अच्छा है

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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